मायने (लंबी कहानी)


तेरे  होने से मेरे होने के मायने होते हैं।
वर्ना और क्या ,  इस जीने के मायने होते हैं।

 *

''माया।  ऒ माया। जल्दी बाहर आ बहुत ज़रूरी काम है। ''
''क्या बात  है  नीतू ? '' माया हाँफती हुई आयी।
''जल्दी से तैयार हो जा , और चाचीजी को बता दे  , धर्मेन्दर की पिक्चर लगी है। आज तो तुझे ले के जाउंगी। ''
''पागल हो गयी है ! तुझे मालूम है  न। ''
''कुछ नहीं मालूम मुझे।  तेरी पूरी जवानी निकली जा रही है और तूने धर्मेन्दर की एक भी पिक्चर नहीं देखी। ''
''लेकिन मुझे ये सब अच्छा नहीं लगता।  तू मालती के साथ चली जा न। ''
''अरे लेकिन तेरी चाची कितनी अच्छी है, वो तो तुझे नहीं रोकती देखने से। तू ही मुँह  बनाती फिरती है।
 एक बार पूछ के तो देख चाची जी को।  और पैसे की कोई टेंशन नहीं , मेरे भाई की तरफ से ट्रीट है , उसकी फुटबॉल टीम अभी जीत के लौटी थी न। ''
''नहीं नीतू  मैं आज तक गयी हूँ क्या जो अब जाउंगी !''

शोर सुनकर माया की चाची  बाहर निकली।

''क्या बात है नीतू ? ''

''आंटीजी  आप ही समझाइये न इसे।  कितनी ज़िद्दी है। एक फ़िल्म मेरे साथ नहीं देख सकती ?''

''फ़िल्म ? बेटा  यहाँ के हॉल  अच्छे नहीं हैं, तुम लोग अकेले मत जाओ । ''

''अकेले कहाँ आंटी, शरद भैया तो हैं साथ में।  और टिकट भी बालकनी का है , अच्छी सीट होती हैं वहाँ पर। ''

''अच्छा ? फिर तो ले जा इसे  , दिन भर या फिर काम करती रहती है या पढ़ती रहती है ।  थोडा हँसी  मज़ाक भी तो ज़रूरी है।  जा बेटा तैयार हो जा। ''

 हारकर माया को तैयार होना पड़ा।  चाचा चाची  की तरफ से प्यार में कोई कमी नहीं थी , पर बिन माँ की बेटी ने तो जैसे खुशियों से खुद ही मुंह फेर लिया था।  न कोई शौक था न चाहत । एक बेजान जिस्म सी , बस पढ़ती रहती थी और घर के काम में चाचीमाँ  का हाथ बंटाती रहती थी ।  हाँ शायरियां लिखने का पुराना शौक नहीं छूटता था , वक़्त मिलने से एक डायरी खोलके बैठ जाती थी।

तीनों फ़िल्म देखने शरद की कार में  निकल पड़े। माया ने नीले रंग का सूट डाला था जिसमें वो बहुत खूबसूरत लग रही थी।  शरद की निगाहें छुप छुप कर उसका दीदार कर रही थीं, एक बार नज़रें मिली तो माया शर्मा गयी।  नीतू इन सब से अनभिज्ञ माया से  बातें किये जा रही थी। बीच बीच में शरद भी उनकी बातों में शामिल होने की कोशिश कर रहा था।

'अरे माया तुम तो कितनी अच्छी शायरी लिखती हो, एक दो सुना दो न ?'' शरद ने पीछे   पलटकर कहा।
''अभी ?'' माया सकुचा गयी।
''हाँ और क्या , अभी तो दस मिनट की ड्राइव है, टाइम पास हो जाएगा। ''
''भैया वो नहीं सुनाएगी, मुझे मालूम है , कॉलेज के फंक्शन में भी इनकी शायरियाँ   मुझे ही इनके नाम से सुनानी पड़ती हैं, इनका तो बिलकुल मुँह ही नहीं खुलता। "
माया चुपचाप सुन रही थी और मुस्कुरा रही थी।

*

कॉलेज कैंटीन में नीतू, माया और सुधा बैठे हुए थे। इतने में शरद और उसके कुछ दोस्त दूर की टेबल पर आकर बैठे। सुधा ने नीतू को कोहनी मारी।

' कितना सम्भाल के रखेगी अपने भैया  को , कब से बोल रही हूँ दोस्ती करवा दे मेरी। ''' सुधा शरद भैया से काफी प्रभावित थी , हरफनमौला जो थे। कॉलेज में बहुत नाम था उनका।

'' हाँ हाँ करवाती हूँ , तू भी क्या याद रखेगी। '' नीतू ने शरद भैया  को इशारे से बुलाया।
''भैया इससे मिलिए मेरी दोस्त सुधा , ये आपसे टेनिस सीखना चाहती है। आप सिखाएंगे न इसको?''
''हाँ हाँ बिलकुल  , जब फ्री रहोगी घर आ जाना। नीतू के साथ तुम भी सीख लेना। ''
''हम तो आज से ही आ जायेंगे। '' सुधा ख़ुशी से बोली।
''और तुमको नहीं सीखना माया ?'' शरद माया की तरफ मुड़ा। माया ने  मुस्कुराकर ना में सर हिलाया।
'ऐनिवेज़ नीतू तुम लोग एन्जॉय करो आई हैव टु गो बैक टु माय टेबल। ''
''श्योर भैया। ''

(जाने क्या बात थी। शरद और माया आँखों ही आँखों में बातें कर जाते थे। वो चार पल का साथ माया के अंदर सिहरन पैदा कर देता था। पर साथ में माया जानती थी कि उसका और शरद का कोई मुकाबला नहीं। कहाँ अच्छे पैसे वाले घर का प्रतिभाशाली लड़का शरद और कहाँ वो खुद में सिमटी हुई , मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी और पली बढ़ी , न कोई सलीका था न हुनर। सजना संवारना तो दूर की बात , उसने दो जोड़ी कपड़ों में पूरा पिछला एक साल निकाल लिया था। एक दिन चाची की नज़र  पड़ी उसके कपड़ों पर तो फ़ौरन बाज़ार लेके गयी थी।  बहुत डांटा था उसको, अपनी माँ नहीं समझती इसलिए इतना संकोच करती है , बोल नहीं सकती कि कपडे नहीं हैं? माया कितनी भी कोशिश करती, अपने संकोच से पीछा नहीं छुड़ा पाती थी। जब तक वो अपने पैरों पर  खड़ी नहीं हो जाती तब तक वो एक भार ही तो थी चाचा चाची पर। इसीलिए जल्द पढाई पूरी करके नौकरी करना चाहती थी।)

न पूछो, कि क्यों
खुद में छिपी रहती हूँ।
सब जानकर भी
नादाँ बनी रहती हूँ।

न पूछो कि क्या
अरमां हैं मेरे
कि क्यों, ख्वाब
बेज़ुबाँ हैं मेरे

न पूछो,
मैं बोल न पाउंगी।

बस इतना जान लो
कि ये खामोशियाँ ही
मेरी जुबां हैं।
ये वीरानियाँ ही
मेरे दिल का पता है।
ये अँधेरा
मेरा हमसाया  है।

जो देख सको
तो इन आँखों में
हर पता मिल जाएगा
अंधेरों से जूझता
इक दिया मिल जाएगा।
खारे पानी में इक
दिल धुला मिल जाएगा।

कॉलेज ख़त्म हुआ और शरद ने अपना खानदानी व्यापार देखना शुरू कर दिया।  प्रतिभावान तो वो था ही , उसकी देख रेख में कंपनी ने तरक्की करनी शुरू कर दी। और एक दिन नीतू ने माया को ये खबर सुनायी।

''माया ओ माया , सुन एक खुशखबरी है ! जल्दी से एक नया सूट सिलवा ले अपने लिए। ''
''क्यों क्या हुआ ? तेरी शादी है ?''
''अरे मेरी नहीं पगली , शरद भैया की। शहर की सबसे खूबसूरत लड़की से। वो सहाय अंकल हैं न उनकी इकलौती बेटी है ! ''
''अच्छा ? '' माया संयत थी। ''ये तो बहुत ख़ुशी की  बात है ! और वैसे भी तेरे भैया कोई कम हैं क्या ? उनको उनके लायक लड़की ही तो मिली है। बहुत अच्छी जोड़ी लगेगी दोनों की , है न ?''
''हाँ माया, बहुत अच्छी ! और तू  शाम को मिठाई खाने आना मेरे घर, समझी। '
''बिलकुल समझ गयी , तू भी समझ जा रसगुल्ले से कम कुछ नहीं चाहिए।  ''

और इस तरह माया ने खामोशी से इस खबर को स्वीकार कर लिया।  शाम को गयी थी नीतू के घर, मिठाई खाने।  शरद ने मौका देखकर नीतू से मनपसंद कचोडी की फरमाइश कर दी  और एकांत पाकर माया के  पास आकर बैठा।

''माया , तुम क्या करोगी कॉलेज के बाद ? ''
''नौकरी ढूंढूंगी , कॉलेज में ही लग जाऊँ  तो सबसे अच्छा। ''
''और तुम्हारे कुछ सपने , कुछ ख्वाहिशें ?''
''कैसे सपने ? ''माया  ने खुद को संयत रखा था।
'' तुम्हारी शायरियाँ  पढ़ी हैं  मैंने । कोई इतना खूबसूरत कैसे लिख सकता है जब  दिल में कोई उफान  कोई तूफ़ान  न हो।  तुमने खुद को बहुत दबाकर रखा है , पता नहीं किस बात की सज़ा दे रही हो खुद को। ""
माया ने बात को  बदला।
''आपकी शादी तय हो गयी है , बहुत बहुत बधाई। ''
''शादी तय नहीं हुई है , रिश्ता आया है बस, ये लोग खामखा इतने पागल हुए जा रहे हैं। ''
अब माया डर गयी थी।  शरद बाबू के चेहरे पर एक आत्मीयता थी उसके लिए , और वो किसी  अनहोनी का कारण नहीं बनना चाहती थी। अपना साया नहीं पड़ने देना चाहती थी उनकी ख़ुशी पर।

'' मुझे चाची  ने कहा था जल्दी घर आने के लिए , मैं चलती हूँ। ''
तब तक नीतू भी आ गयी थी , मिठाई और कचोरियाँ लेकर ।
''अरे अभी से कहाँ जा रही है  , ये रसगुल्ले तो खा ले जिसके लिए तुझे बुलाया है !''
''हाँ नीतू , रसगुल्ले तो मैं ज़रूर खाऊँगी , इतनी ख़ुशी की बात जो है !''
शरद बाबू शून्य में ताक रहे थे।

*

शादी की  धूमधाम चल   रही थी। शरद घोड़े पर सवार था , बरात निकल रही थी।

माया खिड़की से सब देख रही थी।  आँखों में आँसू थे ,  पोंछने तक की  सुध नहीं थी, शरद की बहन नीतू  उसे ढूंढते हुए आयी।

''माया? ''

माया ने हड़बड़ी में आँसू पोंछे , पर आँखें देखकर दिल का हाल समझ आ रहा था।

''चलना नहीं है बारात में ?' यहाँ क्या कर रही हो ? ''

फिर नीतू   ने उसकी आँखों में देखा । अब तक जो बात घर में कोई नहीं समझ पाया था , उसकी आँखों ने कह दिया था।  नीतू   से कुछ कहते नहीं बन रहा था। उसकी सबसे करीबी दोस्त होकर भी उसे नहीं समझ पायी थी । दो पल का मौन।

''माया , तुमने अपनी सबसे करीबी दोस्त को नहीं बताया ? चुपचाप अकेली घुटती रही।  मुझे पता होता तो मैं। ''

माया ने बीच में ही बात काट दी।

''क्या करती तू हाँ?  तेरे  मम्मी पापा को देखके अपने माँ पिताजी याद आ गए। बस इतनी सी बात थी।  ''

नीतू  उसकी आँखों में देख रही थी जो कुछ और ही कहानी बयान कर रही थी।  माया ने उसका हाथ  पकड़ा और बाहर तक छोड़ आयी।  नीतू चुपचाप निकल गयी।  अब पलटकर देखने तक की हिम्मत नहीं होती थी।

x                                                                         x                                                                            x


इंजीनियरिंग कॉलेज में लंच ब्रेक चल रहा था। आकाश मेस में समीरा को इम्प्रेस करने की कोशिश कर रहा था।

''फिर वही शाम
दिल में दर्द
आँखों में पानी।
क्या करूँ
फिर याद आयी
मुझे मेरी ......  नानी ?"

आकाश गुस्से से दूर बैठी अवनी को देखने लगा। अवनी ने इशारे से पीछे पलटने को कहा। आकाश ने नीचे छुपाया कागज़ का टुकड़ा पलटाया , और राहत की साँस  ली।

"रुको रुको , एक और सुनाता हूँ। "

''नींद तो  यूँ भी कम हमें आती थी।
अब तो नींद का नामोनिशाँ  न रहा।
एक तू है जो मुझे देखकर भूल गयी
एक मैं हूँ जो तुझे देखकर कहीं का न रहा। ''

''वॉउ आकाश तुम कितनी अच्छी बातें करते हो , हाउ रोमांटिक। आशिक़ी कोई तुमसे सीखे। ''
'' सो वाट डू यू थिंक ?'' आकाश ने अपनी कातिल मुस्कान बिखेरी।
''आई थिंक आइल इम्प्रेस कुनाल विद दिस वन। उसका बर्थडे आ रहा है , वुड यू प्लीज लेट मी यूज़ दिस वन। क्या था? नींद तो फिर ?''

आकाश का मुँह लटक गया ,और पीछे बैठी अवनी को जोर से हँसी आ गयी। आकाश ने बाद में अवनी को पकड़ा।

' इतनी ज़ोर से हँसने की क्या ज़रुरत थी ! कितना एम्बैरेस हो गया था मैं।  ''
'' वो सब ठीक है , अब समोसा निकालो। ''

''काहे का समोसा ? लड़की तो पटी नहीं ! उस कुणाल से जाके ले लो जिसको वो  नज़राना पेश करने  वाली है। ''

''हुँह , मेहनत की कोई वैल्यू नहीं। '' अवनी आगे चल दी।

'' ओय आकाश , कल की तैयारी करनी है कि नहीं ?''  सौरभ ने आवाज़ दी।

''तू गिटार लेकर मेरे रूम पे आ जाना शाम को , अभी बहुत प्रैक्टिस बाकी है। ''

''ठीक है मैं आता हूँ। ''

हॉल में खचाखच भीड़ थी , कॉलेज का एनुअल फेस्ट था, और अब आकाश के गाने की बारी थी जो वो हर साल सुनाता था। गाना शुरू हुआ।

मेरे डैड मुझे लेक्चर देते हैं ,
मेरी मॉम  मुझे लेक्चर देती है
मेरे दोस्त सब सेटल हो गए, बस मैं बचा
जाऊँ कहाँ।
जाऊँ कहाँ।

यूँ तो नहीं हूँ मैं कोई ऐसा वैसा भी।
फुटबॉल में मैं स्टेट लेवल प्लेयर था।
स्विमिंग में मेरा कोई नहीं है सानी।
मेरा सामने तो सब भरते हैं पानी।

मेरे डैड को कोई समझाए
मेरी मॉम को कोई समझाए
कि होती है किताबों से बाहर भी इक दुनिया
जाऊँ कहाँ।
जाऊँ कहाँ।

ज़िन्दगी हसीं है, ये मुझको पता है
पर उनका क्या जिनके पास इसके लिए फुर्सत नहीं।
जॉब ऐसा हो जो मुझे दुनिया घुमाये
एक जगह बैठे रहने की तो मुझे आदत नहीं।
मुझे रेडियो जॉकी बनना है , मुझे फोटोग्राफर बनना है।
कोई नाइन टु फाइव जॉब मुझे नहीं है करना।
जाऊँ कहाँ।
जाऊँ कहाँ।


गाना चल रहा था और पूरा कॉलेज झूम रहा था।  आकाश के गाने महफ़िल की जान थे।

गाना ख़त्म हुआ और आकाश ने अवनी को एक दो का सिक्का  पकड़ाया।
''ये लो तुम्हारा समोसा। ''
''और चाय ?''
' बेवड़ी कही की । ये लो दो रूपये और। ''
''मुझे अदरक वाली चाय पीनी थी, तीन रुपये की आती है। ''
आकाश ने अवनी को घूरा , अवनी आगे बढ़ गयी।
''हुँह , तुम क्या जानो अदरक का स्वाद! ''

सौरभ ने आकाश के कान में कहा, ''तुझे बन्दर बोलके चली गयी। ''

आकाश ने मुँह बनाया ,'' लड़कियों को ज्यादा इंटेलीजेंट भी नहीं होना चाहिए , उनकी खूबसूरती के साथ मैच नहीं करता , मुझे तो कोई बेवकूफ सी गर्लफ्रेंड चाहिए। '''
''सीरियसली यार। ये अवनी  जो इतना भाव खा रही है, आगे जाके किसी लूज़र के साथ शादी होनी है इसकी। ''
''चल आराम करते हैं, बहुत थक गए । ''

अगले दिन सुबह आकाश केतली में चाय पीने गया तो तबियत ठीक सी नहीं लग  रही थी , दोस्तों ने टोका पर उसने हँसकर  टाल दिया।  लड़कियों का एक ग्रुप आया और आकाश के गाने की तारीफ़ करके चला गया। तीन चार दिन आकाश को कमज़ोरी महसूस होती रही , पर अभी वो वोकेशनल ट्रेनिंग  के लिए लम्बी छुट्टियाँ  पड़ने वाली थीं इसलिए उसने सोचा कि घर से ही चेक अप करवा लेगा।  उसके दोस्त भी  निश्चिन्त थे।

जाने के एक हफ्ते पहले आकाश और उसके दोस्त बाहर बैठे हुए थे और आती जाती लड़कियों को देख रहे थे।  अवनी गुजरी तो आकाश गाने लगा।

''मैं शायर बदनाम , मैं चला... ओ मैं चला  "'

अवनी ने उसे देखा और आगे बढ़ गयी। लेकिन थोड़ी देर बाद वो एक ऑटो को लेके आ गयी ।  सब लोग थोड़ा  सहम गए। अवनी ने सौरभ  को इशारे से बुलाया। सौरभ हैरान सा उसकी तरफ बढ़ा।

''बहुत बिजी हो अभी ?''
''नहीं तो , क्यों ?'' सौरभ परेशान  था।
''हाँ लग भी नहीं रहा था। तुम आकाश को लेके सिटी  हॉस्पिटल चले जाओ। ये ऑटो  खड़ा है और फीस के पैसे नहीं हैं तो मुझसे ले लो।''
सौरभ समझ नहीं पा रहा था ।  तब तक आकाश भी आ गया। अवनी ने उसे इशारे से बैठने  को बोला।
वो दोनों चुपचाप ऑटो में  बैठ गए। ऑटो चल पड़ा।
हॉस्पिटल में डॉक्टर ने आकाश को  कुछ टेस्ट्स करवाने को कहा। पहली नज़र में उसे पीलिया का केस लग रहा था। दोनों ये सुनते ही घबरा गए, पर डॉक्टर ने टेस्ट रिपोर्ट लेके दुबारा आने को कहा।
वापस लौट कर आकाश ने  पूरे हफ्ते अवनी से बात करने की  कोशिश की पर वो  अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी। उसे वाकई पीलिया हुआ था पर अवनी के कारण ज्यादा बढ़ नहीं पाया था और शुरुआत में ही इलाज हो गया था।

