गुरुवार, 20 नवंबर 2014

हाथी की सवारी


''हाथी की सवारी?"
'' हाँ, सब लोग तो कर रहे हैं। करवा लो इसको भी। ''
''पर मम्मीजी , अभी?  ''
''और क्या।  कहते हैं हाथी पर बैठने से राजगद्दी  मिलती है। ''

हम्म, तो राजगद्दी के लिए हाथी की सवारी ! बेटे को राजा महाराजा बनाने का सपना मैंने तो नहीं देखा था। जो बनाना था उसकी मेहनत के दम पर, और राजा महाराजा तो कभी नहीं!

और सबसे बड़ी बात, हाथी पर बैठने के नाम से ही पसीने छूट जाते थे। पिछली बार इसके पापा साथ में थे तो घोड़े की सवारी करवा दी थी बेटे को , मैं तो दूर से रिकॉर्डिंग कर रही थी।  सोच भी नहीं सकती थी उस पर बैठने के बारे में ! बाप बेटे दोनों बड़े खुश थे वापस लौटकर , और मैं भी!

तो यही मेरा प्लान था।  जितने भी एडवेंचरस काम थे वो पापा को सिखाने थे , बाकी सब मुझे सम्भालना था।  पर यहां तो दिक्कत ये थी कि पापा ही नदारद थे।  और हाथी सामने खड़ा था , एक अवसर की तरह जिसके  जल्द दुबारा मिलने की कोई गारंटी नहीं थी थी ! कन्फ्यूज्ड हो गयी मैं।  और  मम्मीजी ने राजगद्दी वाला उदाहरण फिर दिया  तो मेरा कन्फ्यूज़न जाता रहा।  नहीं बनाना मुझे इसको राजा यार , देखी जायेगी ! कहीं हाथी ज़रुरत से ज्यादा हिल डुल गया तो भावी राजा की मम्मी तो वहीं ढेर हो जायेगी ! ये ट्रिप ठीक ठाक निकल जाए, हाथी तो मिलते रहेंगे।  नहीं भी मिले तो क्या !

और मैंने बगलें झाँकते हुए मुद्दे को टाल दिया।  मम्मीजी ने कोशिश तो काफी की थी पोते को  राजगद्दी दिलाने की पर फिलहाल उनकी डरपोक बहू हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।

पर मम्मीजी की उदासी देखके मुझसे रहा नहीं गया।  मैंने हौले से बेटे से  पूछा , बैठना है आपको बेटा ? वो भी उतना ही कन्फ्यूज्ड लग रहा था,  बोला आप बैठोगे तभी बैठूंगा।  उसने भी मम्मा दादी की बातें सुन ली थीं !

तो ये बड़ी विषम परिस्थिति हो गयी थी।  दादी, बुआ, चाचा सब  थे, पर बैठना उसको मेरे ही साथ था।  फिर तो हो गया, माँ बेटा दोनों पहली बार बैठेंगे, कौन किसको संभालेगा! बुआ और चाचा भी अगर साथ बैठते तो भी हाथी का डर जाता नहीं था। क्या भरोसा , संभाल पाएं कि  नहीं।

इसी उधेड़बुन में मैं आगे बढ़ने लगी , सोचा हाथी पीछे छूट जायेगा तो कन्फ्यूजन भी जाता रहेगा।  बाकी लोग भी चुपचाप मेरे पीछे हो लिए। दादी के अलावा किसी को ख़ास इंट्रेस्ट भी नहीं था , सब थके हुए थे।  पूरा राजा का महल घूम आये थे , हाथी के दर्शन से पहले।

बेटा मेरा हाथ पकड़कर चल रहा था। मुड़ मुड़कर हाथी को देख रहा था।  दो हाथी थे , एक एक करके राउंड  लगा रहे थे।  जब एक राउंड पर रहता तो दूसरा गन्ना खाता।

बेटा थोड़ा शांत हो गया था।  समझ गया था शायद।  इससे पहले तो  सवालों के ढेर लगा देता था , मम्मा हाथी क्या खा रहा ? क्यों खा रहा ? ऐसा क्यों, वैसा क्यों ?

