मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

पिंजरे में मिश्रा



"क्या????"
"हाँ. ठीक ही सुना तुमने।"
"हाहाहा!"
"हँस लो, फिर बता देना। कल तक का टाइम है।"
"मतलब?"
"मतलब जब ये बात हजम हो जाए तो मेरे प्रपोजल का जवाब दे देना। कल सुबह से पहले।" 
"तुम्हारा प्रपोजल? मतलब उसको सीरियसली लेना है?" 
"हे भगवान! उठा ले मुझे। अभी के अभी।"
अरे नहीं नहीं भगवान काहे उठाएंगे, हम ही उठाएंगे। मतलब कोई बहुत धाँसू बन्दा आएगा तुम्हारी लाइफ में।"
"अच्छा? बन्दे को सामने से न्यौता दे रहे हैं तो उसे हजम नहीं हो रहा!"
"अरे हम थोडी कोई धाँसू बन्दे हैं! तुमको हो क्या गया है? रुको पानी मारते हैं तुम्हारे मुँह पर। शायद होश में जाओ।"
"रहने दो। चलते हैं। अब यही दिन देखना बाकी रह गया था कि लडकों को प्रपोज भी करो और उनके नखरे भी झेलो।"
"अरे अरे रुको तो! मुझे सच में हजम नहीं… अरे बाबा.."
लो, चली गयी! 
मिश्रा सोच रहा था, आज पहली अप्रैल तो नहीं? 
*
पूरी रात करवट बदलता रहा। रूमी शरद भी नोट कर रहा था, कुछ तो गडबड है। पर ये महाशय पहले खुद तो बात को हजम कर लेते तब तो किसी और को करवा पाते!
हम्म, तो कहाँ से हुई थी इस हसीन किस्से की शुरुआत! रोज की तरह एक आम दिन था। एक ऎसा दिन जो आमतौर पर कान खुजाते हुए उठने से शुरू होके बिस्तर पर धम्म से गिरके सो जाने पर खत्म हुआ करता था। पर आज सुबह सुबह जब नैना का मैसेज मिला "C u at 7pm Barista" तभी समझ गये थे कि कुछ तो बात है। ये कन्या उसकी प्रेमिका तो थी नहीं, बस औफिस के कलीग की बैचमेट हुआ करती थी कभी, तो इस अंजान शहर में इतनी सी जान पहचान भी अजनबियों के बीच अपनापन महसूस कराने के लिए काफी हुआ करती थी। और धीरे धीरे उनका एक अपना ग्रुप बन गया। - लोगों का। खूब मस्ती  चलती। वो लोग अक्सर शाम को  मूवीज देखते, घूमते फिरते, एक दूसरे की टाँग खिँचाई करते। पीजी में रहते थे तो लगता ही नहीं था कौलेज खत्म हो गया है और नौकरी चल रही है। पूरे शहर की खाक छान ली थी। प्यार हो गया था, शहर से, यारों से, और इनके साथ कदम मिलाती चलती जिंदगी से। 