छुट्टियाँ  शुरू हो गयीं। ट्रेन में इलाहबाद तक अधिकांश लोग साथ में थे। अवनी अपनी सीट पर बैठी एक किताब पढ़ रही थी और आकाश गिटार पर कुछ बजा रहा था।

लोग कहते थे, मंज़िल अभी दूर है।
गुमराह करना राहों का दस्तूर है।
कितनों ने राहों में ही आशियाँ बना दिया।
मंज़िल की चाह ने कितनों को तनहा बना दिया।

पर एक दिन हम जो घर से चले
हम चलते गए , रस्ते बनते गए।

कभी धुंधलाती शामों में , कभी मुस्काती सुबहों  में
बारिशों में, कभी आँधियों में।
कभी उजली सी धूप में, कभी छलकी सी बूंदों में
भीड़ में कभी वीरानियों में ।

यारों जो हम  अपने घर से चले
हम चलते गए , रस्ते बनते गए।

हम जो चलते गए , रस्ते बनते गए।

बाहर रात घिर आयी थी , अवनी ने किताब बंद कर दी और लेट गयी।

आकाश अब अवनी की तरफ एक खिंचाव सा महसूस करने लगा था। जी करता था उसके साथ वक़्त बिताये , कुछ हँसी मज़ाक करे या कुछ गम्भीर बातें करे, पर साथ में रहे। लेकिन अवनी इन सब से अनजान थी।

इलाहबाद में अवनी उतरी तो आकाश ने उससे उसका नोवेल मांग लिया , बात करने का कुछ तो बहाना चाहिए था।
''ये नोवेल , ये तो हिंदी में है। ''
''कोई नहीं, मैं पढता हूँ न हिंदी नोवेल, तुम मुझे दे दो मैं कॉलेज में वापस कर दूंगा। अभी मुझे बहुत आगे जाना है, टाइम पास हो जाएगा । ''
''ठीक है , ये लो। ''  अवनी ने नोवेल उसे पकड़ा दिया।
आकाश नोवेल को काफी देर तक देखता रहा , शायद अवनी की निशानियाँ देख रहा था , शायद हवा के झोंके के साथ उसकी साँसों की महक उस किताब से उड़कर चली आये। या ऐसा ही कुछ।

ट्रेन चल पड़ी , और उसने नोवेल पढ़ना शुरू किया।

x                                                                        x                                                                      x

नीतू और माया खिड़की के पास बैठे थे।   नीतू की आँखें नम थीं।  गोद में एक छोटी सी बच्ची टुकुर टुकुर देख रही थी।
''ये तो बहुत बुरा हुआ नीतू। मुझे तो विश्वास नहीं होता । इतने अच्छे हस्पताल होते हैं शहर में , सब सुविधाएं होती हैं , फिर भी वो लोग चित्रा को ?''
''हाँ माया ,भाभी का केस थोडा कम्प्लिकेटेड था और डॉक्टर ने उसे चेताया भी था , पर उसने ये बात भैया को नहीं बतायी, उनको तो तब पता चला जब भाभी की डिलीवरी होने वाली थी।  बहुत प्यार था चित्रा भाभी को बच्चों से , अपना खुद का बच्चा चाहती थी वो, किसी भी कीमत पे। ''
''और ये कीमत चुकानी पड़ी। उफ़। '' माया ने आँखें बंद कर लीं थी।
''भैया तो सदमे में हैं , पता नहीं आगे क्या करेंगे , कैसे संभालेंगे अपने आप को। ''
''और इस बच्ची को ? इसको कैसे संभालेंगे ?''
''वो नहीं सम्भाल पाएंगे माया। इसीलिए तो अब ये बच्ची इसके दादा दादी के साथ रहेगी।  मैं खुद शादी करके इतनी दूर चली गयी वर्ना मैं ही इसकी परवरिश में थोड़ी मदद कर देती। ''
'' तू सच में बहुत दूर चली गयी नीतू , बहुत याद आती है तेरी। ''
''लेकिन माया तू यहाँ क्या कर रही है ? पति साथ आये हैं कि नहीं ?''
''नहीं मैं अकेली ही आयी हूँ। वो तो नौकरी  के सिलसिले में दूर ही रहते हैं।  वैसे परिवार इसी शहर में रहता है , अपना घर है । मैंने कॉलेज में नौकरी ज्वाइन कर ली है , इसलिए घर लौटते हुए अक्सर यहाँ से होक जाती हूँ। ''
''मुझे ख़ुशी है तू अपने पाँवों पर खड़ी है , मुझे तो ये नौकरी भी नहीं करने देते , घर में ही बोर होती रहती हूँ। ''
 बच्ची रोने को हुई तो माया ने गोद में ले लिया।  बहुत खुश थी माया उसे गोद में लेके, और बच्ची भी चुप हो गयी थी।
''चल मैं चलती हूँ इसको लेके घर , दूध पिलाना पड़ेगा बोतल से। '''
माया का मन नहीं कर रहा था उसको छोड़ने का।
नीतू के जाने के बाद माया ने चाची से बात की। उनको समझाया कि वो माया के बारे में उन लोगों को कुछ न बताएं।

माया अक्सर उस नन्ही बच्ची के घर चली जाती और उसको गोद में लेके खूब खिलाती। उसका मायका और ससुराल एक ही शहर में था।  बच्ची भी उसके साथ खूब खुश रहती।  बीच बीच में शरद बाबू भी आते अपनी बेटी से मिलने , पर उन दोनों के बीच कुछ संवाद  नहीं होता।

फिर एक दिन नीतू वापस आयी। उसने महसूस किया कि माया अब अपने मायके में ही रह रही है। उसने चाची से जानने  की कोशिश की पर चाची टाल गयी। नीतू ने माया से सीधी बात की , उसे अपने ससुराल लेके चलने को कहा , पर माया ने कोई बहाना कर लिया।  नीतू का शक अब गहरा होता जा रहा था कि माया की ज़िन्दगी में सब कुछ सही नहीं था , कुछ तो दिक्कत थी।

बच्ची को प्यार से सब निम्मी बोलते थे। जब वो दो साल की होने आयी तो शरद बाबू ने अपने माँ पिता से शहर आने को कहा ताकि निम्मी की पढाई  अच्छे स्कूल से हो। उन्होंने शरद से दुबारा शादी करने का प्रस्ताव दिया पर शरद ने उसे सिरे से खारिज कर दिया।  वो अपनी बच्ची के लिए सौतेली माँ नहीं लाना चाहता था। दोनों बहुत दुखी थे , अपने बेटे को इस तरह तनहा रहकर अपनी ज़िद पर अड़े देखकर। अंत में उन्होंने शरद के साथ शहर  चलने का फैसला किया। आखिर निम्मी  की ज़िन्दगी भी तो सँवारनी थी।

उनके शहर जाने की बात सुनकर माया को बड़ा धक्का लगा।  वो निम्मी से इतना घुल मिल गयी थी कि उसको अपनी खुद की बेटी मानने लगी थी। उसने जाने से पहले निम्मी की दादी से अनुरोध किया कि वो उसे शरद बाबू का घर का पता बता दें ताकि कभी निम्मी से मिलने का मन हो तो वो चली आये। बोलते हुए उसने खुद को बहुत संयत किया । शरद बाबू ने उसको अपना पता कागज़ में लिखकर दे  दिया।
उनके जाने के बाद माया देर तक रोती रही। उसकी चाची से  देखा नहीं जाता था।

''अरी इतना क्यों रो रही है ? चुप हो जा अब। दूसरों की बेटी से इतना मोह ?''
''एक बच्चा मेरी कोख में दिया था भगवान् ने वो भी चला गया। ''
''ऐसा क्यों बोल रही है ? ये कोई आखिरी बच्चा था क्या दुनिया में ? तेरी कोख भी फलेगी। अपना बच्चा होगा तेरा।  डॉक्टर ने बोला था न , सारे टेस्ट्स ठीक निकले थे तेरे। ''
''मेरे अकेले के  टेस्ट्स ठीक निकलने से क्या होता है। न ये कभी अपने टेस्ट करवाएंगे, न डॉक्टर कुछ कर  पाएंगे और ..."
''बस बस , शुभ शुभ बोल। सब ठीक होगा। ''

x                                                                       x                                                                           x

शरद बाबू सब  को लेकर शहर आ गए। वहाँ उन्होंने एक नौकरानी की व्यवस्था कर दी थी ताकि दादा दादी को ज्यादा कष्ट न हो निम्मी के पालन पोषण में।  शरद उसे अधिक वक़्त नहीं दे पाते थे , काम में बहुत व्यस्त रहते थे ।  दादा दादी भी निम्मी के भविष्य के लिए चिंतित रहते थे। पहले तो माया आ जाती थी खेलने के लिए , पर अब तो  अनजान शहर में कोई अपना ही नहीं था।
एक दिन दरवाजे की घंटी बजी।  देखा तो माया खड़ी थी। दादी खुश भी थी ,  और हैरान भी।
माया ने जी भर के निम्मी से खेला। बहुत खुश थी निम्मी उसको देखकर। दादी ने उससे बहुत पूछा लेकिन माया ने कुछ नहीं बताया। वो तो निम्मी में ही व्यस्त थी। दादी एकटक उसे निहार रही थी। बाद में सिर्फ इतना बताया कि पति का भी तबादला इसी शहर में हो गया है।  शाम को दादी ने मौका देखकर नीतू को फ़ोन किया और माया के बारे में बताया।  नीतू भी उसी शहर में थी पर दुसरे कोने में।

अगले दिन जब माया निम्मी से  मिलके घर लौटी तो थोड़ी देर में दरवाजे पर दस्तक हुई। देखा तो सामने नीतू खड़ी थी। माया हैरान भी थी और परेशान भी। अपनी सच्चाई को छुपाकर रखना चाहती थी पर अब कुछ नहीं हो सकता था।  नीतू अंदर आयी, और देखा कमरे में सिर्फ एक पलंग था। माया अकेली रहती थी। पलंग के एक कोने में नीतू बैठ गयी।

''मुझे पराया समझती है ?''
''नहीं नीतू। ऐसा क्यों बोल रही है ?''
''फिर बताती क्यों नहीं , क्या चल रहा है तेरी ज़िन्दगी में ? इस शहर में क्या कर रही है ? पति कहाँ हैं ?''

माया उठकर खिड़की के पास चली गयी।

''भाग आयी  हूँ अपने अतीत से। सब छोड़कर आ गयी हूँ। ''

नीतू हैरान थी।  माया ने धीरे धीरे उसे पूरी कहानी बतायी। उसके पति और परिवार वाले उसे बच्चा न होने का दोषी मानते थे, जबकि डॉक्टर की राय इसके विपरीत थी। माया मानसिक सदमे में थी। एक तो अपना बच्चा न हो पाने का दुःख, ऊपर से घरवालों के ताने।  पति दूसरी शादी करना चाहता था। खुद की डॉक्टरी जांच करवाने में उसे अपमान महसूस होता था , और रिजल्ट खराब आने का डर भी। बात इतनी बढ़ गयी थी कि माया को भी उसे तलाक देने में कोई ऐतराज नहीं था । माया इस नए शहर में नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू करना चाहती थी।  उसे कॉलेज में नौकरी भी मिल गयी थी। नीतू ये सब गौर से सुन रही थी।

''तलाक हो चुका है ?''
''कार्यवाई चल रही है , एक दो महीने में मिल जाएगा। ''
''माया आई एम् सो सॉरी , इतना सब हो गया पर मैं तेरे साथ नहीं रही।  बस दूर दूर से तेरे हाल चाल पूछती रही। मुझ जैसा नाकारा दोस्त होने से तो न होना अच्छा। ''
''ऐसा मत बोल, तू क्या कर सकती थी , तेरा अपना परिवार है, अपनी जिम्मेदारियाँ । ''
''जो भी हो माया , तू घबराना मत। हम  लोग तो हैं तेरे साथ। तूने अच्छा किया जो यहाँ चली आयी। कभी खुद को अकेला मत समझना। ''

नीतू चली गयी। उसके बाद माया कॉलेज से आकर अपना अधिकांश समय निम्मी के साथ बिताती थी। नीतू ने दादी को बता दिया था माया के बारे में , इसलिए वो भी कुछ नहीं बोलती थीं। एक बार नीतू घर आयी हुई थी और माया और निम्मी को खेलते हुए देख रही थी।  निम्मी उसे ''आंटी माँ '' कहकर बुलाती थी। बहुत आत्मीयता थी दोनों के बीच। नीतू को लगने लगा था कि निम्मी के लिए उससे बेहतर कोई माँ नहीं हो सकती , और इसलिए एक  दिन सही मौका देखकर उसने माया से अपने दिल की बात कह दी, कि वो उसके भैया से शादी कर ले , सच में माँ बन जाए निम्मी की।

पता नहीं क्या चलता था माया के दिल में , नीतू की बात उसने सिरे से खारिज कर दी। कहती थी , सौतेली माँ नहीं बनेगी उसकी , आंटी माँ बनकर बहुत खुश है वो।  दूर रहकर भी उसे अपनी बेटी की तरह पालती है , कोई कसार नहीं छोड़ी है उसने। अब और रिश्ते नातों के बीच नहीं उलझना चाहती।  पता नहीं नीतू को कितना समझ में आया और कितना नहीं , पर माया की हठ के आगे उसकी एक न चली।  निम्मी यूँ  ही पलती रही , दिन में माँ की गोद में और रात को पापा के सिरहाने।

मेरे जिस्म का न सही
रूह का एक हिस्सा है तू।
तुझसे दूर कहाँ जाऊँगी ।
बिटिया मैं तेरे बिन
रह न  पाऊँगी ।

तेरी साँसों से मुझमें साँस आयी।
तेरे आने से ज़िंदा हुई हूँ मैं
तेरी माँ हूँ मैं ,  लाड़ली तू मेरी
बस यही सुकून लिए
अब जहाँ से जाऊँगी   ।

माया और निम्मी के बीच ऐसा अगाध स्नेह था जिसके चलते उनके रिश्ते  को किसी कागज़ी दस्तावेज की ज़रुरत नहीं थी।  शरद माया की बहुत इज़्ज़त करता था , और ये भी जानता था कि माया ऐसे ही खुश है , इसलिए उसकी और अपनी बेटी की खुशियों की खातिर उसने माया से शादी का आग्रह नहीं किया। वक़्त गुजरता रहा , निम्मी माया की छाँव में पलकर बड़ी होने लगी।

जल्द ही उसने दादी के कहने पर शरद के बिलकुल बगल वाला घर किराए पर ले लिया। अब वो निम्मी को ज्यादा वक़्त दे पाती थी।

माया ने कॉलेज में पढ़ाने के साथ साथ अपनी रचनाएं प्रकाशन के लिए भेजनी शुरू कर दीं थीं , और वे धीरे धीरे छपने भी लगीं थीं और माया के घर पाठकों के पत्रों का अम्बार भी लगने लगा था।  वक़्त के साथ माया के  कविता संग्रह और उपन्यास भी बाज़ार में आये और खासे लोकप्रिय हुए।  माया की लेखनी में संवेदना थी , अनुभूति  थी , पाठक उसका दर्द महसूस कर पाते थे।

माया की यही खूबी वक़्त के साथ निम्मी में भी उतरती गयी। अपने हमउम्रों से कहीं ज्यादा परिपक्व थी वो।  अपनी सगी माँ से उसे सुंदरता विरासत में मिली थी और अपनी आंटी माँ से संस्कार। उसके पापा को बहुत गर्व होता था अपनी बेटी पर, लाखों में एक थी।

x                                                                     x                                                                         x

आकाश घर पर अपने कमरे में आराम कर रहा था। पापा अंदर आये।

''हो  गयी नींद पूरी ? जब से आया है सो ही रहा है। ''
''हाँ पापा , वो ट्रेन में। '' फिर उसे याद आया  क्या हुआ था ट्रेन में।  नोवेल एक ही साँस में पढ़ डाला था उसने। और फिर देर तक अपर बर्थ में बैठा रोता रहा था। आकाश की माँ नहीं  थी।  बचपन में ही गुजर गयी थी। पूरा नोवेल एक माँ के दर्द पर आधारित था , जो अपने खोये बेटे को तलाश रही थी।  आकाश को महसूस हुआ मानो उसी की माँ किताब से बाहर आकर कह रही हो कि बेटा मैं तुम्हारे पास हूँ, मुझे महसूस करो।

उसे बहुत अकेला सा महसूस हो रहा था।  उसने अपने एक दोस्त से अवनी का फ़ोन नंबर लिया और अवनी को फ़ोन लगाया।  अवनी ने ही फ़ोन उठाया।