 और फिर थोड़ी देर में अपनी चुप्पी तोड़ते हुए उसने पूछा, मम्मा हम लोग हाथी पे क्यों नहीं बैठ रहे ?

इस सवाल ने मुझे निरुत्तर कर दिया था। बेटा मेरे साथ हाथी पर बैठना चाहता था।  पापा वाला ऑप्शन भी नहीं था।  हाथी ट्रेन्ड थे , डर वाली कोई  बात नहीं थी।  क्या मैं अपने बेटे को दुखी कर सकती थी ?

अपने डर के बारे मैं मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता था। हाथी जितनी ऊंचाई वाले निर्जीव ट्रांसफार्मर  जो मेरे स्विचयार्ड में रहते थे , जिनके हिलने डुलने या मुझे गिरा देने का कोई डर नहीं था ,  उनपर तो मैं नहीं चढ़ पाती थी।  एक बार शटडाउन के दौरान कोशिश की थी चढ़ने की , जब बाकी लोगों को देखा उसपर चढ़ चढ़ कर इंस्पेक्शन करते हुए। पर आधी सीढ़ी से उतर आई ! कहीं ऊपर जाके चक्कर आ गया तो यहां खड़े लोग तो समझ ही नहीं पाएंगे अब मैडम का क्या करें!

समस्याएं यूँ  भी हाथी जैसी पहाड़ सी ही तो होती थी , और उनका समाधान भी उनपर चढ़कर ही निकलता  था। पर साक्षात हाथी ही आ जाए तो ?
फिर मैंने कुछ सोचा , और ननद के साथ खुसपुस की।  उसने सर हिलाया।  थोड़ी देर में वो टिकट काउंटर में खड़ी थी। हम लोग हाथी पर बैठ रहे थे! चाचा को फोटो खींचने के लिए नीचे छोड़ दिया था। मैं बेटा और बुआ, तीन जन का टिकट करवा लिया।

मम्मीजी ने पहले ही समझा दिया था कि बेटा चप्पल पहनके मत चढ़ जाना गणेश जी का रूप होते हैं।  ऊपर मंच पर चढ़कर हाथी वाहक ने भी उतरवा दिए। हाथी गन्ना खाकर तैयार था, मंच के सामने। पहले मैं चढ़ी, फिर बेटे को लिया और फिर बुआ चढ़ी। डरते डरते बैठ गयी। बहुत इत्मीनान से चल रहा था हाथी , पर उतने में ही मेरी हालत खराब थी। बेटा खुश था , बुआ तटस्थ थी , चाचा फोटो खींच रहे थे। अच्छा लगने लगा था। लेकिन मन में ये डर बरकरार था कि अभी हाथी को कोई इंट्रेस्टिंग चीज दिख गयी या दूसरा हाथी उसके हिस्से का गन्ना खाने लगा तो ये कहीं दौड़ने न लगे। दिल थाम कर एन्जॉय  करने की कोशिश कर रही थी। दूर कहीं लोग ऊँट की सवारी कर रहे थे तो लग रहा था कहीं बेटे का अगला लक्ष्य ऊँट न हो, क्योंकि उसमें तो मैं बैठने से रही! आखिर जीवित घर लौटना भी था।

 नीचे बाकी पर्यटक हमें देखकर फोटो ले रहे थे , बाय बाय कर रहे थे। मज़ा आ रहा था।  आखिरकार एक चक्कर पूरा हुआ। हाथी मंच की तरफ वापस चल पड़ा।  बीच में गन्ना पड़ा था तो उस तरफ चल दिया था पर मालिक ने लगाम कसी और वापस लाइन में ले आया। इतने में ही मैं चिल्लाने को तैयार थी।

वापस आये , और फोटोज देखी चाचा के कैमरे में। बेटे की ख़ुशी उसके मुँह पर झलक रही थी। हाथी की सवारी से पता नहीं उसको राजगद्दी मिले न मिले , पर मुझे सुकून ज़रूर मिल गया था।