पर ऎसा करते करते जब एक साल से ऊपर हो गया और खाक छानने लायक 10 किमी की परिधि में कुछ नहीं बचा तो उन्हें समझ आने लगा कि जिंदगी अब कुछ और चाहती है। ये चाहती है कि कुछ फैसले लिये जायें जो जिंदगी को ठहराव दें, भरोसा दें कि जिंदगी आगे भी यूँ ही हसीन रहेगी। वर्ना तो एक ही ढर्रे पर चलते हुए ये बदबू मारने लगी थी। 
और जिंदगी की इस उत्कंठा के सबूत थे मिश्रा के परिवार द्वारा  सुझाए वो सब प्रोफाइल्स जो मैट्रिमोनियल साइट्स पे बत्तीसी कुछ छुपाते कुछ दिखाते अपनी उपलब्धता की जानकारी दे रहे होते थे, वैसे ही जैसे परिवारवालों ने इधर इनकी उपलब्धता की जानकारी दी हुई थी। और जानकारी भी ऐसी कि मिश्रा खुद की प्रोफाइल देखकर पूछता ये कौन है! 
26/165/5'6" गौरवर्ण छरहरा उच्चकोटि कान्यकुब्ज ब्राह्मण प्रतिष्ठित परिवार इंजीनियर एमबीए MNC में कार्यरत वेतन छह अंकों में, हेतु सुयोग्य गोरी सुंदर स्लिम संस्कारी उच्चशिक्षित घरेलू / नौकरीपेशा कान्यकुब्ज ब्राह्मण वधू....
मिश्रा को शक होता कि घरवाले इस तरह के विज्ञापन देकर उसकी शादी इस जनम में कराना चाहते हैं कि नहीं। फिर मम्मी बताती कि बेटा ये तो छुपे हुए कान्यकुब्ज ब्राह्मणों को देश के कोने कोने से ढूँढकर निकालने के लिये है। एक बार सब औप्शन पता चलें तो फिर ऎलिमिनेशन राउंड, फिर चुनी हुई लडकियों को एक एक करके देखने जाना, फिर उन्हें घटते गोरेपन के अनुसार अरेंज करके सबसे गोरी के घर जाके बात पक्की करना, बस! हो गयी तेरा शादी! अब हम इतना भी नहीं करेंगे अपने सौरभ  के लिए? (सौरभ मतलब मिश्रा )
तो सबकुछ प्लान के अनुरूप चल रहा था। एलिमिनेशन राउंड के बाद तीन चार बढिया प्रोफाइल्स बचे थे जिनमें से अक्कड बक्कड करके एक को चुनना था। सब एक से बढकर एक गोरी और सुंदर। सब जौब भी करती थीं। पर हाँ कोई मिश्रा  के शहर में नहीं थी, सबको विस्थापित होना पडता। खैर वो कोई बडा मुद्दा भी नहीं था। गोरी सुंदर कान्यकुब्ज कन्या का आना लगभग तय था।
और फिर मिश्रा की जिंदगी में एक शाम बरिस्ता में कुछ यूँ हुआ।।
"क्या लोगी?"
"तुम बताओ।"
"बाकी लोग को नहीं बुलाई?"
"तुमसे कुछ बात करनी थी। तो तुमको बुलाया।"
"अच्छा! क्या बात है, हमसे बात करनी है, अकेले में। खीखीखी! "
"मुझसे शादी करोगे?"
"क्या???"
*
नैना की दिमागी हालत कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रही थी ये बात तो मिश्रा जानता था, पर बात यहाँ तक पहुँच जाएगी कि वो उसको प्रपोज कर देगी? उसको? बात कुछ और थी। और मिश्रा को पता लगाना था। तो जब रूममेट सो गया तो मिश्रा ने लैपटाप खोला और एक एक्सेलशीट  बनाई, केस स्टडी नाम से।
प्रपोज करने के संभावित कारण: 
1: परिवार द्वारा लाये गये गुजरे रिश्तों से बेहतर की चाह
2: अच्छे रिश्तों के लिये पर्याप्त दहेजराशि का अभाव
3: सौरभ से सच्चा प्यार 