""हैलो ?''
''अवनी ? मैं आकाश। '' आकाश आवाज़ पहचान गया।
'' आकाश ? क्या हुआ ? "" अवनी हैरान थी।
'' पता नहीं। '' आकाश को समझ नहीं आ रहा था क्या कहे।
''मतलब ? कुछ प्रॉब्लम है ? बताओ मुझे। '' अवनी को और कुछ नहीं तो दूसरों की प्रॉब्लम सोल्व करने में बड़ा सुकून मिलता था।
'' वही तो , अवनी।  मुझे पता ही नहीं कि प्रॉब्लम क्या है , पर मैं परेशान ज़रूर हूँ। '''
''तुम्हारा दिमाग घूम गया है , चलो फ़ोन रखो। ''
''नहीं नहीं अवनी फ़ोन मत काटना।  असल में मैंने तुम्हारा दिया हुआ नोवेल पढ़ा था , बस तभी से  परेशान सा था , सोचा तुमसे ही बात कर लूं। ''
'' ओह तो तुम्हें पसंद नहीं आया ?'''
''पसंद नापसंद की बात नहीं ... मुझे कुछ कचोट सा रहा है जब से इसे पढ़ा है। ऐसा लगता है जैसे इसके किरदार मुझे छूकर गुजरे हों , ऐसा लगता है जैसे जिस चीज की तलाश मैं कर रहा हूँ वो भी कहीं मेरी तलाश कर रही है। ''
''उफ़ , मेरी समझ के बाहर है।  मैंने भी वो नोवेल पढ़ा पर मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा, पर हाँ मुझे पसंद ज़रूर आया। तुमको क्या हो गया है। घर गए हो , घूमो फिरो ,  सब क्या बकवास कर रहे हो। ''
''नहीं अवनी , एक तुम ही हो जो अब मेरी मदद कर सकती हो। क्या तुम इस लेखिका को जानती हो ? क्या नाम था , अनुजा ? क्या कोई और नोवेल भी पढ़ी है तुमने इनकी ?''
अवनी हँसने लगी। आकाश चुप था, इंतज़ार कर रहा था कि हँसी पूरी हो और अवनी उसके सवालों के जवाब दे।  और उसने दिया।
'' आकाश मुझे नहीं पता था कि मैं ये बात तुम्हें कभी बताउंगी , क्योंकि ये मेरा बहुत निजी मामला है।  पर हाँ , मैं इस लेखिका को जानती हूँ। लेकिन मैं निश्चिन्त तौर पर कह सकती हूँ कि वो तुम्हें नहीं जानती। इसलिए उनके किरदारों का तुम्हें छूकर गुजरने का कोई सवाल ही नहीं उठता।  ''
''अवनी वो सब मुझे पता नहीं , पर मुझे एक बार उनसे मिलना है।  तुम बता सकती हो वो कहाँ रहती हैं ? ''
अवनी कुछ पल के लिए चुप हो गयी।  कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे कि आकाश क्या बोले जा रहा था।  क्यों मिलना चाहता था वो अनुजा जी से। कुछ सोचकर अवनी बोली।
''मिला सकती हूँ , अगर इतना ही परेशान हो तो। लेकिन उसके लिए तुम्हें यहाँ आना पड़ेगा। ''
''तुम्हारे शहर में रहती हैं वो ? तुम कैसे जानती हो उन्हें ? तुम तो खुद भी लिखती रहती हो न , इसीलिए जानती हो ?''
''वो सब बाद में। अभी मेरी बात मानो और जिस काम के लिए घर गए हो वो काम करो , वोकेशनल ट्रेनिंग करनी है न ? वक़्त कहाँ है तुम्हारी जिज्ञासाओं को शांत करने का। ''
''ठीक है अवनी , थैंक्स , ये काम करवा दोगी तो एक साल तक मुफ्त चाय समोसा खिलाऊंगा , और चाय भी अदरक वाली।  मैं जानता हूँ अदरक का स्वाद। ''
अवनी ने हँसते हुए फ़ोन काट दिया।

आकाश की बेचैनी बढ़ती जा रही  थी।  पर मामला उसकी माँ से जुड़ा  था  इसलिए वो पापा से बात नहीं करना चाहता था।  बहुत उदास हो  उठते थे वो माँ का नाम सुनकर। उसने  अब तक अपनी माँ की तस्वीर तक नहीं देखी  थी। लेकिन पापा  ने भी तो कोई कमी  नहीं छोड़ी थी उसकी परवरिश में , और  साथ में दादा दादी का प्यार , वक़्त ही कहाँ रहता था माँ को याद करने का।   और फिर ये नोवेल।

आकाश की एक महीने की ट्रेनिंग पापा ने उसके शहर में ही करवाने का इंतजाम कर लिया था। पर आकाश का मन अब एक पल भी वहाँ नहीं लग रहा था।  उसने  अपने एक भोपाल  के दोस्त से कहके अपना नाम उनके साथ लिखवा दिया। भोपाल में ही अवनी का घर था और वो भी उसी बैच के साथ ट्रैनिंग में जाने वाली थी। अब आकाश को सुकून मिला कि एक महीने आराम से अपने मन में उमड़ रहे सवालों के जवाब ढूंढेगा।

पापा को पता चला तो थोड़ा  हैरान हुए कि बेटा अपनी एक महीने की  छुट्टियां उनसे दूर बिताना चाहता है , पर  उन्होंने ज्यादा सवाल जवाब नहीं किये।  बेटे की ख़ुशी में ही उनकी ख़ुशी थी। आकाश ने अपना सामान बाँधा और चल  दिया।

कहते हैं कि सायों के
वजूद नहीं होते
कहते हैं कि ख़्वाबों के
सबूत नहीं होते

फिर कैसे,  वो मुझे
जीने नहीं देते
रहने नहीं देते
सोने नहीं देते

और चल पड़ा हूँ
किसी की तलाश में
तनहा अकेला सा
भूला बिसरा सा।

कहीं गुम न  हो
इक साया अंधेरों में
कहीं रह न जाए
इक ख्वाब, अधूरा सा।

भोपाल आ गया , और उसने अपना रहने का इंतजाम एक बॉयज हॉस्टल में कर दिया।  अगले दिन जब अवनी वोकेशनल ट्रैनिंग के लिए भेल की फैक्ट्री के बाहर पहुंची तो आकाश को देखकर हैरान रह गयी। उसे समझ आ गया था कि आकाश यहाँ क्यों आया था। आकाश पूरा दिन उसके इर्द गिर्द घूमता रहा। शाम को मौका पाकर उसने अवनी को कॉफ़ी का न्यौता दिया ताकि उससे अकेले में बात कर सके।  अवनी ने न चाहते हुए भी हाँ कर दिया क्योंकि उसे मालूम था कि आकाश इतनी दूर आया है तो इतनी आसानी से तो उसे छोड़ेगा नहीं।  बाकी दोस्त इन दोनों को छेड़े जा रहे थे, उन्हें कहानी के पीछे की  भूमिका नहीं मालूम थी।

कॉफ़ी शॉप में दोनों एक  टेबल पर  बैठ गए।  आकाश ने कॉफ़ी आर्डर की।

''क्यों आ गए यहाँ ? ''
''तुम्हें  उस दिन बताया था, पर फ़ोन पर अच्छे से समझा नहीं पाया। आज उसी बारे में तुमसे बात  करना चाहता था। ''
''बोलो , क्या बात है ?'''
''अवनी , मेरी माँ नहीं है। मुझे मेरे पापा ने और  दादा दादी ने पाला । मेरे घर में मेरी माँ का कभी  ज़िक्र  भी नहीं होता।  यहाँ तक कि मैंने अब तक उनकी तस्वीर तक नहीं  देखी। मुझे बचपन से बताया गया था  कि मेरी माँ मर चुकी थी ,  लेकिन फिर उनकी कोई याद, कोई निशानी क्यों नहीं मुझे दिखती ? क्यों उनका नामो निशाँ मेरे घर से मिटा दिया गया , ये बात मुझे कभी समझ नहीं आयी। ''
''हम्म।'' अवनी गम्भीरता से सुन रही थी।
''उस दिन तुम्हारा दिया नोवेल पढ़ा तो लगा जैसे मेरी माँ ही उसकी नायिका है , जो पहले अपने अंधे प्यार में अपने बेटे और घरबार छोड़कर भाग गयी थी पर जो बाकी की ज़िन्दगी एक शाप की तरह  जीती रही।  न इधर की रह पायी न उधर की। न तो उस आदमी की होक रह पायी जिसके लिए घर और बच्चा छोड़कर भाग गयी थी , और न ही फिर कभी अपार पश्चाताप के बावजूद उस ज़िन्दगी में वापस कदम रख पायी। ''

''आकाश मुझे लगता है तुम ख़ामख़ाह  इतने परेशान हो रहे हो ।  ये कहानी तुम्हारी ज़िन्दगी से  मिलती जुलती हो सकती है , पर इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारे पापा , दादा दादी तुमसे इतना बड़ा झूठ बोलेंगे। इन सब कहानियों को अपने दिमाग पर हावी मत  होने दो , ये सब किस्से कहानियों की बातें हैं। ''

''नहीं अवनी , अगर ये  वहम है तो मुझे इसे दूर करना है। मैं अनुजा जी से मिलना चाहता हूँ। वही मेरे इस वहम को दूर कर सकती हैं। तुम तो उन्हें जानती हो न ? मुझे उनसे मिलवा दो न ?''

''ठीक है , मैं तुम्हें उनके घर का पता बता दूँगी।  तुम इस सन्डे उनसे मिल लेना। वो सन्डे को फ्री रहती हैं। मैं उन्हें बताके रखूंगी तुम्हारे बारे में।  ''
''सन्डे , वो तो बहुत दूर है। थोडा जल्दी नहीं मिल सकते ?''
''अगर मेरे साथ चलना है तो सन्डे को ही चलना होगा। और दिन मेरे पास टाइम नहीं।  तुम्हारी तरह ट्रैनिंग बंक करके घूमने फिरने का मेरा कोई इरादा नहीं। ''
''ठीक है , सन्डे को ही चलते हैं।  लेकिन मुझे एड्रेस लिखवा दो। ''
अवनी ने थोडा सोचा , फिर उसे पता लिखवा दिया। दोनों की कॉफ़ी ख़त्म हो चुकी थी।

अगले दिन ट्रैनिंग में आकाश ने खूब मजे किये। अवनी गम्भीरता से प्लांट के अंदर की जानकारियां ले रही  थी और आकाश उसे पीछे से  छेड़े जा रहा था। अंत में उसने कैंटीन के बाहर चाय पीते हुए अपना माउथ ऑर्गन निकाला और धीमे से उसे बजाते हुए गाने लगा।

तुम जब ट्रांसफार्मर्स से बातें करती हो
अच्छी लगती हो।

शायद पूछती हो ,कि  उन्हें बिजली से
 करंट क्यों नहीं लगता।
बारिश में बिना छतरी के उनको
सर्दी नहीं होती क्या।
और जवाब में वो कहते होंगे।
हम्म हम्म हुआ हुआ ।

तुम जो करती हो , जैसे करती हो
अच्छी लगती हो।

बिजली का हर तार
तेरी ज़ुल्फ़ों की डोर है ।
मोटर की आवाज में
तुम्हारी साँसों का शोर है।
जो तुम नहीं , तो  रौशनी नहीं
एक एक इलेक्ट्रान पर तुम्हारा ज़ोर है ।

आ जाओ मेरी ज़िन्दगी में
जल उठेंगी बरसों से गुल बत्तियां।
छा जाएंगी फ़िज़ाओं में बिजलियाँ।

अवनी की चाय  ख़त्म हो चुकी  थी  और वो  आगे बढ़ चली थी। आकाश के चेहरे पर हलकी सी मुस्कराहट तैर रही थी।

शाम को आकाश अपने रूम में अकेला लेटा हुआ था।  उसका दोस्त विपुल जिसका वो रूम था , कहीं गया हुआ था।  आकाश को फिर से बेचैनी होने लगी थी। रह रह कर लगता था जैसे कोई उसे पुकार रहा था।  जैसे उसका एक पल भी आराम करना गुनाह था।  उसने थोडा सोचा , फिर अवनी का दिया पता लेकर बाहर निकल गया।

उसके दिलो दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया था। बस चला जाता था किसी की तलाश में।  मन में ख़याल आता था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाय , बात बिगड़ न जाय , सन्डे तक रुक लिया जाय , पर सब्र नहीं होता था। अब जो होगा देखा जायेगा , यही सोच रहा था आकाश।

अवनी के दिए पते पर पहुँचने में उसे  बीस मिनट लग गए। सामने एक डुप्लेक्स की कतार थी।  अवनी के बताये डुप्लेक्स में नाम नहीं डला था , सिर्फ नंबर लिखा था। उसने हिम्मत करके घंटी बजायी। एक  वृद्ध आया ने दरवाजा खोला। आकाश ने उससे अनुजा जी से मिलने की इच्छा जाहिर की।  वृद्धा अंदर चली गयी , और थोड़ी देर में आकाश को लेकर अंदर स्टडी रूम में चली गयी। वहीं अनुजा जी अपने मेहमानों और पाठकों से मिलती थीं।

थोड़ी देर में अनुजा जी अंदर आ गयी। आकाश खड़ा हो गया और नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़ दिए । अनुजा जी ने उसे बैठने को कहा और खुद भी बैठ गयी।
''कहो बेटे , कौन हैं आप , कैसे आना हुआ ? '' उनके स्वर में आत्मीयता थी।  आकाश सोच रहा था, क्या हर अनजान शख्स से वे ऐसे ही मिलती होंगी।

''जी वो ...मेरा नाम आकाश है ।  मैं कोलकाता से आया हूँ।  मैंने ज्यादा कुछ तो नहीं लेकिन आपका एक उपन्यास पढ़ा था , हाल ही में।  बस वही मुझे यहाँ तक खींच लाया। '' आकाश को समझ नहीं आ रहा था कि वो अपने मन की बात किन शब्दों में और कैसे उनके सामने प्रस्तुत करे। लगता था अब तक अवनी ने उसके बारे में उन्हें कुछ नहीं बताया था।

'  कौन सा उपन्यास बेटा ? और आप हिंदी उपन्यास पढ़ लेते हो ? नयी शहरी पीढ़ी तो मेरे पाठक वर्ग में है ही नहीं !''
''जी उसका नाम '' अश्रुधारा  '' था। मुझे एक दोस्त ने दी थी एक सफ़र के दौरान, वर्ना  आप ठीक ही कह रही हैं मैं अब तक अंग्रेजी के ही नोवेल्स पढता आया हूँ।  ''
अनुजा जी उसकी आँखों में देखे जा रही थीं  , शायद समझने की कोशिश कर रहीं थीं कि आकाश को यहाँ क्या खींच लाया था , या फिर कुछ और बात थी।

''मैं आपको आंटी बुला सकता हूँ न ?''
''   बिलकुल। ''
'' आंटीजी मैंने जब आपका उपन्यास पढ़ा तो मैं लगभग पूरी रात रोया था। ''
अनुजा उसकी आँखों में देख रही थी , एकटक।
'' मैं कैसे कहूँ आपसे। दिल को छू  जाती है  वो कहानी।  विश्वास नहीं होता कि ये कहानी पूर्णतः आपकी कल्पना से उपजी है।  ऐसा लगता है जैसे एक निरीह और निराश माँ ने आकर आपको अपनी कहानी बयान की है जिसे  आपने अपने शब्दों के जादू में पिरो दिया है। ''

अनुजा की तन्द्रा भंग हुई।

''बेटे उस उपन्यास को लेकर बहुत लोग मेरे पास आये , आपकी ही तरह।  बहुतों ने मुझे पत्र भी लिखे। उनको लगता था जैसे ये उनकी ही कहानी है। बिलकुल हो सकती है बेटा , ये किसी की भी कहानी हो सकती है , इस पर मेरा कोई अधिकार थोड़े ही है। एक कहानीकार कहानी बुनने के लिए निश्चय ही कल्पना का सहारा लेता है , पर उसके तत्व  तो उसकी खुद की ज़िन्दगी में  आते जाते वे  लम्हे हैं जो उसके दिल  पर कहीं अंकित हो जाते हैं और फिर कल्पना के ज़रिये उसकी कलम तक पहुँचते है। मुझे नहीं लगता कि कोई भी कहानीकार अपनी कहानी में पूरी तरह कल्पना का सहारा ले पाता है। ''

'' आप ठीक कहती हैं , इसीलिए आपकी कहानी इतनी अपनी सी लगती है।  लेकिन फिर भी , आंटी जी , ये कहानी बिना किसी सुखद  मोड़ के ख़त्म हो जाती है।  पाठकों को लगता है   कि नायिका के साथ साथ वो भी मंझधार में   छोड़ दिए गए हैं ।  यदि ये कहानी वास्तव में आपकी कल्पना की है तो फिर इसका एक सुखद अंत क्यों नहीं दे दिया आपने , क्यों नहीं मिलवा दिया उसे अपने  बेटे से ? मेरे जैसे कितने पाठक रातों को रोये होंगे। कितनों को लगा होगा कि इस अंत को बदल दें। आखिर आपके पाठक संवेदनाशून्य तो नहीं। ''

''बेटे , क्या ज़िन्दगी में सिर्फ सुख ही सुख है ? क्या बचपन से लेकर अब तक आप कभी दुखी नहीं हुए , किसी भी बात को लेकर ? ''
''बिलकुल  हुआ हूँ, लेकिन कहानी के बीच में दुःख आने और कहानी का दुखद अंत होने में बहुत फर्क है।  ऐसा अंत भीतर से हिला के रख देता है।  लगता है जैसे ये जो ज़िन्दगी  हम  जी रहे हैं ,  ये भी  ऐसे ही ख़त्म हो जायेगी। एक निराशा सी भर जाती है। ऐसा अंत तो कोई पत्थरदिल या संवेदनाशून्य व्यक्ति ही लिख सकता है। ये आप कैसे लिख पाईं ?''

''बेटे शायद आपने मेरी बात ठीक से समझी नहीं।   आजकल की ज़िन्दगी में मनोरंजन के नाम पर वही चीज परोसी जाती है जो सामने वाले को पसंद हो। सच्चाई क्या है , भूख, गरीबी , और इन सब के बीच गायब होती हमारी संवेदना।  ये संवेदना तब तक गायब रहेगी जब तक इसे कोई ज़बरदस्ती खींच कर हमारे सामने नहीं पटकेगा । साहित्य का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन करना नहीं , उसकी एक नैतिक ज़िम्मेदारी भी है , समाज को आईने की तरह प्रस्तुत करना।  असल ज़िन्दगी में हम खुश रहते है क्योंकि हमें सितारों से जड़ी कहानियां परोसी जाती हैं , पर जैसे ही हम इस आईने से रूबरू होते हैं , डर जाते हैं , परेशान हो जाते हैं ,   आँख मूँद लेते हैं। तो क्या हम एक सपने में नहीं जी रहे ? जब तक साहित्य हमें अंदर से झकझोरेगा नहीं और आइना नहीं दिखायेगा हम तो कभी होश में ही नहीं आयेंगे।  और जब तक होश में नहीं आयेंगे और दिल पर चोट नहीं खायेंगे हम समाज को सुधारेंगे कैसे।  कहाँ से लायेंगे वो जज्बा ? आज आप मेरी जिस कहानी  के अंत को  इतना बुरा भला कह रहे हैं अगर वो अंत वैसा नहीं होता तो आज क्या आप इतनी दूर चलकर मेरे पास आते ? कल को आपके सामने वैसी ही परिस्थिति आएगी तो क्या आप उस नायिका को दूसरा मौका नहीं देंगे अपनी भूल को सुधारने का ? कहानी का असली अंत ये नहीं है बेटा , ये तो शुरुआत है , अंत की  दिशा तो वो चोट खाया पाठक निर्धारित करता है, अपनी खुद की ज़िन्दगी में । ''

आकाश विस्मृत सा सब सुन रहा था। सच ही तो बोल रही थीं अनुजा जी।  वो टीस ही तो थी जो उसे खींच लायी थी यहाँ तक ।  पर  उसका असल मुद्दा तो बीच में कहीं ग़ुम  हो गया था।  समझ में नहीं आता था उनसे कैसे पूछे , इतना सब सुनने के बाद।

''आंटीजी , आपने मुझे निरुत्तर कर दिया है।  समझ नहीं आता क्या कहूँ।  वैसे मैं भी उन पाठकों में से एक हूँ जिन्हें लगता है कि ये उनकी कहानी है।  मुझे लगता है जैसे इसकी नायिका मेरी खुद की माँ है। मुझे बस यही पूछना था कि आपने किस को देखकर ये कहानी लिखने का निर्णय लिया ? क्या ऐसी कोई नायिका वास्तव में है जिन्हें आप जानती है ? मैं उनसे मिलना चाहता हूँ।  शायद मेरे खुद की ज़िन्दगी के मायने मिल जाएँ। '''

''बेटे मैंने कहा न , ये कल्पना के कागज़ पर वास्तिवकता के छींटे हैं , पर इसके बीच अपने जीवन के मायने ढूंढना खुद को एक भूल भुलैया में झोंक देना है , ये किरदार मेरे मन की उपज हैं।  यही तुम्हारे सवाल का जवाब है। ''

अनुजा ने आखिरी बार आकाश की निगाहों में झाँका , मानो अगली कहानी का किरदार बुन रही हों।

आकाश निराश था।  पर अब अधिक वक़्त जाया करने का कोई मतलब नहीं था।  अनुजा जी ने जितना बताया था , उससे अधिक बताने की उम्मीद करना व्यर्थ था।  उनके शब्दजाल और गहरे होने थे , आकाश को और उनमें उलझ जाना था , इससे बेहतर था इस किस्से को यहीं ख़त्म करना।

आकाश ने अनुजा जी से हाथ जोड़कर विदा ली और बाहर निकल गया। गेट के बाहर कुछ देर हताश सा खड़ा था।  सोच रहा था यहीं से ऑटो ले ले और सीधा हॉस्टल पहुँच जाए। किसी ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखा।

''कॉफ़ी नहीं पियोगे ?'' अवनी मुस्कुरा रही थी।

''तुम ? तुम यहाँ क्या कर रही हो ?  ''

'' पहले तुम बताओ कि तुम यहाँ क्या कर रहे हो ? ''

आकाश झेंप गया। अवनी हँसने लगी।

''चलो बाकी बातें घर पर करते हैं।  अनुजा जी की पडोसी हूँ मैं , समझे ! ''

आकाश के चेहरे पर मिश्रित भाव थे।  कुछ पल पहले की उदासी अब प्रश्नचिन्ह और फिर एक मीठी सी ख़ुशी में तब्दील हो गए थे।  जिस अवनी से बात करने के वो बहाने तलाशता था वो इस तरह अचानक से सामने आ गयी थी , और तो और कॉफ़ी के लिए भी पूछ रही थी।

''सही है ! चलो चलते है !'' आकाश अवनी के पीछे चल दिया।

अवनी के घर में शायद कोई नहीं था।  काफी बड़ा घर था , और करीने से सजाया हुआ , बिलकुल अवनी छाप।  आकाश कभी कभी सोचता था , कैसी होगी अवनी की माँ जिनकी परवरिश में अवनी जैसी गुणी लड़की का सृजन हुआ।

''चाय या कॉफ़ी ?''

''चाय, अदरक वाली अगर पॉसिबल हो तो !''

'''बिलकुल , दो मिनट वेट करो। '' थोड़ी देर में अवनी चाय और बिस्कुट लेके आ गयी।

''मुझे यकीन नहीं हो रहा। '' आकाश जैसे कोई सपना देख रहा था।

''खुद को देखा आईने में ? चाय पियो और थोडा होश में आओ। ऐसा लगता था जैसे गिर ही जाओगे गेट के सामने !'' अवनी ने आकाश की तन्द्रा भंग की। आकाश हलके से मुस्कुराया।  अंदर से उसे पश्चाताप हो रहा था कि उसने सन्डे का वेट नहीं किया और इस तरह मुंह उठाकर चला आया अनुजा जी से मिलने।

'' तुम तो बहुत गुस्सा होगी न मुझसे।  तुम्हें बिन बताये इस तरह। ''

''नहीं , मैं तुम्हें एक्सपेक्ट कर ही रही थी।  मैं यही देखना चाहती थी कि तुम कितने उतावले हो अपनी बात के लिए। और मैं मान गयी , तुम मज़ाक नहीं कर रहे थे। ''

''है न ? नहीं कर पाया बिलकुल भी इंतज़ार। लेकिन क्या फायदा। इससे अच्छा तो सन्डे को ही मिल लेता , या फिर कभी नहीं। अनुजा जी को लगता है हर दूसरा आदमी मेरी तरह सोचता है। उन्हें क्या मालूम... कितनी मिलती जुलती है मेरी कहानी उनकी कहानी से। बिन माँ का बेटा हूँ। जिसकी कोख से जन्म लिया उसकी एक तस्वीर , एक निशानी भी नसीब नहीं मुझे।  ऐसा भी क्या हुआ था । न तो मैं अपनी माँ की मौत का मातम मना पाता हूँ और न उनसे जुड़े अपने सवालों के जवाब खोज पाता हूँ।  जीने की इच्छा नहीं रह गयी। मन करता है आज अभी इसी वक़्त तुम्हारे हाथ से आखिरी चाय पियूं और फिर कहीं दूर चला जाऊं, जहां न दिल काम करता हो न दिमाग। ''

अवनी चिंतित हो गयी थी। आकाश के मन की बात समझना और उसकी गम्भीरता को आंकना मुश्किल होता जा रहा था।

''वैसे  तुम्हारी मॉम  कहाँ हैं ? घर पर कोई नहीं है क्या ?''

''मेरी मॉम बाहर हैं काम से , और पापा तो रोज़ लेट आते हैं।  बहुत बिजी रहते हैं। ''

''ओह , तो आज किसी से भी मिलना नहीं हो पायेगा। ''

''हम्म , थोडा टाइम तो  लगेगा  सबको।  कोई बात नहीं अभी फिलहाल तो यहीं हो न, मिलते रहना ।  और टेंशन मत लो मैं अनुजा जी से बात करूंगी , किसी और तरीके से। हो सकता है कोई क्लू मिल जाए ।''

आकाश की चाय ख़त्म हो गयी थी।  उसने अवनी से विदा ली और निकल गया। सोच रहा था आज सुबह क्या लिखा होगा उसकी राशि में।  हैरतअंगेज दिन रहेगा !

वापस लौटकर आकाश बहुत तरोताज़ा महसूस कर रहा था। अवनी ने उसको मदद का  आश्वासन दे दिया था , और मन ही मन वो अवनी को अपने लिए लकी मानता था।

उधर अनुजा जी अपने स्टडी रूम में बैठी थीं। चश्मा उतर आया था, आँखें नम थीं। थोड़ी देर में अवनी आ गयी।

''क्या हुआ आप कहाँ खो गए ? ''
''पता नहीं बेटा , सोच रही थी , क्या कहानियां भी कभी इतनी सार्थक हो सकती हैं कि किसी की ज़िन्दगी का रुख बदल दे। ''
"ऐसा क्यों बोल रही हैं , आप जानती हैं क्या इसकी मॉम को?  ''
" नहीं ऐसे ही, खैर ये बताओ तुम्हारी डांस की प्रैक्टिस कैसी है, भूल वूल तो नहीं गयी पढ़ाई के चक्कर में  ? "
"नहीं पर आपको अचानक से क्या सूझ गया ?"
"ऐसे ही, अभी सोसाइटी का फंक्शन होगा न , उसमें कर लेना एकाध परफॉरमेंस ."
"ओह कम ओन मैंने बहुत कर लिए ये सब पर्फॉर्मन्सेस , अब मैं कॉलेज आ गयी हूँ अब तो दूर रखो इन सब से , नए बच्चों को मौका दो ."
"वो तो ठीक है पर ये सोसाइटी वालों की ही ज़िद है, वही लोग मेरे पीछे पड़े हैं . देख लिए हैं तुम घर आई हुई हो . "
"पर मैं कॉलेज के  काम से आई हूँ, मेरे पास सच में टाइम नहीं !"
"अच्छा ठीक है अब तुम बड़ी हो गयी हो अब थोड़ी हमारी बात सुनोगी ." अनुजा जी ने लम्बी साँस छोड़ते हुए कहा .
"ये सही है आप लोगों की इमोशनल ब्लैकमेल्स ! चलो खुश रहो आप भी क्या याद रखोगी . पर मैं खुद नहीं करूंगी, बच्चों को सिखा दूँगी, मैं तो  बैठके देखूँगी आराम से ."
"ठीक है वही सही , अपनी झलक ही दिखा देना !"

"ठीक है अभी चलती हूँ पापा आने वाले हैं . "

अवनी कमरे से निकलने लगी .

"और हाँ, उस लंगूर को भी ले आना साथ में . एन्जॉय कर लेगा  थोड़ा, मम्मी को ढूँढता फिर रहा है ."
"  कुछ भी ! मैं नहीं लाने वाली उसको . जान न पहचान मैं तेरा मेहमान !"
"ले आना बेटे , एक और बात मान लेना मेरी ."
"आपकी फरमाइशें न , बढ़ती जा रही हैं ! ठीक हैं बोल दूँगी उसको भी आने के लिए . पर आप ही सम्भालना उसको ."

अवनी निकल गयी, और अनुजाजी मुस्कुरा रही थीं .  अवनी को खुश देखना चाहती थी . आकाश जैसे कुलीन हमउम्र लड़कों के साथ मिले जुले , अपने जीवन साथी की खुद तलाश करे , यही सपना बचा था . पर अवनी थी कि किसी लड़के को घास भी नहीं डालती थी, दोस्त या जीवनसाथी चुनना तो दूर .


*

आकाश बहुत खुश था . अवनी की सोसाइटी में फंक्शन था और वो अनुजा जी के मेहमान  के तौर पर आया था . मन में ढेरों सवाल भी थे कि उस पर  इतनी मेहरबानी क्यों , पर शायद बिन माँ के बच्चे पर रहम आ गया हो .

अवनी बहुत खूबसूरत लग रही थी , मैरून रंग का सूट पहना था , और हल्का सा मेक अप , उतने में ही वो सोसाइटी की अच्छी खासी लड़कियों को मात दे रही थी . पर वो बच्चों की डांस परफॉरमेंस की तैयारी में व्यस्त थी, तो आकाश अनुजा जी के साथ सामने की कुर्सियों में बैठ गया . प्रोग्राम बहुत अच्छा हुआ, अवनी ने एकाध जगह गेस्ट अपीयरेंस भी दी . आकाश जैसे पूरी तरह सम्मोहित हो चुका था, अब उसे अवनी के सिवा कुछ दिखता नहीं था . अनुजा जी ये बात नोट कर रही थीं .

"अवनी इतनी टैलेंटेड है, ये बात हमें पता ही नहीं थी आंटी जी ! कॉलेज में तो कभी कुछ नहीं करती ! लो प्रोफाइल  रहती है ."
"जानती हूँ . इसको धक्के मारके आगे भेजना पड़ता है, वरना तो ये दिन रात बस किताबें ही पढ़ती रहे ."
"अच्छा आंटी जी इनकी फैमिली भी तो होगी न इधर, मम्मी पापा ? उनसे तो इसने मिलाया ही नहीं ."
"हम्म, चलो मैं मिला दूँगी , ये तो मिलाने से रही . वैसे पापा तो लेट से ही आते हैं वो तो शायद ही मिल पाएं ."
"अच्छा? ठीक है मम्मी से ही मिल लेंगे ."
"हाँ बेटा.. मम्मी से ही मिल लेना ." अनुजा जी हौले से बुदबुदाई .

प्रोग्राम ख़त्म हुआ . अनुजा जी ने आकाश को चलने का इशारा किया .

"चलो मिलवाती हूँ ."
"मम्मी से ?"
"हाँ , मम्मी से ."
एक शांत कोने में दो महिलायें बैठी बात कर रही थीं . अनुजा जी ने उसका उनसे परिचय कराया .

"ये आकाश है, अवनी का क्लासमेट . कलकत्ता से भोपाल आया है ट्रेनिंग के लिए, भेल में  . और आकाश बेटे ये हैं अवनी की  पडोसी मिसेस शर्मा और ये हैं अवनी की डांस टीचर सुलेखा जी . इन्होने बचपन से अवनी को नृत्य की उत्तम शिक्षा दी , यहां भोपाल में एक  जाना माना डांस इंस्टिट्यूट है इनका ."
"नमस्ते आंटीजी ." आकाश ने बहुत शालीनता से दोनों को नमस्ते किया और थोड़ी देर बैठकर बात की . सुलेखा जी का शायद कोई कॉल आ गया था तो वो उठकर चली गयीं . आकाश के मन में ये सवाल अब भी घूम रहा था , अवनी की मम्मी कहाँ थी जिनसे मिलवाने की बात अनुजाजी कर रही थीं ? कुछ तो रहस्यमय चल रहा था यहां .

थोड़ी देर में अवनी भी आ गयी और आकाश सब भूलकर आंटियों से इजाज़त  लेके उसके साथ खाने के स्टाल्स की तरफ निकल गया . अवनी को देखकर वो वैसे ही होश खो बैठता था .

अवनी ने अपनी कुछ बचपन की सहेलियों से मिलवाया और जैसा कि होता आया था आकाश ने अपने किस्से महफ़िल में रंग जमा दिया . अंत तक सब लड़कियाँ आकाश पर अपना दिल खो चुकीं थीं .

और फिर आकाश ने डिनर के बाद अवनी और अनुजा जी से इजाज़त ली . मन में अब भी उसकी मम्मी से मिलने की इच्छा थी पर बोलने की हिम्मत नहीं हुई . इतनी हसीं शाम में कोई दाग न लग जाए .


*

रूम पर आकर आकाश थकान से चूर बिस्तर में धंस गया . रूम का मालिक किसी और के रूम में कोई असाइनमेंट कर रहा था . सुबह से पहले आने की उम्मीद नहीं थी .

बहुत देर तक आकाश करवट बदलता रहा . कुछ तो था जो रहस्यमयी हुआ था. कुछ तो था जो  न दिखकर भी दिखा था . आकाश ने याद करने की कोशिश की . अनुजाजी के साथ बिताये पल..

"चलो मिलवाती हूँ ."
"मम्मी से ?"
"हाँ , मम्मी से ."

"ये हैं अवनी की डांस टीचर सुलेखा जी .."

सुलेखा..ये नाम तो कहीं सुना था ...या पढ़ा था ??  हे भगवान !!! ये तो उस उपन्यास की नायिका का नाम था जिसे पढ़कर वो बावरा हो यहाँ आ गया था!

मतलब अनुजा जी ने उसको उसकी अपनी माँ से मिलवाया था! और वो अवनी की मम्मी के चक्कर में उनको नोटिस भी नहीं कर पाया था . उफ़! लेकिन सुलेखा जी ने भी तो कोई रिएक्शन नहीं दिया था ....पर नहीं , वो उठकर चली गयीं थीं . अब शक की कोई गुंजाइश नहीं थी .

उसने शर्ट डाली और बदहवास सा बाहर निकल गया . ऑटो करके सीधा अनुजाजी के घर पहुँचा . दिल जोर जोर से धड़क रहा था . अनुजाजी जाग रही थीं . जानती थीं देर सवेर वो आएगा .

"आंटीजी कहाँ हैं मेरी माँ  मुझे उनसे अभी इसी वक़्त मिलना है . उफ़ मैं भी कैसा  बेवकूफ था जिनके लिए इतनी दूर आया उन्ही को पहचान न पाया !"

अनुजाजी उसे अंदर के कमरे में ले गयीं जहाँ आकाश की माँ  अब तक अपने आंसुओं को संभाल नहीं पाईं थीं . आकाश को देखते ही वो उससे लिपटके फूट फूट कर रोने लगीं . आकाश को यकीन नहीं हो रहा था . बचपन से माँ के साये से वंचित आकाश अंततः माँ को पाकर समझ नहीं पा रहा था कि ये भगवान की कैसी लीला थी . क्यों उनके ज़िंदा होने के बावजूद उन्हें उससे दूर रखा था ?

तो क्या अनुजाजी के उपन्यास की एक एक पंक्ति सुलेखा की हकीकत थी  ? क्या यही सच था कि वो शादी के बाद भी अपने पुराने प्यार को भूल नहीं पायी थीं ,  उसके पिता जिन्हें  ये पहले से नहीं पता था कि ये शादी अनिच्छा से हो रही थी। शादी के कुछ महीने बाद भी वो उन्हें अतीत भुलवा नहीं पाये थे।  और सुलेखा, जो सास ससुर के दबाव में अपना शौक नृत्य छोड़ चुकी थी, पति द्वारा कोख में जबरन बच्चा आने के बाद और उग्र हो चली थी, और बागी बन गयी थी।  पति को लगा था शायद बच्चा होने के बाद गृहस्थी में व्यस्त होकर सब भूल जायेगी, पर सुलेखा , एक उत्कृष्ट नृत्यांगना , कला की देवी , जो अपने सह कलाकार को पहले ही दिल दे बैठी थी , उसके संग अनेकों सपनों में रंग भरना चाहती थी , वो जबरन करायी इस शादी,  इस नयी दुनिया , गृहस्थी के बोझ और नीरसता में घुट घुटकर मर रही थी , आज़ाद हो जाना चाहती थी।

और  कलाकार, रचनाकार ये लोग तो जाने ही अपनी मन की उड़ानों के लिए जाते थे , बंदिशों को तोड़ पर फड़फड़ाने के लिए।  सृजन का रास्ता नीरसता से होकर नहीं जाता।  गृहस्थी सुलेखा की दुश्मन थी, और प्रेमी राघव के साथ देखे सपने उसकी मुक्ति का मार्ग।  राघव अब भी उसकी बाट जोहता था।

पर जो बात सुलेखा को पहले महसूस न हुई और आठवें महीने के गर्भ में पति को छोड़कर भाग आने के बाद हुई , वो ये थी कि संसार का सबसे बड़ा सृजन तो उसकी कोख में हो रहा था।  एक ऐसा सृजन जिसके पश्चात उसकी दुनिया सिरे से बदलने वाली थी , उसकी प्राथमिकताएं, उसकी प्रेम की परिभाषाएं सब नए सिरे से लिखी जाने वाली थीं। वो नहीं जानती थी कि एक औरत का जीवन शादी के बाद नहीं बदलता, वो बदलता है माँ बनने के  बाद , क्योंकि मातृत्व उसे इश्वर से आशीर्वाद के रूप में  मिलता है , और एक बार जब वो कोख में किलकारियाँ  भरते इश्वर के उसी रूप को पाती है तो वो पहले वाली औरत नहीं  रह जाती।  उसे अब और कोई मोह नहीं छू पाता , कोई आकांक्षा उसे प्रभावित नहीं कर पाती। उसके पास एक ईश्वर द्वारा दिया गया मोती होता है जिसे उसे अपने  आँचल में सहेजके रखना होता है और जिसकी चमक के आगे हर चमक फीकी पड़ जाती है है।

घर से भागकर वो एक नृत्य मंडली की मित्र के घर छिपकर रही। जिस सुबह उसे राघव से स्टेशन पर मिलना था और सदा के लिए कहीं दूर चला जाना था , उस सुबह उसके पेट में अजन्मे शिशु ने अनेकों अठखेलियां कीं। उसे उसके पैर चलते से दिखते थे, मानो कह रहा  हो बस थोड़ी देर और माँ फिर मैं आता हूँ बाहर। आप रुकी हो न , कहीं जा तो नहीं रही हमारा घर संसार छोड़के जिसमें मेरा सृजन हुआ था ?