बस इतने ही संभावित कारण सूझ रहे थे उसको। उनमें से भी तीसरा वाला तो पढके उसे खुद हँसी गयी थी। वो लोग ज्यादातर ग्रुप में ही रहते  थे, पर हाँ उनकी बनती खूब थी। दोनों मिलके बाकियों की खूब खिँचाई करते थे। क्यूट सा माहौल रहता था। और दोनों का ह्यूमर लेवल गजब का था। उनकी बातचीत को कहीं अक्षरश: लिख दिया जाय तो बैस्टसैलिंग नौवल तैयार हो जाय। 
पर ये तो कोई कारण नहीं हो सकता प्यार व्यार के लिये! उसको तो हमेशा से पता था कि इत्तेफाक से किसी सजातीय गोरी सुंदर कन्या का उससे टकरा जाने के अलावा उसकी जिंदगी में लव शव का कोई स्कोप नहीं था। करना उसको मम्मी पापा के हिसाब से ही था। उनके कानपुर में तो ये बहुत बडी प्रतिष्ठा वाली बात होती थी। बडे भय्या ने भी उनका मान रखा था। फक्र से सर उठाकर चलते थे उसके मम्मी पापा। और वो भी तो कितनी इज्जत करता, कितना प्यार करता था उनसे। इतनी अच्छी परवरिश की थी उन्होंने उसकी। 
तो ऎसे में इस अचानक से मिले प्रपोजल का क्या किया जाय! ये तो बडी दुविधा की स्थिति बन गयी थी। हाँ अभी कर नहीं सकता था, चाहकर भी कुछ भी हो, उनकी दोस्ती तो दाँव पर लग चुकी थी। अब वो हँसते-खेलते, टाँग खीँचने वाले दिन खत्म हो चुके थे। एक मासूम रिश्ता अपने ख़त्म होने की तारीख बता गया था। आज वो बहुत दुखी था। किसी लडकी द्वारा सामने प्रपोज किये जाने का कोई आनन्द, कोई अभिमान नहीं। बहुत देर तक आँखें खोलकर लेटा रहा, करवट बदलता रहा। 
 अगले दिन उसने मोबाइल ही स्विच ऑफ कर दिया।  खुद को छिपाने की चाह में।
पूरे दिन मोबाइल बंद रहने से ऑफिस के भी कई ज़रूरी काम अटक गए, पर कोई और चारा भी नहीं था। किसी भी हालत में आज नैना का सामना नहीं कर सकता था। वैसे उसने सिर्फ सुबह तक की ही मोहलत दी थी।  ऐसा क्यों ? इतना कम वक़्त। कहीं जा तो नहीं रही थी वो ? पता करे तो कैसे ?
शाम को मोबाइल चालू किया तो तुरंत मम्मी का फ़ोन आया। दिन भर में काफी बार ट्राई किया था शायद, चिंतित लग रही थीं।
"खैर, अब से एक  चार्जर बैग में रखे रहना। "
"जी मम्मी। "
"और टिकट बुक कर लिया?"
"जी?"
"अरे? यहां आना है ? लड़की फाइनल करनी है कि नहीं? "
"ओह, हाँ। करता हूँ मम्मी। "
"जल्दी कर लेना, कोई और लड़का हमसे पहले आके रोका कर जाए। अच्छे घर की हैं सब, वैसे ही लाइन लगी होगी। " मम्मी वैसे ही चिंतित थी जैसे बिग बाजार में २६ जनवरी को लगने वाली सेल से पहले होती थीं।
फ़ोन रखने के बाद मिश्रा देर तक पंखे को निहारता रहा।  उसका इकलौता फ्लैटमेट शरद  कल रात से उसको नोटिस कर रहा था। समझ रहा था कुछ बात तो है।
"उषा लेक्सस  का है। "
"क्या?"
"पंखा, और क्या। "
"हाहाअरे नहीं यार, ऐसे ही पड़ा हूँ, मम्मी बुला रही कानपुर। वही सब सोच रहा।  "
" अच्छा, तो हो आओ कानपुर  कर आओ कोई कन्या बुक। "
"साला तू भी। "
" और क्या , जो है सो है। "
"तेरे घरवाले सही हैं , मालती को अपना लिए आराम से। "
"इतने आराम से भी नहीं अपनाये जितना तुझे लग रहा! पर तू काहे ये सब सोच रहा है, तेरी तो कोई बंदी नहीं ?"
"होने से भी क्या होता ! "
"अगर होती , तो कुछ कुछ ज़रूर होता। अब चल, खाने का जुगाड़ करते हैं।  कल टिकट कर लेना। "