और वो स्टेशन नहीं गयी। नहीं मिली फिर कभी राघव से , क्योंकि अब वात्सल्य ने  प्रेम की जगह ले ली थी। राघव उसका इंतज़ार करते करते अंततः ट्रेन  में बैठ गया , और  उनकी कहानी पर पूर्णविराम लग गया। पर जो कदम वो उठा चुकी थी उसका परिणाम तो उसे भुगतना था। एक महीना घर से गायब रही  वो भी बाकायदा प्रेमी के घर जाने की सूचना चिट्ठी में छोड़के गयी, ऐसी स्त्री को उसके समाज में प्रतिष्ठित ससुरालवाले फिर थोड़े  अपनाते। बच्चा जन्मने तक वो उसी  महिला मित्र के साथ रही ।  गहने बेचकर किराया वगैरह निकल आता था।  और जब बच्चा हुआ , तो  उसने बड़े जतन से  अपना दूध पिलाके , लोरियाँ सुनाके , जितना था सब प्यार लुटाके  छह महीने अपने वात्सल्य की छाँव में रखा , फिर एक रात पति के घर के आँगन में दिल पर पत्थर रखकर छोड़ आई , एक कागज़ में सारा माजरा बताकर ,  बच्चे को पिता और दादा दादी के प्यार की गुहार लगाकर , क्षमा की अपेक्षा रखकर और कभी अपनी सूरत न दिखाने का वास्ता देकर। और इस तरह सुलेखा अपना सूना आँचल लेकर शहर छोड़कर चली गयी , सदा  के लिए। जो  गुनाह उससे हुआ था, पति के प्यार का  जो सिला उसने दिया था, उसका फल तो भुगतना था। अब उसकी एक ही इच्छा रही थी , जितने दिन ज़िंदा रहे , बस उन अभागे बच्चों पर अपना प्यार लुटाती रहे, उन्हें किसी कारण से माँ का प्यार न मिला हो। और ईश्वर से यही कामना करती थी कि उसकी गलती की सज़ा उसके बच्चे को न मिले।  उसके पिता, दादा दादी उसे इतना प्यार दें कि उसे माँ की कमी कभी महसूस न हो।

भोपाल आकर सुलेखा ने नए सिरे से शुरुआत की, पहले स्कूलों में नृत्य सिखाकर  और फिर खुद की अकादमी खोलकर। अनुजा से उसका परिचय  तब हुआ था जब वो किराए का घर ढूंढते हुए उसके पास पहुंची  थी।  दोनों नितांत अकेली थीं, दोनों की कोख हरी  होते हुए भी हरी नहीं थी।  साथ रहते हुए और एक जैसी पीड़ा को सहते हुए उनके बीच आत्मीयता का ऐसा बंधन बंध गया कि अनुजा ने उसकी ज़िन्दगी की पीड़ा को चित्रित करता सजीव उपन्यास लिख डाला।  और हाँ , कहने को उसके पात्र काल्पनिक थे , पर चाहकर भी वह सुलेखा को कोई और नाम न दे पायी , उसका नाम सुलेखा रह गया , शायद इस आस में कि कभी यही पात्र उसके जीवन में नया मोड़ लेकर आये।

और आज सुलेखा को बेटे को कोई सफाई देने की ज़रुरत न थी, उसकी आँखों के सामने   माँ का पूरा संघर्षमय जीवन तैर गया था। वो जानता था कि माँ ने जो किया उसके जन्म लेने से पहले किया जब वो माँ न बनी थी। अपने जूनून, अपने दिली शौक के लिए इस तरह के कदम उठाना पूरी तरह गलत भी तो नहीं था, उन्हें मौका ही कहाँ मिला था अपने सपने पूरे करके का, और उम्र की उस दहलीज़ पे तो बागी बनना बहुत स्वाभाविक था। उसके जन्म लेने के बाद तो सुलेखा ने सिर्फ और सिर्फ पश्चाताप किया था। उसे माँ से कोई शिकायत नहीं थी, बस एक अफ़सोस था कि काश ज़िन्दगी ऐसी न गुज़री होती जैसी गुज़री थी।
माँ की गोद में सर रखकर वो कब सो गया पता ही नहीं चला। उसके बालों पर हाथ फेरते हुए आज सुलेखा को भी बहुत साल बाद चैन की नींद आई। अनुजा जी दबे पाँव कमरे में आईं और बत्ती बुझा दी। रात में तीन चार बार सुलेखा की नींद टूटी, शायद यकीन नहीं हो रहा था की ये ख़ुशी हकीकत थी ख्वाब नहीं।

अगले दिन रविवार था। सुलेखा ने सबको चाय पिलाके जगाया और नाश्ते में आलू के परांठे बनाये। कुछ परांठे पैक करके अवनी के घर भिजवा दिए ।  नाश्ता करके उन्होंने अनुजा से इजाज़त ली। अब जब तक आकाश भोपाल में था उसे कहीं और भटकने की ज़रुरत नहीं थी , उसे माँ मिल गयी थी , घर मिल गया था।

*

अवनी जब सुबह बालकनी में कपड़े सुखा रही थी तो उसे आकाश और सुलेखा आंटी साथ में निकलते दिखे। वो कल रात हुई घटनाओं से अनजान थी , तुरंत अनुजा जी के पास पहुंची। और जब उसे पूरी बात पता चली तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना न था।  सबसे बड़ी बात ये थी कि माँ बेटे के इस मिलाप में पहली भूमिका उसी की थी।  उससे रहा न गया और शाम होते होते वो सुलेखा आंटी के घर पहुँच गयी। माँ बेटे के चेहरे की दमक अब तक गयी नहीं थी। अवनी को पहली बार अपने हाथों हुए किसी नेक काम पर इतना फख्र हो रहा था। पर आकाश की ही तरह वो भी जानती थी कि आगे की राह आसान नहीं। सुलेखा जी को उनका बिसरा हुआ हक़ दिलाना था , उनके अपने घर पहुंचाना था। शाम को दोनों टहलने के लिए निकले , आकाश को अवनी से ढेर सारी बातें जो करनी थीं, उसका शुक्रिया अदा करना था, और बस यूं ही उसके साथ वक़्त बिताना  था। अब उसे अपने दिल में अवनी के लिए जगह को लेकर कोई शक नहीं रहा था , बस ये बात उस तक पहुँचानी थी , जो कि सबसे मुश्किल काम था।

*

आकाश की मन की बात उसकी माँ से छुपी न रह सकी।  उसी रात खाने की टेबल पर उन्होंने अवनी का ज़िक्र छेड़ा जिसपर आकाश थोड़ा शर्मा गया और उन्होंने मामला ताड़ लिया .
"अवनी बहुत भली लड़की है, है न बेटा ?"
"हाँ मॉम, कॉलेज  में भी सबकी हेल्प करती रहती है . बीच में मुझे पीलिया हुआ था तो शुरुआत में ही पकड़के हॉस्पिटल भिजवा दिया . जाने कैसे समझ जाती है ."
"हम्म . कोई कह नहीं सकता कि बिन माँ की बेटी है . अनुजा ने कोई कसर नहीं छोड़ी परवरिश में . "
"क्या ??" आकाश हैरान था .
"तुम्हें नहीं पता ? मुझे लगा जानते होंगे !"
" नहीं वो तो बताती नहीं , अनुजा जी ने भी कुछ नहीं बताया ."
" कोई सामने से थोड़ी बताएगा , वो तो तुमको खुद समझना है ! खैर, मतलब अवनी के बारे में तुम भली लड़की है के अलावा कुछ नहीं जानते . कोई बात नहीं मैं हूँ न बताने के लिए !"
"जी मॉम ." आकाश झेंप गया .

*

 डिनर के बाद दोनों टेरेस पर गए . सुलेखा का घर बहुत भव्य तो नहीं पर सलीके से रखा हुआ था . आकाश को पहले दिन से ऐसा लगने लगा था जैसे हमेशा से यहीं रहता आया हो . टेरेस में हलकी हलकी हवा चल रही थी .

"अवनी जैसी लड़की जो सुंदरता और गुणों की खान है , सिर्फ एक माँ की विरासत नहीं है . उसकी माँ का नाम चित्रा था . बहुत खूबसूरत थीं वो . बच्चों का इतना शौक था कि अपनी कोख से बच्चा पैदा करने के लिए डॉक्टर की हिदायत की परवाह नहीं की . जिस पल अवनी पैदा हुई उसी पल चित्रा ने भी अंतिम सांस ली . इसके पिता शरद बाबू सदमे में आ गए, और इसको कुछ वक़्त के लिए दादा दादी के पास छोड़ आये . वहाँ उनके पड़ोस में माया रहती थीं . वही माया जिन्हें तुम अनुजा के नाम से जानते हो . माया के माता पिता नहीं थे , चाचा चाची के साथ रहती थी . अपने सामर्थ्य के अनुरूप उन्होंने माया को पढ़ाया लिखाया और ठीक ठाक दिख रहे घर में उसकी शादी करवाई . शादी के बहुत समय बाद भी माया की कोख  सूनी थी . टेस्ट करवाये तो माया की रिपोर्ट्स नार्मल आई थीं , उसमें माँ बनने की योग्यता थी . पर उसके पति ने अपने  टेस्ट्स करवाने से मना कर दिया और ससुराल वालों ने सारा दोष माया पर मढ़ लिया  . अंततः पढ़ी लिखी स्वावलम्बी माया को ये सब सहन नहीं हुआ और उसने तलाक की अर्ज़ी दे दी ."

आकाश स्तब्ध होकर सुन रहा था . अनुजा जी ने बचपन से इतने दुःख झेले थे , तभी उनकी लेखनी में एक पीड़ा साफ़ झलकती थी . कितना कम जानता था वो उन्हें .

"एक दिन शरद बाबू की बहन नीतू से माया को  इस बिन माँ की बच्ची का पता चला . उसको गोद में लेकर माया को खुद एक माँ होने का अनुभव हुआ . दोनों के बीच स्नेह बढ़ता गया . बच्ची यानी अवनी माया को बहुत प्यार करती थी , उसकी गोद में आकर चैन से सो जाती थी . माया भी ज्यादातर उसी के घर में रहती या उसे घर ले आती .
पर ऐसा ज्यादा वक़्त नहीं चला . एक दिन शरद बाबू दादा दादी और बच्ची को लेकर शहर चले गए . उसका दाखिला भी तो कराना था अच्छे स्कूल में . पर माया इस बिछोह को सह नहीं पायी और खुद उसी शहर में नौकरी ढूंढ ली . अब वो अकेली रहती थी . दिन भर अवनी के पास और शाम होते ही घर चली जाती . एक तरह से अवनी को दिन के किसी एक पहर पिता और माया का प्यार एक साथ नहीं  मिला . एक जाता तो दूसरा आता . लेकिन
अवनी ने उसी हालात से समझौता कर लिया , बचपन से ही ."

"पर मॉम एक बात मुझे समझ नहीं आई .."
"क्या ?'
"अगर शरद बाबू और माया आंटी इतना ही उस बच्ची से प्यार करते थे तो उसकी खातिर ...."
"शादी क्यों नहीं कर ली एक दुसरे से, यही न ?"
"हाँ मॉम, फिर तो वो हमेशा एक घर में साथ रह सकते थे . अवनी को बेशुमार प्यार कर सकते थे ."
"इसका  जवाब तो मैं भी तुम्हें नहीं दे सकती . दो इंसान एक दूसरे से शादी क्यों करना चाहते हैं या क्यों नहीं , ये तो उनसे बेहतर कोई नहीं बता सकता . हाँ पर ये  बात उनके या उनके परिवार वालों के जेहन में भी ज़रूर आया होगा , फिर भी अगर शादी नहीं हुई तो कुछ तो कारण रहा होगा . पर मैंने कभी पूछा नहीं ."

हलकी सी बारिश होने लगी थी।  दोनों टेरेस से उतर आये।   सुलेखा को सुबह जल्दी उठकर नृत्य अकादमी जाना होता था।  अनुशासन की वो पक्की थीं , सो आकाश को शुभ रात्रि कहकर सोने चली गयीं।

इधर आकाश बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। पिछले दो दिनों में उसके जीवन में जो तूफ़ान उठे उनसे उबरना इतना आसान नहीं था।  ये सब हजम हो जाने के बाद भी अभी बहुत कुछ करना था, अपनी माँ को घर में जगह दिलानी थी , अवनी और माया की पहेलियाँ सुलझानी थीं।  माया और शरद बाबू क्यों दिन और रात के जैसे लुका छिपी करते थे , क्यों अवनी की खातिर पास रहकर भी दूर रहते थे , ये सब तो पता करना था। ये लुका छिपी हमेशा तो नहीं चल सकती।

शायद नीतू आंटी इस बारे में कुछ बता सकें।  वो तो शरद अंकल की बहन हैं , काफी कुछ जानती होंगी उनके बारे में।

*

अगले कुछ दिन आकाश ने खूब मस्ती की , अपनी माँ , अवनी और अनुजा जी के साथ अच्छा वक़्त बिताया।  उसके बाद तो  कॉलेज वापस लौटना था , और फिर फाइनल सेमेस्टर और प्लेसमेंट की तैयारी।

अवनी अब आकाश के साथ थोड़ी सहज होने लगी थी।  एक अपनापन सा लगता था उसके साथ। सुलेखा आंटी को तो वो बचपन से जानती थीं , उनके नृत्य के प्रति समर्पण, उनके अनाथ गरीब बच्चियों को बिना शुल्क के नृत्य सिखाना और स्वावलम्बी बनाना, होनहार गरीब बच्चों के स्कूल की फीस भरना, और ये सब चुपके चुपके बिना कोई डंका बजाये , बिना कोई श्रेय लिए। ऐसा लगता था जैसे उन्होंने पूरा जीवन उन अभागे बच्चों के प्रति समर्पित कर दिया था। ऐसी सहृदय माँ की कोख से जन्म लिया था आकाश ने। और माँ होते हुए भी बिन माँ के बच्चे सा पला बढ़ा , इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता था।  अवनी को उससे सहानुभूति होने लगी थी।

आखिर लौटने का दिन भी आया। दोनों ने बाकी के गैंग के साथ रिजर्वेशन कराया था , पूरे रस्ते हो हल्ला और मस्ती चली। रात के दस बजते बजते सबका खाना और  गाना  बजाना हो चुका था। अब आकाश से एक आखिरी गाने की फरमाइश हुई।  अवनी नीचे के बर्थ में लेट चुकी थी , बत्तियाँ बंद हो चुकी थीं और हलकी चांदनी खिड़की से छनके अंदर आ रही थी।

"मनचली ऐ हवा
मखमली ऐ हवा
कभी जो दे अपना पता तू बता
मैं उड़ आऊँ, पंखों बिना

ऐ हवा
तू तो ख़्वाबों से भी है परे
महसूस होती है तू
पर दिखती नहीं
ऐ हवा
तू आती है किस ओर से
मुझे छूके तू जाती कहाँ
ये कहती नहीं

मनचली ऐ हवा
मखमली ऐ हवा
कभी जो दे अपना पता तू बता
मैं उड़ आऊँ, पंखों बिना

क्यों कभी
खुली आँखों से सूरज तले
किसी नादाँ सी ख्वाहिश के पीछे
बंधा जाता हूँ
क्यों कभी
जो मिला है उसे छोड़कर
जो मुमकिन नहीं है उसी पे
खिंचा जाता हूँ

क्यों नहीं ऐ हवा
जी सकता मैं सबकी तरह
जी सकता मैं, सबकी तरह।"

अवनी की आँखें नम हो आईं थीं।

*

आकाश के पिता को यूँ  तो साँस लेने की फुर्सत नहीं  होती  थी, पर कुछ दिनों से वो कहीं खोये से रहते थे।  आकाश का अचानक यूँ वोकेशनल ट्रेनिंग के लिए भोपाल चले जाना उन्हें हजम नहीं हो रहा था।  यहाँ भी तो उन्होंने अच्छा इंतज़ाम करके रखा था।  जान छिड़कते थे अपने बेटे पर . समझ नहीं आ रहा था कि आकाश उनसे दूर क्यों चला गया था इस  बार , जबकि हर छुट्टियों में वो दौड़ा आता था उनके पास।  रह नहीं पाता था उनके बिना।  दादी के  हाथ के  खाने पर तो जान देता  था।
पर इस बार जब आया था तो थोड़ा परेशान सा दिख रहा था।  पहले की तरह हँस खेल नहीं रहा था।  एक दो दिन में ही भोपाल निकल गया।  पता नहीं क्या बात थी।
हो सकता था उसका वहाँ कोई चक्कर वक्कर हो , या फिर....
दूसरी संभावना सोचते ही उनका दिल दहल उठता था।  कहीं वो अपनी माँ के वजूद की तलाश में तो नहीं।  कहीं उसे शक तो नहीं हो गया कि उसकी माँ ज़िंदा हो सकती है।  या कहीं किसी दोस्त रिश्तेदार ने उसे हकीकत बता तो नहीं दी।
इस प्रश्न का उनके पास कोई उत्तर नहीं था।  अगर ऐसा कुछ चल रहा था तो वो बिलकुल असहाय थे।  बचपन से अब तक उन्होंने उसे माँ की कमी महसूस न होने दी थी।  फिर भी अगर उसे माँ की तलाश करने की ज़रुरत महसूस हुई तो इसमें वे कुछ नहीं कर सकते थे।  पर इतने सालों से जो डर उन्हें भीतर से खा रहा था , शायद उसका सामना करने का वक़्त आ गया था।

उन्होंने लॉकर खोला और एक एल्बम निकाली।  अपनी शादी की एल्बम , जिसे उन्होंने कभी जला देना चाहा था पर उनसे हो नहीं पाया, तो सबकी नज़रों से दूर इस लॉकर में रख दिया था।  सोचा नहीं था एक दिन ये बाहर निकलेगा।

पहली तस्वीर।  वो मंगलस्नान के मंडप में बैठे हुए . चेहरे पर हलकी सी मुस्कान।

कितने खुश थे वो उस दिन।  पिछले महीने ही सुलेखा का बायोडाटा कुंडली और एक फोटो उनके घर आया था रिश्ते के लिए।   तस्वीर  देखते ही दिल दे बैठे थे।  घर जाकर उसे देखकर आने की भी ज़रुरत नहीं समझी थी।  माँ पिता एक दिन देख आये थे और शगुन देकर रिश्ता पक्का कर आये थे।  उन दिनों ऐसे ही रिश्ते हुआ करते थे।  कुंडली मेल खा गयी , परिवार की थोड़ी खबर ली और सब ठीकठाक निकला तो रिश्ता पक्का हो जाता था।  लड़का लड़की को अलग से मिलाने जैसे तामझाम नहीं हुआ करते थे।

उसे तो शादी की कोई जल्दी नहीं थी, पढ़ाई पूरी कर नया नया कारोबार खोला था , उसमें बहुत व्यस्त रहता था।  चाहता था थोड़ा ठीकठाक पैसे आने लगे तो शादी की सोचे।  पर पता नहीं क्यों लड़कीवालों को थोड़ी जल्दी थी।  कह रहे थे उसकी माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं था, ऑपरेशन करवाना था।  उससे पहले इसे ब्याह देना चाहते थे।  लड़के वालों ने उनकी बात मान ली और रिश्ता होने के आठवें दिन शुभ मुहूर्त देखकर उसका ब्याह तय कर दिया।  बहुत रोमांचित था वो , सुलेखा जैसी रूप गुण की खान उसकी किस्मत में आई थी . बस इतना पता चला था उसके उसके बारे में कि संगीत और नृत्य में पारंगत थी . इससे अधिक कुछ नहीं जानता था .