अगर होती तो कुछ कुछ हो जाता। मिश्रा के कानों में ये बात गूँज रही थी।
*
दो तीन दिन बाद शरद से पता चला कि नैना लौट चुकी थी   ये भी पता चला कि जिस काम के लिए गयी थी वो हो गया।
मिश्रा हँस  रहा था। यही तो था , उनकी किस्मत में। इधर नैना की बात पक्की, उधर मिश्रा के कानपुर जाने भर की देर।  और हँसी  की बात ये थी कि ये देर जो कानपुर जाने की हो रही थी, बस वही एक चीज थी जो किस्मत के नहीं, मिश्रा के हाथों हो रही थी। रोज़ टिकट बुक करने बैठता, सीट घटते देखता , सीट शून्य होते देखता, और तब बुकिंग  शुरू करता जब वेटिंग शुरू हो जाती   किस्मत को बस इतना करना था कि उस वेटिंग वाली टिकट को कन्फर्म करना था।
और किस्मत ने ये बदस्तूर किया।  शुक्रवार सुबह करायी टिकट शाम तक कन्फर्म हो गयी। अब मिश्रा को सुकून था कि जो हुआ उसमें उसकी गलती नहीं है, ये तो किस्मत में लिखा था!
शनिवार शाम को मिश्रा कानपुर के लिए निकल गया।  छह बजे की ट्रेन थी। ऑफिस से दौड़ा भागा  स्टेशन पहुंचा था।
*
मालती की ज़िन्दगी में पिछले हफ्ते कुछ अजीब सी चीज हुई थी, पर वो किसी को बता नहीं पा रही थी, अपने बैस्ट फ्रेंड और मंगेतर शरद को भी नहीं  और आज शाम तो हद ही हो गयी।  मिश्रा का फ़ोन आया था, बताने के लिए कि निकल रहा है फाइनली। ऐसा लगता था जैसे मालती को नहीं खुद को बता रहा हो कि अब ये फाइनल है। इस पूरे हफ्ते मालती से टच में रहा, और बात घुमाफिराके नैना पर रुक जाती। फिर भले ही मिश्रा के पास कुछ नया होता पूछने के लिए मालती के पास कुछ नया होता बताने के लिए! और होता भी कैसे, नैना कुछ बोलती तब न। जब से घर से आई थी, थोड़ा अवॉयड ही कर रही थी ग्रुप को। पता नहीं सच में बिजी थी या बहाना कर रही थी।  पर आज जब उसने मालती को मिश्रा से बात करते सुना तो काम छोड़कर मालती के पास आई।
"निकल गया मिश्रा? "
"हाँ। अब तक तो ट्रेन चल दी होगी। "
"हम्म। फाइनली!"
"हाहा ! हाँ।"
नैना अपने रूम में चली गयी। एक अजीब सी चुप्पी थी जो अब चुभने लगी थी।
पर अब और नहीं, कानपुर की ट्रेन छूट चुकी थी। इंजन के उठते शोर की तरह नैना की खामोशी भी अब सिसकियों के रस्ते निकल चली थी। मालती हैरान परेशान उसके रूम में गयी तो नैना उससे लिपटकर देर तक रोती रही।  शायद ट्रेन के छूटने का ही इंतज़ार कर रही थी नैना।
और तब मालती को पता चला कि नैना की कोई बात वात पक्की नहीं हुई थी। वो यहां से सोचके ही निकली थी कि लड़के को रिजेक्ट कर देगी। और वही उसने किया था।  बहुत नाराज़  थी उसकी माँ , इससे अच्छा रिश्ता  अपने समाज से लाना उनके बस का नहीं था।  पापा के गुजरने के बाद जैसे तैसे बच्चों को बड़ा किया था। नैना बहुत ही काबिल लड़की थी और इस तरह अनजान इंसान से सिर्फ अपने समाज की खातिर शादी करना ये बात उसे हजम नहीं हुई थी।  और हाँ, मिश्रा उसे पसंद था, और उसने एक बार अपनी किस्मत खुद लिखने की कोशिश की थी।  पर फिर मिश्रा के रिस्पांस से समझ गया  था कि हर कोई अपने अपने पिंजरे में कैद था, बस फर्क इतना था कि मिश्रा का पिंजरा थोड़ा ज्यादा सुनहरा था।
"पर तूने झूठ क्यों बोला? "
"मिश्रा को और दुविधा में नहीं डालना था।"
मालती से ये सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उनके अच्छे खासे ग्रुप की क्या दुर्दशा हो गयी थी ! तो क्या अब सब ख़त्म हो जायेगा ? मालती और शरद  एक तरफ, मिश्रा एक तरफ , नैना एक तरफ। और बीच में एक बात जो कभी बन नहीं पायी।  क्यों किया मिश्रा ने ऐसा? क्या कमी थी नैना में, बस गोरी ही तो थोड़ी कम थी उससे, और उसके जैसी उच्चकोटि ब्राह्मण नहीं थी ! बाकी सब गुण  ऐसे थे  कि मिश्रा की ज़िन्दगी संवार देती। कितने खुश रहते सब मिलके।
मालती से ये बोझ अकेले नहीं सहा जाता था।  उसने शरद को  कॉल किया। शरद भी हैरान था।
पर जो सच था, उसे बदला नहीं जा सकता था।  मिश्रा निकल चुका था, और नैना ने उसे जाने दिया था, अपना सच छुपाकर।  वो सच जिसे पता करने के लिए मिश्रा रोज़ टिकट बुक होते देखता था , हाथ से निकलते देखता था। पर अब जब वो निकल चुका था , क्या अब भी वक़्त था? क्या अब भी वो लौट आता अगर नैना का सच उसे बताया जाता ?
शरद ने फ़ोन लगाया, पर अफ़सोस, मिश्रा नेटवर्क से बाहर जा चुका था।
*
उस शाम मालती ने खुद से एक वादा किया, नैना की ज़िन्दगी बर्बाद नहीं होने देगी।  मिश्रा नहीं तो और सही,  और नहीं  तो और सही। उसके और शरद  के फ्रेंड सर्किल में बहुत लोग थे जो इन सब बातों को नहीं मानते थे। पहले नैना को इस हालत से बाहर निकालना था और फिर किसी तरह इन लड़कों से उसकी 'इत्तेफ़ाकन' मुलाकातें करवानी थीं।  मिश्रा को उसकी गलती का एहसास दिलाना था। नैना जैसी प्यारी लड़की को ठुकराने की गलती।  और ये कोई मुश्किल काम नहीं था, सच तो यही था कि नैना को कोई भी दो तीन मुलाकातों में पसंद कर सकता था, सिवाय उनके जो अपनी ख़ुशी से  पिंजरे में कैद थे।
इस काम में शरद भी उसका साथ देने को तैयार हो गया। अब वो दोनों 'मैच मेकर ' बनने जा रहे थे। ख़ुशी भी थी, और थोड़ा दुःख भी। रही सही कसर  मिश्रा ने कानपुर से लौटकर ये बताके पूरी कर ली कि बंदी फाइनल हो गयी है।  आलम ये था कि किसी ने उससे पार्टी भी  नहीं मांगी!
*
 नैना को नार्मल करने में मालती को एक दिन लगा।  कुछ किताबें खरीदके उसको गिफ्ट करने की देर थी।  और इस हफ्ते शरद को उसे किसी अच्छे प्रोस्पेक्टिव लड़के से मिलाना था।
और जब शरद ने मालती को अपने प्लान के बारे में बताया तो पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ।
"मिश्रा ने लड़की फाइनल कर ली, ट्रीट दे रहा है , और तुम चाहते हो कि मैं नैना को भी अपने साथ लाऊँ !! पगला गए हो ??"
"नहीं। तुमने पूरी बात नहीं सुनी। "
" हम्म। "
"उस दिन एक एलिजिबल बन्दा भी आएगा हमारे साथ।  नैना भी रहेगी तो वहीं के वहीं इंट्रोड्यूस करा देंगे। चल पड़ी तो मिश्रा की शकल देखने लायक होगी !"
" अरे वाह ! सही प्लान है ! एक तीर से दो शिकार। "
" वही तो। इसलिए नैना को कैसे भी करके उधर लाना तुम्हारी जिम्मेदारी है। "
"किधर होगी वैसे?"
"बरिस्ता। "
"क्या?"
"हाँ। मिश्रा की चॉइस है , कुछ कर नहीं सकते।  पर नैना स्ट्रांग लड़की है , वो आएगी। जो लड़के को सामने से प्रोपोज़ कर सकती है वो वक़्त आने पर उसे नानी भी याद दिला सकती है। "