सुहागरात के लिए बहुत ख्वाब देखे थे . तोहफा भी लेकर रखा था।  और जब वो रात आई तो उसका दिल इतनी ज़ोरों से धड़क रहा था कि बस बाहर ही निकल आये।  और सुलेखा, वो तो रात की चांदनी में नहायी किसी अप्सरा सी प्रतीत होती थी।  लगता ही नहीं था इस मैली कुचैली दुनिया से ताल्लुक रखती हो।

अब वो होशोहवास में नहीं था।  तोहफा, परिचय सब भूल कर उसने सुलेखा को आगोश में लिया।  उसके चेहरे पर  एक डर, एक असहजता थी, आँखों के कोर शायद कुछ नम थे , पर वो तो उन्माद में इस क़दर डूबा था कि  ये सब देखकर भी खुद को रोक नहीं पाया था . और सुलेखा ने भी कुछ प्रतिवाद नहीं किया था , समर्पित कर दिया था खुद को।

बहुत प्यारी नींद आई थी फिर।  दिन भर से थक भी तो गया था।  पर थोड़ी ही देर में उसकी आँखें खुल गयीं, किसी की सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं।  उसने सोते रहने का अभिनय किया,  पर दिल पर आघात लग चुका था।  वो समझ चुका था कि ये शादी सुलेखा की मर्ज़ी से नहीं बल्कि जबरन करायी गयी थी।  हे भगवान , ये कैसा खेल था ? अब वो क्या करता ?

अगले दिन वो सुलेखा को शाम को घुमाने ले गया।  घर पर ये सब बातें नहीं हो सकती थीं।  हनीमून का आईडिया कल रात ही ड्राप कर दिया था।
पार्क में एक बेंच पर दोनों कुछ देर  खामोश बैठे रहे।  उसने चने के दो पैकेट लिए और एक सुलेखा को थमाया ।

"आप ठीक तो हैं न , मतलब घर की याद तो नहीं.."
"नहीं।  सब ठीक है। "
" सुलेखा जी। आप मुझे अपना दोस्त मानिए। अगर आपको कोई भी परेशानी है तो मुझसे कहिये।  अभी हमें पूरी ज़िन्दगी साथ में बितानी है , बिना एक दूसरे पर भरोसा किये तो हम ये सफर तय नहीं कर पाएंगे।"
सुलेखा कुछ सोच रही थी , शायद हिम्मत जुटा रही थी वो बात कहने की जो कड़वे घूँट की तरह पीने में ही अब उन दोनों की भलाई थी।

" जी आप शायद  जानते है मुझे नृत्य का बहुत शौक है।  ये मेरी ज़िन्दगी , मेरी साँस, मेरा वजूद है।"
"जी जानता हूँ थोड़ा बहुत। "
" मैं आपको पहले बताना चाहती थी पर मौका नहीं मिला। मुझे नृत्य में अपना भविष्य बनाने का मन था। एक खुद की अकादमी खोलकर पूरा जीवन इसके लिए समर्पित करना चाहती थी।  पर मेरे घरवालों को मेरा ये शौक पसंद नहीं था। आखिर समाज तो यही सोचता है, भले घर की लडकियां थोड़ी ये सब करके पैसा कमाती हैं। इस दौरान मुझे… "
"आपको क्या? " उसका दिल जोरों से धड़क रहा था।
"मुझे अपने कला अकादमी के एक प्रतिभावान साथी से प्यार हो गया।  हम दोनों शादी करके मिलकर अपना सपना पूरा करना चाहते थे। वो मेरे घर आये भी मेरा हाथ मांगने , पर पापा को ये मंज़ूर नहीं था। उन्होंने हड़बड़ी में रिश्ते देखने शुरू किये और जो पहला ठीक लगा वहाँ मेरी शादी करवा दी। उनकी मजबूरी समझ सकती थी , समाज में प्रतिष्ठित देखना चाहते थे मुझे, न कि कला के दम  पर पैसे कमाकर गुजारा करने वाला। पर... "

"कहिये ?"
"पर मैं इसके बिना जी नहीं सकती।  और सब मुझे स्वीकार है पर कला से दूर रहकर मेरा दम  घुट जाएगा। मुझे मालूम है आपके घर पर भी ये चीज़ स्वीकार नहीं होगी , मुझे समझ नहीं आता क्या करूँ , कैसे दूर रखूँ खुद को इससे। "

वह सुन तो रहा था पर प्रेमी के जिक्र के बाद से सुलेखा के शब्द उसके कानों में पड़ने बंद हो चुके थे।  उसका नादाँ दिल जिसे प्यार में पड़े कुल एक हफ्ता हुआ था , आज बुरी तरह टूट गया था।  सुलेखा किसी और से प्यार करती थी , किसी और को पसंद करती थी , उससे शादी दबाव में आके की थी , ये सब सुनकर अब उसका मन एक पल भी वहाँ रुकने को नहीं कर रहा था। फूट फूट कर रोने को मन करता था।  सुलेखा उसे मजबूरी में अपना तो चुकी थी , पर दिलोजान से वो किसी और की थी। अब वो क्या करे।  उसकी ख़ुशी, उसके सपने, उसके अरमान सब ख़ाक हो चुके थे। जो मन से उसकी नहीं थी , उसके तन को पाकर भी वो क्या करता। हर रात जिसे वो प्रेम समझता, असल में सुलेखा का मानसिक बलात्कार चल रहा होता।
 पर अब वो क्या करे।  शादी तो हो चुकी थी , अब तो दोनों को मिलकर ही कोई हल निकालना था। उसने खुद को संयत किया।
 "सुलेखा, ये सच है कि इस घर में भी तुम्हें इस बात का समर्थन नहीं मिलेगा।  मेरे माँ पिता को एक संस्कारी घरेलू बहू चाहिए , और सच कहूँ तो मुझे भी एक ऐसी ही पत्नी। देखो मैंने अभी नया नया बिज़नेस शुरू किया है, हर कदम पर नयी नयी अड़चनें आ रही हैं। अगर मैं धंधे से हटकर घर की बातों में दिमाग लगाने लगूंगा तो कुछ नहीं कर पाउँगा। तुम समझ रही हो न ? मुझे घरवालों के, तुम्हारे, सबके सहयोग की ज़रुरत है। ऐसे में अगर तुम चारदीवारी के बाहर जाकर कुछ करने की सोचोगी तो शायद मैं संभाल नहीं पाउँगा। तुम समझ रही हो न ? मैं झूठी बातें कहकर तुम्हें बहलाना नहीं चाहता। "
सुलेखा सर झुकाकर सुन रही थी।
"पर हाँ, एक वादा जो मुझमें निभाने की काबिलियत है वो तुमसे कर रहा हूँ।  अगर मेरा साथ दोगी, मेरे संग चलोगी, माँ पिताजी का ध्यान रखोगी तो मैं तुम्हें खुश रखने में, तुम्हें प्यार करने में कोई कसर बाकी नहीं रखूंगा। तुम्हारा अतीत भुलाकर नयी ज़िन्दगी जीने में पूरा सहयोग करूंगा। मैं , मैं … " कहते कहते वो रुक गया।  कहना चाहता था कि वो उससे कितनी मुहब्बत करता है , कितना प्यार देना चाहता है उसे। रोज़ शाम उसकी गोद  में सर रखकर थकान मिटाना चाहता है , हर रात उसे आगोश में लेकर बेइन्तहां प्यार करना चाहता है।  कैसे कहे उससे। अब शब्द नहीं निकलते थे।

"जी , मैं पूरी कोशिश करूंगी।  आप मुझे माफ़ कर देंगे न , जो कुछ भी मैंने कहा उसके लिए ? ये मेरा सच था जो आपको बताना ज़रूरी था। "
"चिंता मत करो, मैं एक बार थोड़ा स्थापित हो जाऊँ, वक़्त निकाल पाऊँ  फिर माँ पिताजी को भरोसे में लेकर तुम्हारा सपना पूरा करने की कोशिश करूंगा। पर मैं  वादा  नहीं ,  कर सकता, बस एक ईमानदार कोशिश कर सकता हूँ। "

सुलेखा हौले से मुस्कुराई।  कितनी प्यारी लगती थी जब खुश रहती थी। काश …

उस दिन के बाद से उसने सुलेखा को छुआ  तक नहीं . रोज़ देर रात घर आता , तब तक वो थक हार कर निढाल होकर सो चुकी होती, और वो नींद में डूबी सुलेखा को निहारता रहता .

पर सुलेखा की हालत  धीरे धीरे बदतर होने लगी थी . वो गृहस्थी में मन लगाने वालों में थोड़ी थी , वो तो अनंत आकाश में पर फैलाना चाहती थी , नयी दिशाएं , नए रास्ते तय करना चाहती थी . अपनी कला से आत्म संतुष्टि पाना चाहती थी . नृत्य के, घुंघरुओं के, संगीत के बगैर वो पंखहीन सी हो गयी थी . जीने का कोई जज्बा नहीं रहता था . फिर भी अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाये जाती थी . उधर वो कारोबार में और अधिक व्यस्त रहने लगा था . चाहकर भी सुलेखा की इच्छा पूरी करने की  कोशिश नहीं कर पाता था .

और फिर जब सुलेखा की तबियत बिगड़ी, उल्टियाँ आईं तो वो समझ गयी  कि उम्मीद की जो आखिरी लौ थी , अब प्राणों की इस नयी लौ के समक्ष समर्पण करने के कगार में थी . अब तक फिर भी थोड़ी सी आस थी कि कभी हालत बदलेगी , पर अब तो  तकदीर ने ही घुटने टेक दिए थे .

और वो नादाँ कितना खुश था इस खबर को सुनकर . उसे लगने लगा था कि अब मातृत्व की शुरुआत  के साथ सुलेखा अपनी सारी आकांक्षाएं  छोड़कर इस नयी ज़िम्मेदारी के लिए तैयार हो जायेगी . उसके प्यार पर ईश्वर ने मुहर लगा दी थी . ऐसा लगा था जैसे अब सब ठीक हो जाएगा . एक बार बच्चा सुलेखा की गोद में आएगा तो उसे हर पल उसके प्यार की निशानी का एहसास होगा . फिर वो अपना अतीत , अपना प्रेम सब भूलकर हमेशा के लिए उसकी हो जायेगी . आखिर ज़िन्दगी का नियम है पुरानी यादें छोड़कर आगे बढ़ते रहना .

और दिन महीने कटते रहे . न वो सुलेखा के मन की बात समझ पाया न सुलेखा उसके मन की . और इस तरह राघव, जो उसके लिए सुलेखा का प्रेमी था , और सुलेखा के लिए मुक्ति का मार्ग , दबे पाँव उसकी ज़िन्दगी में लौटने में कामयाब हो गया. पहले फ़ोन पर और फिर सहेली से मिलने के बहाने उसने सुलेखा को राघव से बात करते देख लिया . वो राघव को जानता नहीं था पर समझ गया था उसके अलावा कोई हो नहीं सकता .

और इससे पहले कि वो कोई कदम उठा पाता या सुलेखा से बात कर पाता , एक रोज़ सुलेखा अपने आठ महीने के गर्भ के साथ घर से गायब हो गयी . माँ पिताजी का बुरा हाल था , पुलिस में रपट लिखवाना चाहते थे . उन्हें लगता था किसी ने सुलेखा को अगवा कर लिया , पर उसने पुलिस में जाने से मना कर दिया . अब दिल के टूटने की इम्तिहान हो गयी थी , अब वो उसकी सूरत भी नहीं देखना चाहता था . होने वाले बच्चे का अब भगवान मालिक था .

जो बात उसे नहीं समझ आई थी और समझ आ जाने से ये दिन नहीं देखना पड़ता , वो ये थी कि सुलेखा अपने प्रेमी राघव के पीछे नहीं भागी थी , राघव तो सिर्फ उसके असली प्रेम तक पहुँचने का जरिया था . अगर ये जरिया वो बन जाता तो सुलेखा उसी की होकर रह जाती , कहीं नहीं जाती . सुलेखा ने अगर उसे प्रेम में धोखा दिया था तो कहीं न कहीं सुलेखा को भी प्रेम में धोखा मिला था . पर ये बात वो नहीं समझ पाया , और सुलेखा के सब्र का बाँध टूट गया .
उसके बाद सुलेखा का क्या हुआ, उसे पता नहीं चला। बस एक सुबह मोटे  कम्बल में लिपटा इत्मीनान से सोता एक शिशु एक कागज़ के साथ उनके दरवाजे पर पड़ा मिला। उसके चेहरे पर जो सुकून और शरीर में जो चमक थी उसे देखकर समझ आता था कि उसकी देखरेख बहुत इत्मीनान से और पूरा वक़्त देकर की गयी थी, अवहेलना या अनिच्छा से नहीं। कागज़ में अपने कृत्या के लिए माफ़ी मांगती हुई सुलेखा कभी बच्चे को मुंह न दिखाने का वादा करती चली गयी थी किसी अनजान शहर में। और ये वादा उससे लेकर गयी कि  उसकी परवरिश में वो कोई कमी नहीं रखेगा, माँ के गुनाह की सजा बच्चे को नहीं देगा। भला ये भी कोई बोलने वाली बात थी! क्या वो उसका अपना खून नहीं था? 

खैर, सुलेखा से जुडी हर याद उसने दफ़न कर दी। शादी की एल्बम भी जलाने के लिए निकाली थी पर जाने क्यों हिम्मत नहीं हुई। चुपचाप सबकी नज़रों से दूर एक लॉकर में रख दी। बेटे की परवरिश ऐसे की कि उसे माँ के बारे में कुछ पूछने की ज़रुरत ही नहीं हुई। और फोटोज तो ये बोलके टाल दिये कि एक दिन बहुत बाढ़ आई थी घर में पानी घुस आया तो बहुत कुछ सामान वहीं खराब हो गया। आकाश के पास भी उनकी बात न मानने की कोई वजह नहीं होती थी। पर अब लगता था अतीत के साये दरवाजे तक पहुँच चुके थे , किसी भी वक़्त दस्तक दे सकते थे।
और दस्तक हुई। उन्होंने दरवाजा खोला तो सामने एक अधेड़ उम्र की महिला खड़ी थी।

" नमश्कार। "
"जी नमश्कार , माफ़ कीजिये मैंने आपको पहचाना नहीं। "
"मेरा नाम अनुजा है। मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात… "

*

प्लेसमेंट  चल रहा था।  आकाश ने सुबह से दो इंटरव्यूज दिए थे और अवनी दूसरा देकर बाहर निकल ही रही थी।  इतने में  सौरभ हाँफते हुए आया।

"अवनी , तुमने आकाश को देखा है ?"
"हाँ  मुझसे पहले ही तो निकला था। उसके बाद पता नहीं फिर मैं अंदर चली गयी। "
"कोई कह रहा था वो सुसाइड पॉइंट की तरफ निकला है , तुम प्लीज चेक करो न। "
"सुसाइड पॉइंट ? ये क्या बला है ?"
"अरे अभी सोचने का वक़्त नहीं तुम प्लीज गेट से निकलके पहाड़ी की तरफ बाएं मुड़ जाना।  वहाँ बोर्ड भी लगा है। मेरा नंबर आने वाला है वरना मैं ही चला जाता। "
"अच्छा ठीक है मैं किसी को ढूंढती हूँ अकेले कैसे जाउंगी। "
"टाइम नहीं है अवनी।  सुसाइड पॉइंट के किस्से तुमने सुने नहीं हैं।  एक एक पल कीमती है। "
"ठीक है। " अवनी हैरान परेशान गेट की तरफ निकल गयी।

गेट के बाहर बायीं तरफ थोड़ा दूर चलने से जंगल शुरू होता था।  शाम को लड़के लोग इधर आते थे घूमने के लिए ,  पर अभी तो पूरा सुनसान था।  इस वक़्त आकाश यहाँ क्यों आएगा ?

अवनी थोड़ा आगे बढ़ी तो एक बोर्ड मिला। बहुत धुंधले अक्षरों में कुछ लिखा था , बस शुरू का S और P समझ में आ रहा था। थोड़ा और आगे जाने पर उसे आकाश दिखा। हाथ में गिटार था।
"तुम गिटार लेकर सुसाइड करने आये हो ?" अवनी चिल्लाई।
"हाँ गिटार लेकर आया तो हूँ, पर सुसाइड करने आया हूँ ये किसने बोल दिया ?"
"और कोई क्यों आएगा इस वक़्त सुसाइड पॉइंट? "
"हम्म। ये सनसेट पॉइंट है मैडम! आ गयी हो तो बैठो , थोड़ी देर में सनसेट भी दिख जायेगा। "
"अच्छा तो उस सौरभ ने झूठ बोला मुझसे !"
"छोडो न , उसको भी थोड़ी पता कुछ । आओ एक चीज़ दिखाता हूँ। "

  आकाश उसे एक जगह ले गया जहाँ से नीचे की घाटी बहुत सुन्दर लगती थी।  वहीं दो पत्थरों पर दोनों बैठ गए। इस तरह तन्हाई में वो पहली बार मिल रहे थे। सूरज बादलों से लुका छिपी कर रहा था।

"मैं कभी कभी आता हूँ यहाँ।  अच्छा लगता है। तन्हाई भी ज़रूरी है कभी कभी। "
"विश्वास नहीं होता ये तुम कह रहे हो ! "
"हम्म। कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब सीधे दिल से निकलते हैं , पर शोर शराबे में वो सुनाई नहीं देते ,  दिल की आवाज दब जाती है। तो यहाँ आ जाता हूँ। "
"ओह तो फिर मैं चली जाती हूँ , तुम्हें तन्हाई चाहिए न। "
" अरे नहीं , तुम वो शोर शराबा थोड़ी हो।  तुम तो…"
"मैं तो ?"
"तुम तो वो जवाब हो जो दिल मुझे दे रहा  है।  " आकाश कहते हुए शरमा गया।
"बस अब मेरे साथ फ्लर्टिंग चालू मत कर देना।  मुझे बख़्श दो।  किसी को तो बख्श दो !"

अवनी उठकर जाने लगी तो आकाश ने सूरज की तरफ इशारा किया।  सूरज डूबने वाला था। अवनी उसे  देख रही थी और  आकाश ने इधर गिटार हाथ में ले लिया था।

तुमसे ही तो हैं
ज़िन्दगी के मायने
आ भी जाओ न
रह भी जाओ न

आइना भी कहता है ,
लगते अधूरे हो तुम 
ज़िन्दगी उदास सी
जम्हाइयाँ  लेती है
रोज़ इक नयी
गली से गुजरता हूँ
हर गली मगर
तुझ तक पहुँचती हैं।

तेरे बिन कुछ नहीं
इस सफ़र के मायने
आ भी जाओ न
रह भी जाओ न

बात कुछ नहीं, मगर
कुछ तो बात है।
एक तलाश मंज़िल पे
पहुँचती सी दिखती है।
जीने को दिल करता है,
हंसने को दिल करता है
जब निगाहों से तू
कुछ वायदे करती है।

संग तू नहीं तो फिर क्या
मंज़िल के मायने
आ भी जाओ न
रह भी जाओ न

आकाश आँखें बंद किये  गा रहा था। अवनी उसकी आवाज़ के सम्मोहन में थी।

और अवनी के ठीक पीछे वाली चट्टान के पीछे से सौरभ मंद मंद मुस्कुरा रहा था।

*

"आप उन्हें कैसे जानती हैं ?" दिलीप बाबू हैरान थे।
"इलाहाबाद छोड़कर वो सीधे भोपाल आई थीं . मैं अकेली रहती थी , उन्हें मेरे जैसी  महिला की तलाश थी जिसके साथ वो किराया बांटकर रह सकें . उन्होंने मुझे ढूंढ निकाला, और दो साल तक हम एक किराए के घर में एक साथ रहे . उसके बाद मैंने कुछ कारणों से घर बदल दिया पर वो वहीं रहती रहीं . तब तक उनकी आर्थिक हालत बेहतर हो चुकी थी। "
"वो आपके साथ रहती थीं ? आपको कुछ ग़लतफ़हमी तो नहीं हुई ? एक ही  नाम के दो इंसान भी  तो हो सकते हैं . सुलेखा तो ...."
" सुलेखा तो राघव के साथ होनी चाहिए , है न ?"
"जी ..मतलब हमें तो यही .."
"ग़लतफ़हमी मुझे नहीं , आपको होती आई  है इतने सालों तक . सुलेखा ने नृत्य के जूनून में राघव के भरोसे अंधा होकर घर तो छोड़ दिया , पर उसके बाद वो कभी राघव से नहीं मिली . उसे अपनी गलती भी महसूस हुई और उसने सब कुछ भुलाकर वापस भी आना चाहा , पर जानती थी जो काम उसने किया उसके लिए आप लोग कभी उसे.."
दिलीप बाबू अवाक हो उनकी बातें सुन रहे थे।
"फिर उसने आगे का सफर अकेले ही तय किया . पहले घर पर ही और फिर एक डांस इंस्टिट्यूट में बच्चों को नृत्य सिखाया . उसकी प्रतिभा को देखते हुए उसके विद्यार्थियों के माता पिताओं ने उसका खुद का इंस्टिट्यूट खुलवाने में जमीन दिलवाने से लेकर इनॉगरेशन करवाने तक उसकी मदद की।  आज दूर दूर से बच्चे उसके पास नृत्य सीखने आते हैं . और हाँ , उनमें से आधे से  ज़्यादा अनाथ गरीब बच्चियां होती हैं जिन्हें वो निशुल्क सिखाकर अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल बनाती हैं।  सुलेखा आज वहाँ की प्रतिष्ठित हस्तियों में गिनी जाती हैं। "

दिलीप बाबू सर झुकाकर सुन रहे थे।  इतने साल तक सुलेखा के बारे में क्या क्या  सोचते आये और ..

"और हाँ , यूँ तो इस बात का कोई फर्क पड़ना नहीं चाहिए , और मैंने भी उसे कई बार प्रोत्साहित किया या कहें कि  उकसाया , पर सुलेखा ने आज तक वहाँ कोई स्टेज परफॉर्मेंस खुद नहीं की . वो मन से खुद को आपके घर की बहू मानती रही और ऐसा कुछ नहीं किया जो आपको हजम न हो पाता . वो बस चारदीवारी के अंदर नृत्य सिखाती रही . उसे खुद को साबित करने में बहुत वक़्त लगा, पर अपने जूनून के लिए वो मेहनत करती रही। "

 दिलीप बाबू की आँखों में अश्रुधारा बह चली थी।

" बस यही बताना था मुझे  आपको।  आगे आपको  क्या सोचना है, क्या करना है ,  आपके ऊपर है। "

"अनुजा जी , बस एक बात आपसे पूछना चाहता हूँ।  आज अचानक से आप ..कैसे.."

"मुझे किसी ने यहाँ नहीं भेजा . मैंने सुलेखा के बारे में जितना जाना , उतना भीतर से घुटती  गयी . ये घुटन मेरे उस उपन्यास में बाहर निकली जिसे पढ़कर ..."
"जी ?"
"पता नहीं आपको ये बात मालूम है या नहीं , पर आपका बेटा  आकाश मेरी लिखी एक कहानी को पढ़कर मेरे पास आया था, अपनी माँ के अनुत्तरित सवाल ढूंढने के लिए। "
दिलीप बाबू को गहरा झटका लगा . "मतलब उसको पता चल गया ? इसीलिए वो भोपाल गया था ? हे  भगवान , अब मैं क्या करूँ, क्या मुँह दिखाऊँ उसे ? झूठ पर झूठ बोलता रहा उससे।."
"इसमें आपकी तो कोई गलती नहीं है , फिर आप क्यों घबरा रहे हैं।  अजीब बात यही तो है , गलती किसी की नहीं पर सजा सब भुगत रहे हैं।  यही तो मुझसे देखा नहीं गया।  इसीलिए मैं यहाँ चली आई आपको सिक्के का दूसरा पहलू दिखाने . आपका बेटा बहुत समझदार है , बहुत अच्छे से परवरिश की है आपने उसकी। वो जानता है कब किन परिस्थितियों में ये सब हुआ।  न तो आपको उसे कुछ समझाने की ज़रुरत है न सुलेखा को।  "

"फिर अब ?"

"अब आप बताएं . गलती सुलेखा से हुई , पर उसने उसका बहुत लंबा प्रायश्चित किया है.  मैंने उसे रोते तड़पते देखा है अकेले में अपने बेटे के लिए . आकाश से बिछड़ना उसकी मजबूरी थी , उसके पास उसे पालने पोसने के  साधन नहीं थे , पर उस दिन से वो एक भी रात चैन से नहीं सोयी . बहुत कठोर सज़ा  भुगती है उसने . अब जब उसे उसका बेटा मिला है तो उसमें नयी जान आई है , बहुत  खुश रहती है अब . पर मैं इतने से ही खुश नहीं हूँ . "

"जी ?"

"आपके बेटे ने पहली मुलाक़ात में मुझसे एक बहुत कठिन सवाल किया था.  उसने पूछा था कि मैं इतनी पत्थरदिल कैसे हो गयी  कि इस कहानी की नायिका को मँझधार में छोड़ दिया . क्यों नहीं कहानी के अंत में मैंने मिलवाया  उसे उसके परिवार से ? उस दिन मैंने उसे सुलेखा के बेटे के  रूप में पहचान लिया और मुझे महसूस हुआ कि कहानी का अंत अभी हुआ कहाँ था, वो तो मेरे हाथों अब होना था . अब मैं इस कहानी की लेखिका नहीं बल्कि खुद एक किरदार बन चुकी थी . और उसी किरदार की हैसियत से पहले आकाश को उसकी माँ से मिलवाया, और अब आपके पास आई हूँ, कहानी को एक सुखद अंत देने के लिए . आकाश के इलज़ाम से पूरी तरह बरी होने के लिए . "

"जी मुझे  समझ नहीं आता अब क्या करूँ . इतने सालों बाद क्या सब कुछ वापस सही हो पायेगा ?"

"जो हो गया सो हो गया , पर आगे तो ठीक किया जा सकता है . आप बताएं ये सब सुनने के बाद आपने सुलेखा को माफ़ किया या नहीं ."

"जी माफ़ मैं नहीं वो करेंगी मुझे . बस मुझे उनसे मिलवा दीजिये . बताइये क्या करना है ?"

"ज़रूर , आकाश  की कल से छुट्टियाँ हैं, अगर संभव हो तो उससे आज रात फ़ोन पर बात कर लीजिये और भोपाल आने को बोल दीजिये, आप भी आ जाइए . दोनों मिलकर उसे घर ले आइये ."

दिलीप बाबू ने राहत की साँस ली , सिर्फ एकाध दिन की बात थी , एक लम्बी अमावस के बाद अब चाँद निकलने वाला था .

*

फाइनल  एक्साम्स ख़त्म हो चुके थे।  अब पैकिंग करनी थी , घर के लिए निकलना था कल। मन सा नहीं कर रहा था यहाँ से निकलने का।  जानता था इसके बाद ज़िन्दगी बदलने वाली थी।  उसका प्लेसमेंट मुंबई में हुआ था और अवनी का बंगलोर में।  अब तक वो उसे प्रोपोज़ भी नहीं कर पाया था। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके बाद उसे कोई मौका ही नहीं मिलेगा ? तो क्या अभी जाके बोल दे उसे ?  कल वो भोपाल निकल जायेगी और आकाश कोलकाता।  इलाहाबाद तक का साथ था बस।  इतने में फ़ोन बजा। पापा का नंबर था।

"हेलो पापा। "
"हेलो बेटा, हो गयी पैकिंग आपकी ?"
"जी पापा , बस कल निकलना है दोपहर की ट्रेन से। "
"बेटा मुझे आपसे कुछ बात करनी थी।  बहुत ज़रूरी। "
"जी कहिये? "
"वो आज... अनुजा जी आईं थीं यहाँ। उन्होंने बहुत कुछ  बताया।  समझ नहीं आता तुमसे कैसे .. "
"अनुजा जी आई थीं ? फिर क्या हुआ ? पापा मुझे भी आपसे बात करनी थी , पर सोचा था घर पहुँचके करूंगा। "
"बेटा मुझे … मुझे माफ़…  " इससे आगे दिलीप बाबू खुद को संभाल नहीं पाये .
"पापा? आपको क्या हो गया ? संभालिये खुद को। मैं सब समझता हूँ पापा ! रुकिए मैं परसों आपसे आराम से बात करूंगा . आप चिंता मत कीजिये . कुछ नहीं हुआ है, सब ठीक है ."
"नहीं बेटा, अब हमें और देर नहीं करनी चाहिए . चलो तुम्हारी माँ को ले आएं ."
आकाश को यकीन नहीं हो  रहा था . पापा ने माँ को न सिर्फ माफ़ कर दिया था बल्कि उन्हें घर ले आने की बात कर रहे थे . इतने दिनों से वो इसी बात को लेके परेशान था कि पापा से बात कैसे छेड़ेगा, पर यहां तो उल्टा हो रहा था ! ये तो अनुजा जी की करामात थी . वो उसके लिए इतनी दूर अकेली गयीं होंगी, उसके पापा जैसे अनजान शख्स से बात की होगी, तभी तो आज ये दिन आया था . उसका मन उनके लिए अपार  श्रद्धा से भर आया .

और अब आगे का प्लान बदल चुका था . इलाहबाद से ट्रेन बदलकर अब भोपाल जाना था . उसके पापा भी वहीं पहुँच रहे थे . माँ से मिलने के साथ साथ दिल के किसी कोने में आकाश को इस बात का भी इत्मीनान था कि  अवनी से मिलने का अवसर मिलेगा . इस बार तो उसे अवनी से बात करनी ही थी , किसी भी हालत में .

*

सुलेखा ने जब दरवाज़ा खोला तो सामने  अनुजा को देखकर थोड़ी हैरान थी।  अंदर जाकर अनुजा ने उसे दिलीप बाबू के बारे  जो बाहर कार में बैठे सही अवसर का इंतज़ार कर रहे थे।
" सुलेखा , अब सब ठीक हो जाएगा।  तुम अपने परिवार से वापस मिल जाओगी , उनके साथ चली जाओगी। अब मैं निकलती हूँ, दिलीप जी और तुम्हें जो गलतफहमियाँ हैं आपस में दूर कर लेना। फिर शाम को मैं आकाश को लेके आउंगी तो दोनों मिलकर बाहें फैलाकर उसका स्वागत करना , समझी ?"

सुलेखा सन्न थी , दिलीप जी यहाँ  आये थे, उससे मिलने ? शायद आकाश ने सब बता दिया हो।  दिलीप बाबू अंदर आ चुके थे। अनुजा से उनसे विदा ली और शाम को आकाश को लेकर आने का वादा किया। आकाश तो अभी आना चाहता था पर उन्होंने ही मना कर दिया था , चाहती थीं अब के उसके मम्मी पापा एक साथ मिलकर उसका स्वागत करें।

अनुजा के जाने के बाद दिलीप बाबू ने आगे बढ़के सुलेखा को गले से लगा लिया।  दोनों की आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे , अब कुछ कहने सुनने की ज़रुरत नहीं रही थी।  इतने बरसों के बिछोह के सामने सब शिकवे गिले धुल चुके थे, और न तो सुलेखा न दिलीप बाबू अब उस आलिंगन से मुक्त हो पा रहे थे। उनके हाथों की जकड़ बढ़ती जाती थी।  ऐसा लगता था जैसे आज शादी का पहला दिन हो । आज का मिलन मन का वो मिलन था जो पहली रात  बाकी रह गया था।

और शाम को जब आकाश आया और उसने पहली बार अपने माँ पिता को साथ में देखा तो वो अनगिनत सवालों से घिरे अजनबियों की तरह न लगते थे , अब वो ऐसे लगते थे जैसे हमेशा से साथ रहते आये हों , जैसे कभी कुछ न बिगड़ा हो। अब उन्हें उस प्यार की भरपाई करनी थी जो साथ न रहने से वो अपने बेटे को न दे पाये।
आकाश जाकर उनसे लिपट गया।  उधर दूर खड़ी अनुजा अपने हाथों से लिखे इस कहानी के सुखद अंत को देख  रही थी।

*

रात का खाना सुलेखा के घर बना।  अवनी के पिता के लिए खाना टिफ़िन में पहले ही पैक कर लिया था। घर में नौकर थे पर खाना हमेशा अनुजा के घर से जाता था , और सुलेखा ये बात जानती थी।

खाना खाकर सब लोग टेरेस पर पहुँचे, चांदनी रात थी , और हलकी हलकी हवा चल रही थी। आकाश मौका देखकर अवनी के साथ टहलने लगा और थोड़ी देर में वे एक शांत कोने में खड़े बातें कर रहे थे।  बाकी लोग कुर्सियाँ ले आये थे और गप्पबाजी चल रही थी।

"आज तो तुम बहुत खुश होंगे , है न ?"
"बहुत बहुत खुश ! विश्वास ही नहीं हो रहा कि ये सब सच है ! "
"हम्म ! मैं भी बहुत खुश हूँ , तुम्हारे लिए।  अब सब ठीक हो गया। "
आकाश मुस्कुराया, फिर धीरे से बोला," अब भी कुछ है जो ठीक होना बाकी है। "
"मतलब? अब क्या?"
" कल बताऊंगा , आज मुझे ये ख़ुशी हजम कर लेने दो ! "
"अच्छा! मतलब चैन नहीं मिला तुमको ?" अवनी हँस रही थी , और आकाश सोच रहा था , अब आगे क्या !

*

अगले दिन आकाश नाश्ता करके नीतू आंटी के घर पहुँचा। अब जो करना था जल्दी करना था , बिलकुल भी वक़्त नहीं था गंवाने के लिए। नीतू ने चाय बनाई और दोनों बालकनी में जाकर  बैठ गए।

"अब आगे आपको सम्भालना है। "
"पर तुम्हारा प्लान क्या है ?"
"हम लोग कल ही आसपास घूमने के लिए निकलेंगे।  आपको शरद अंकल को तैयार करना है। "
"वो तो बड़ा कठिन काम है।  भैया  इतना व्यस्त रहते हैं , वो तो सीधा ना कर देंगे । "
"शरद अंकल जानबूझकर व्यस्त रहते हैं। आप अवनी का वास्ता देकर उन्हें ले आइयेगा। वो भी तो बंगलौर चली जायेगी इसके बाद , फिर उसकी शादी वादी भी तो होगी। "
"शादी वादी ! क्या बात है, पूरे प्लान बना लिए उसकी लाइफ के ! उसको कुछ खबर है कि नहीं ?" नीतू उसे  छेड़ रही थी और वो शर्मा रहा था।

शाम को नीतू ने शरद को कॉल किया और जैसी उम्मीद थी , शरद ने सिरे से खारिज कर दिया।

"तुम लोग घूम आओ न  मैं क्या करूंगा ? मुझे बहुत काम हैं यहाँ। "
"अच्छा ? अवनी की खुशियों से भी ज़्यादा ज़रूरी?"
"क्यों ? अनुजा जी भी होंगी न साथ में ? "
"  नहीं वो नहीं जा पाएंगी , उनका कुछ कांफ्रेंस है उस दिन। "
"अच्छा, तो फिर मैं आ जाता हूँ। कोई तो होना चाहिए अवनी के साथ। "

इस तरह पहला झूठ बोलकर उसने शरद को मना लिया था।  अब दूसरा झूठ बोलकर अनुजा को मनाना था।

"मैं क्या करूंगी जाकर। तुम लोग घूम आओ। "
अवनी के पापा नहीं आ पा रहे। उसको खराब लगेगा।  आकाश अपने मम्मी पापा के साथ होगा, और वो अकेली। उसके पापा भी क्या सोचेंगे। "
"ठीक है, आऊँगी मैं भी , पर प्लान क्या है ?"
"ऐसे ही, बच्चे लोगों का एक हफ्ते का ब्रेक है , उसके बाद नौकरी ज्वाइन करनी है।  ये लास्ट चांस है परिवार के साथ इत्मीनान से घूमने का।  अभी जगह फिक्स नहीं हुई कहाँ जाना है।  गर्मियाँ हैं तो किसी हिल स्टेशन ही चलना ठीक रहेगा। "
"हिल स्टेशन तो आस पास एक ही है, पंचमढ़ी!"
"नहीं वो भी अब ठंडा नहीं रहा।  सुना है उसके झरने सूख  गए, इतनी गर्मी पड़ी है इस बार। "
"तो फिर?"
"फिर क्या? हिमालय चलते हैं ! वहाँ तो ठण्ड होगी। "
"वहाँ जाना भी तो रिस्की है, पहाड़ टूटते रहते हैं। "
"ऐसे सोचेंगे तो हो गया ! बच्चों से पूछती हूँ वही बताएँगे। "

बच्चे भी पहाड़ों में जाने के इच्छुक थे। सुलेखा और दिलीप बाबू के लिए तो अब कोई भी जगह जन्नत थी , अब उन्हें कुछ दिन आकाश के साथ दिल खोलकर जीना था। तो फाइनल हो गया कि वो लोग बद्रीनाथ  जा रहे थे। कुछ दिन पहले दिलीप बाबू के कोई मित्र वहाँ से घूमके आये थे और तब से वहीं के गुणगान करते नहीं थकते थे।  पास में जोशीमठ औली जैसे रहने के ठिकाने थे।

शाम को आकाश अवनी के साथ कुछ गर्म कपड़ों की शॉपिंग के बहाने निकला। दो दिन ही सही ठण्ड से तो बचना था। शॉपिंग करके दोनों एक कॉफ़ी शॉप में इत्मीनान से बैठे। मौका देखकर आकाश ने बात छेड़ी।

"तुम पूछ रही थी न कि अब क्या ठीक होना बाकी है ?"
"हाँ। "
"इतने दिन हो गए , तुमने अब तक अपने पापा से नहीं मिलाया। ऐसा क्यों ?"
" अरे ये भी कोई बात हुई ? वो रात को देर से लौटते हैं।  हमेशा से ऐसा ही चलता आया है। "
"अवनी बिजी तो मेरे पापा भी रहते हैं , पर दिखाई ही न दें ऐसा तो नहीं होता। क्या तुम्हें ये बात कभी खटकी नहीं?"
"मुझे समझ नहीं आ रहा क्या खटकना चाहिए। "
"तुम अनुजा आंटी को अकेले में मॉम कहती हो न।  पूरी दुनिया को तुमने ये बताया है कि तुम्हारी माँ हैं।  क्या तुमने कभी ये नहीं चाहा कि वो अनुजा जी जिन्होंने तुम्हारी देख रेख में कोई कसर नहीं छोड़ी , खुद शादी न करके तुमपर पूरा जीवन लुटा दिया , उन्हें छुप छुपके नहीं सबके सामने  तुम्हारी माँ का दर्जा मिले ?"