"हम्म।  मिश्रा के लिए इतना नेगेटिव होना अच्छा नहीं लग रहा , पर क्या करें। "
"जो कहा वही करो।  मिश्रा तुम्हें और नैना को कॉल करेगा इन्वाइट करने के लिए। तुम्हें बस आना है बाकी मैं संभाल लूँगा। "
"ठीक है। "
*
शरद सही कह रहा था। नैना वाकई में स्ट्रॉन्ग बंदी थी।  उसने मिश्रा की खबर सुनके सामने से ही ट्रीट मांग ली। मिश्रा खुश था कि सब नार्मल है, उसे गिल्टी फील करने की ज़रुरत नहीं।
और संडे को सब लोग तय समय पर बरिस्ता पहुंचे। शरद के साथ वाकई एक हैंडसम लड़का आया था। मालती के कलेजे को ठंडक मिली। अब वक़्त था सोने के पिंजरे में रह रहे लोगों को आइना दिखाने का।
हैंडसम लड़के पर से मालती की नज़र  नहीं हट रही थी ! लड़का थोड़ा झेंप गया। फिर उसका कोई कॉल गया तो दूर जाके बात करने लगा।  मालती का दिल डूब गया , कहीं इसकी कोई गर्लफ्रेंड तो नहीं !
शरद ने इशारे से मालती को दरवाजे के पास बुलाया। शायद अपना प्लान बताना चाह रहा था।
और इस तरह, बरिस्ता के उस कॉफ़ी हाउस मेंमिश्रा और नैना बैठे हुए थे , उसी टेबल पे , आमने सामने।
और शायद इसी पल का इंतज़ार कर रहा था मिश्रा , क्योंकि अब उसके हाथ में कुछ था। एक प्यारी सी अंगूठी।
"नैना, चिराग लेकर ढूंढने से भी तुम्हें मेरे जैसा गधा इंसान नहीं मिलेगा, जानती हो ?"
"क्या???"
"अब इस गधे की डोर  तुम्हारे हाथ में है। करोगी इस नालायक नामुराद नासमझ गधे से शादी ?"
नैना को कुछ समझ  नहीं रहा था।  सर घुमाके देखा तो बाकी लोग नदारद थे।
"वो सब बाहर हैं, मैंने भगाया हुआ है ! "
"पर हम लोग तो कानपुर वाली लड़की की  ट्रीट खाने यहां आये थे!!"
"तुम अपनी बात पक्की होने का झूठ बोल सकती हो, मैं नहीं बोल सकता ? मैं तो कानपुर गया ही तुम्हारी बात करने था। इतनी तारीफ़ करी तुम्हारी कि पूरा कोटा उधर ही ख़त्म हो गया ! "
"पर तुमको तो ये बताया  था कि मेरा रिश्ता पक्का हो गया है ? फिर? "
"फिर क्या ? हम तो तुम्हारा रिश्ता तुड़वाके तुमसे शादी करने का आशीर्वाद लेने गए थे , जिस रिश्ते से हमारी नैना खुश ही दिखें वो हम होने देते? वो तो अच्छा हुआ तुमने खुद ही इतनी मेहनत से बचा लिया !"
नैना  को कुछ तो समझ नहीं रहा था या विश्वास नहीं हो रहा था।  मिश्रा को क्या समझा था और वो क्या निकला!
कॉफ़ी शॉप के बाहर बाकी लोग हाथ बांधे और दिल थामे इंतज़ार कर रहे थे।  जाने आज ट्रीट मिलेगी भी या नहीं।
नैना ने इशारे से उनको अंदर बुला लिया।  उनकी मौजूदगी में मिश्रा ने सबत्तीसी अंगूठी नैना को पहना दी।
"ये तुम रो काहे रही हो मालती?  इसी को ख़ुशी के आंसू बोलते हैं मिश्रा? " शरद सर खुजा रहा था।

7 टिप्‍पणियां:

Rangraj Iyengar ने कहा…

वर्,ा जी,

बहुत बहुत बधाई इतनी सुंदर कहीानी पढ़ाने के लिए.

varsha ने कहा…

Shukriya :)

संजय भास्‍कर ने कहा…

सुंदर कहीानी सुंदर कहानी पढ़वाने के बहुत बहुत आभार आपका वर्षा जी देरी से पढ़ पाया

varsha ने कहा…

Shukriya sanjay ji!

Deepak Sachdeva ने कहा…

Touching Story .... Thanks

deepak ने कहा…

Nice Story

varsha ने कहा…

Thanks!