"हम्म। ये सच है कि उन्होंने सगी माँओं से ज़्यादा मुझे माँ का प्यार दिया, पर मेरे कारण उन्होंने शादी नहीं की ,  ऐसा नहीं है।  शायद तुम जानते नहीं कि उनकी शादी भी हुई है और तलाक भी। मुझे लगा उस बुरे अनुभव के बाद उन्होंने फिर शादी न करने का फैसला लिया हो। "

"इन सबके अलावा भी एक बात है , जो तुम जानती नहीं। "
"क्या ? "
"शरद अंकल और माया आंटी बचपन से एक दूसरे  के पडोसी थे , और कॉलेज के दिनों में एक दूसरे को जीवनसाथी बनाना चाहते थे। "
"क्या ? तुम्हें कैसे पता ?"
"नीतू आंटी ने बताया।   "
"पर आंटी ने मुझे कभी क्यों नहीं बताया ?"
"उन्हें लगा शायद तुम्हें ये सच कड़वा लगे।  पर मुझे तुम्हें बताना था , क्योंकि आगे बढ़ने के लिए ये सच हजम करना  ज़रूरी है। "
अवनी खामोश थी। समझ नहीं आ रहा था क्या रिएक्शन दे। एक अजनबी उसे उसके परिवार के बारे में ज्ञान दिए जा रहा था।
"अवनी , मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहता।  मैं सिर्फ ये बताना चाहता हूँ कि कितने महान हैं तुम्हारे माता पिता , जिन्होंने सिर्फ तुम्हारी खातिर उस वक़्त एक दूसरे से शादी नहीं की जब परिस्थितियाँ उन्हें फिर करीब ले आई थीं। "
"पर मेरे कारण शादी क्यों नहीं की ? शादी करके तो वो मेरी माँ बन जातीं , फिर तो कोई दिक्कत नहीं होती , ये दिन रात का तमाशा नहीं होता। मैं भी उसी में खुश रहती। "
"नहीं अवनी , ऐसा तुम्हें लगता है।  पर ये बात दोनों जानते थे कि दूर रहकर जितना प्यार वो तुम्हें दे सकते हैं उतना शादी करके नहीं।  शादी करके वो तुम्हारी सौतेली माँ बन जाती , फिर उनका अपना भी बच्चा होता क्योंकि उन्हें अपने ऊपर से वो दाग भी हटाने का मन करता कि वो माँ नहीं बन सकती। और न तो शरद बाबू न अनुजा जी तुम्हारे हिस्से के प्यार से कुछ समझौता करना चाहते थे। "
" ओह !" अब अवनी को समझ आ रहा था कि क्यों दोनों एक दूसरे को इतनी बुरी तरह अवॉयड करते थे। ये बात उसे क्यों नहीं खटकी थी ?
अगर ऐसा था , शरद बाबू और अनुजा जी ने उसकी खातिर दूर रहने का फैसला किया  था तो अब वो उन्हें और दूर नहीं रखेगी।  अब वो खुद उन्हें पास लाएगी।  कितना अच्छा होगा अगर वो लोग एक घर में एक परिवार की तरह रहे। वो उन्हें खुलकर माँ कह सकेगी।

"जानता हूँ तुम क्या सोच रही हो। और ये काम तुमको इसी ट्रिप में करना है। "
"इसी ट्रिप में ? पर दोनों कभी साथ आने को राज़ी नहीं होंगे।  एक जाएगा तो दूसरा बहाना कर लेगा। "
"उसका इंतज़ाम हो गया है।  कल सुबह ट्रेन से जब हम दिल्ली के लिए निकलेंगे तो दोनों हमारे साथ होंगे। तुम बस  आज अपना मुंह मत खोलना ,  ये लोग एक दूसरे के बारे में  पूछे तो बोलना तुम्हें नहीं पता। "
"अच्छा जी।"


*

अगली शाम दिल्ली के लिए निकलना था , और फिर सुबह वहाँ से ऋषिकेश के लिए। शाम को जब स्टेशन जाने के लिए गाडी खड़ी हुई तो शरद बाबू और अनुजाजी एक दूसरे को देखकर हैरान थे। पर अब कुछ हो नहीं सकता था।
ट्रेन में दिलीप बाबू और शरद बाबू साथ में बैठे।  सुलेखा और अनुजा एक साथ , और नीतू आंटी और अवनी साइड बर्थ में। आकाश  अगली  अपर बर्थ में था, उसकी सीट थोड़ी दूर थी। दिलीप बाबू को पहले ही अवनी के परिवार की केमिस्ट्री समझा दी गयी थी ताकि वो कुछ एम्बेरेसिंग सा न पूछ लें।
शरद बाबू ने जाने कितने अर्सों बाद अनुजा का दीदार किया था।  इससे पहले  दूर दूर से दीखते थे, पर बातें कब से नहीं हुई थीं। और नीतू ने इस बात का ख़ास ख्याल रखा था कि वो और सुलेखा अनुजा को माया कहके बुलाएं। माया ने अपना नाम लेखिका के रूप में अनुजा रखा था पर ये लोग उसे माया ही बुलाते थे।

माया शब्द  सुनकर ही शरद बाबू को कुछ होने लगता था।  बरसों पुरानी यादें जेहन में आ जाती थीं। कितना प्रेम करते थे उनसे।  पर किस्मत ने जितनी बार मिलाया चाह कर भी मिलन न हो सका।  और अब जब अवनी बड़ी हो गयी थी, शादी करके एक दिन दूर चली जाने वाली थी , फिर क्या वो दोनों इसी तरह रहते, साथ रहकर भी तनहा? क्या उनकी ज़िन्दगी का सूरज ढल चुका था? अब इस उम्र में बच्चों के सामने अपनी इस तरह की बात करना शोभा भी तो नहीं देता था। और फिर माया के दिल में क्या था, ये भी तो पता नहीं था।

धीरे धीरे सब एक दूसरे से खुलते जा रहे थे। अगली सुबह दिल्ली पहुँचकर उन्होंने ऋषिकेश के लिए गाड़ी की। दिलीप बाबू ने अपने दोस्त से सारे ज़रूरी कांटेक्ट नंबर्स ले लिए थे होटल, ड्राइवर्स वगैरह के। शाम छह बजे वो लोग  ऋषिकेश पहुँच चुके थे , जहाँ उन्हें रात गुज़ारनी थी। वहाँ की शाम की आरती देखने के लिए दिलीप जी के मित्र  खासतौर पर कहा था। ठीक वक़्त पर वो लोग त्रिवेणी घाट पहुँच गए, और फिर जो नज़ारा दिखा, वो अलौकिक था। हवा में लहराते आरती के  थाल, और साथ में बजती घंटियाँ, पानी में तैरते असंख्य दीप, मंत्रोच्चार के स्वर। देवभूमि में कदम रखने का पहला एहसास हो चुका था।

आकाश और उसके  माँ पिता एक साथ साथ आरती कर रहे थे।  पहली बार एक परिवार की तरह भगवान की शरण में आये थे , उनका आशीर्वाद लेना चाहते थे। नीतू और अवनी पहले शरद और माया के साथ थे फिर यहाँ वहाँ एक दूसरे के फोटो खींचने लगे , जानबूझकर खुद को दूर रखने के लिए।  शरद और माया चुपचाप घाट की सीढ़ियों में बैठ गए, और सामने का विहंगम दृश्य निहारने लगे। इतने दिनों बाद इस तरह दोनों काफी असहज महसूस कर रहे थे , फिर थोड़ी देर में अवनी भी आकर बैठ गयी, और नीतू ने उन तीनों की साथ में फोटो  ले ली।

रात को डिनर के बाद अवनी पापा को लेकर बाहर टहलने निकली। ये उनका नियम था, क्वालिटी टाइम बिताने का।
अवनी ने टहलते हुए पापा को आकाश की पूरी कहानी सुनाई। कैसे माया ने उसे उसके परिवार से मिलाया। वो हैरान थे  सुनकर , क्योंकि देखने से ऐसा नहीं लगता कि ये परिवार पहली बार साथ में रह रहा था।
थोड़ी देर में वे थककर एक बेंच में बैठ गए ।
"सच में, मुझे विश्वास नहीं होता। ये तो फिल्मों की कहानी जैसा है, एक उपन्यास से इतना कुछ हो सकता है।"
"पापा, अतीत में जो भी गलतफहमियाँ  हुई हों या जो कुछ भी सोचकर हम फैसले लेते हों , वो  आगे चलके गलत भी हो सकते हैं, है न ?"
"हाँ हो ही सकते हैं। "
"ऐसे में हमें उन फैसलों को बदल देना चाहिए या अतीत को सीने से लगाके रखना चाहिए ?"
"वही करना चाहिए जो उन्होंने किया।  "
"पापा , यही मैं आपसे कहना चाहती हूँ। "
"मतलब?"
 अवनी ने मोबाइल से  फोटो दिखाई जो नीतू आंटी ने  तीनों की साथ में ली थी, और  हौले से बोली, "अब भी देर नहीं हुई है पापा। "
पापा उसका इशारा समझ  गए थे। विश्वास नहीं आता था कि जो हो रहा है वो हकीकत है।
ऐसा लगता था कि पूरी कायनात अब एक ही साजिश कर रही थी। और जब भगवान साथ था और बेटी साथ थी तो अब इसे कौन रोक सकता था।

आकाश खिड़की से देख रहा था। जल्द ही कुछ ज़िंदगियाँ  बदलने वाली थीं , और उसे इसका बेसब्री से इंतज़ार था। माया ने आकाश के लिए जो किया , वही अब माया के साथ होने जा रहा था, और अब के कहानी का लेखक आकाश था।

*

अगले दिन पूरा सफर करके वो रात  तक जोशीमठ पहुँचे।  सबकी हालत खराब थी , और आधे लोगों ने बीच रास्ते में उल्टियाँ की थीं।  ऋषिकेश से पहाड़ शुरू होता था और पहाड़ के नखरीले रस्तों से पार होना हर किसी के लिए आसाँ नहीं था। अगले दिन सुबह बद्रीनाथ के लिए निकलना था। विश्वास नहीं होता था कि दो दिन पहले भोपाल में मक्खी मार रहे लोग आज पहाड़ों की गोद में भगवान बद्री विशाल के चरणों में पहुँच गए थे।  ये ऐसी जगह थी जहाँ आत्मा का परमात्मा से मिलन होता था, जहाँ जीवन के मायने मिलते थे। चारों और कानों को भेदता सन्नाटा दुनिया से दूर खुद में झाँकने को, अपनी मिटटी से , अपनी जड़ों से जुड़ने को व्याकुल करता था। ऐसा लगता था कि आने में बहुत देर हो गयी, यहाँ तो जीवन के पहले चरण में आना था , खुद का परिचय पाकर जाना था। फिर कोई दुविधा, कोई परेशानी शरीर से आत्मा तक उतरने की जुर्रत नहीं करती।

दिन में जब अवनी  को उल्टियाँ आने को हुई थीं तो उसे गाड़ी के बीच की सीट से उठकर खिड़की की तरफ बैठना पड़ा।  और इस तरह शरद बाबू माया के पास आ गये। पहली बार दोनों एक दूसरे से सटे हुए इतने करीब थे।  और फिर धीरे धीरे जब माया को नींद के झोंके आने लगे तो उसका सर खुद ब खुद शरद बाबू के कन्धों पर
गिरता गया, और जब उसकी नींद खुलती तो वो झेंपकर सीधी बैठ जाती पर फिर धीरे धीरे नींद उसे अपनी आगोश में लेती और फिर उसका सर शरद बाबू के कन्धों में लुढक जाता। पीछे बैठे आकाश और नीतू  इस दृश्य के मज़े ले रहे होते। शरद बाबू को लगता कि ये कायनात की साजिश है , जबकि ये साजिश थी अवनी की जिसने उलटी का बहाना करके जगह बदलवा दी थी! अवनी का ड्रामा देख आकाश बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोक पाया था।

तो कायनात की साजिश को अंजाम पर लाना था। कल भगवान बद्री विशाल के दर्शन करने थे , पर अकेले नहीं।

दिन भर नींद में डूबी माया जोशीमठ पहुँचकर बड़ी बड़ी आँखों से आस पास के नज़ारे देख रही थी।  सामने एक पहाड़ था जिसपर एक सोयी हुई सुंदरी के जैसी आकृति बनी थी।  दूर फैली चोटियों में बर्फ पर ढलते सूरज की रौशनी पड़  रही थी और वो पिघले सोने की तरह चमक उठती थीं। माया  का दार्शनिक मन आज रोमांचित हो उठा था। ऐसा लगता था जैसे बरसों से सोया प्रेम आज उठकर उन वादियों में अपनी धड़कन महसूस कर रहा था।जैसे जीने को एक नयी वजह मिल गयी थी।  ऐसी पावन सुन्दर धरती, यहाँ वो अब तक क्यों नहीं आई थी ? और आज अगर आई तो क्या ये एक नए मोड़ की शुरुआत थी?  क्या कोई बरसों से दफ़न  ख्वाब अंगड़ाई लेता हुआ जाग रहा था ?

माया और शरद बाबू की वो असहजता, जो बरसों एक दूसरे की शक्ल तक न देखने की ज़िद के कारण उनके बीच पनप गयी थी, आज के सूर्यास्त की आंच में पिघल रही थी। अब शरद बाबू की आँखों में वही आत्मीयता नज़र आती थी जो बरसों पहले उनके घर उनकी शादी की बधाई देने जाने पर दिखी थी , जिसे  देखकर वो विचलित हो गयी थी , भाग गयी थी उनके सवाल का जवाब अधूरा छोड़कर। और आज वही सवाल फिर दिखा था उनकी आँखों में। अब भी क्या वो भागना चाहती थी, या हमेशा  के लिए रह जाना चाहती थी उसका जवाब बनकर। क्या इतने बरसों की तपस्या के बाद अब भी वो उस मासूम ख़ुशी की हकदार नहीं थी ? पर अवनी, वो क्या सोचेगी ?

उस रात शरद बाबू ने नीतू से बात की।  वही बात जो उन्हें बरसों पहले कर लेनी चाहिए थी।  और नीतू ख़ुशी ख़ुशी उनका संदेसा लेकर माया के पास गयी। इस बार वो कुछ आड़ा तिरछा सुनने के मूड में नहीं थी , और  तो और अवनी  का भी साथ था । बरसों से जो अपने भैया और अपनी दोस्त को न समझ पाने का दुःख नीतू पर बोझ बनकर रह रहा था वो आज हल्का होने  वाला था, उसी के हाथों।  और जब उसने माया को अपने भैया का संदेसा सुनाया तो इससे पहले कि माया के मुंह से अवनी शब्द निकल पाता वो खुद सामने आके खड़ी हो गयी।अब कोई बंदिश, कोई मजबूरी न रही थी। बेशुमार प्यार, बेशुमार ख़ुशी भरी ज़िन्दगी की ईश्वर के आशीर्वाद के साथ नींव पड़ने वाली थी।  और जो बात शरद बाबू नहीं जानते थे वो ये थी कि आकाश और अवनी ने अगली सुबह उनकी शादी का भी इंतज़ाम कर दिया था! आखिर भगवान बद्री विशाल के सामने अवनी को अपने परिवार के साथ जाकर आशीर्वाद लेना था। तो पहले परिवार को जोड़ना ज़रूरी था !

सुबह सुबह जोशीमठ के एक प्राचीन मंदिर में उनकी शादी संपन्न हुई।
माया के गाल शर्म से लाल थे , और शरद बाबू चाह कर भी अपनी ख़ुशी छुपा नहीं पा रहे थे। दिलीप और सुलेखा भी बहुत खुश थे, ये देखकर कि जो ख़ुशी माया उनकी ज़िन्दगी में लेकर आई थी वो उनका बेटा आज माया की ज़िन्दगी में ले आया था।  एक और लम्बे अमावस के बाद चाँदनी खिल उठी थी।

"अब तो सब ठीक हो गया न , अब तो खुश हो न तुम?" अवनी और आकाश मंदिर की तरफ चल रहे थे, बाकियों से पीछे ।
"अभी कहाँ !"

और बद्रीनाथ  मंदिर में दर्शन से ठीक पहले जब आकाश ने चुपके से अवनी का हाथ थामा और अवनी के होंठों पर शर्मीली मुस्कान तैर आई तो आकाश ने आँखें बंद कीं और हौले से कहा..

"हाँ, अब सब ठीक है। "



3 टिप्‍पणियां:

Ichha Thapliyal ने कहा…

Beautiful.... Long but indulging...

Rangraj Iyengar ने कहा…

आपकी अगले पोस्ट के इंतजार से थक कर,किश्तों में ही सही पूरी कहानी "मायने" पढ़ी.
मेरा मन मानने को तैयार ही नहीं हो रहा है कि यह सिर्ज्ञफ एक कहानी है.
लगता है - यथार्थ के साथ कुछ काल्पनिक भी है.

भावों को निचोड़कर ऱकदेने वाली और बाँधकर रखने वाली है यह कहानी.
अयंगर

varsha ने कहा…

अयंगर जी और इच्छा जी आप दोनों का इतनी लम्बी कहानी धैर्य से पढ़ने और कमेंट्स द्वारा अपनी राय देने का शुक्रिया, इससे मेरा लिखना सार्थक हो गया। ये कहानी पूरी काल्पनिक है और इसे बुनने में मुझे बहुत वक़्त लगा। बीच में एकाध साल ये अधूरी पड़ी रही। अभी जाके इसे अंजाम तक पहुँचा पायी हूँ और मुझे खुद को सुकून मिला है !