शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

तसव्वुर के तोते


''यार बड़ी गजब है तूलिका तो । कुछ भी करा लो उससे। ''
''हाँ यार बहुत लोड देती है। उसके तो आस पास रहना मुश्किल है। वाइवा के सबरे मार्क्स तो वही ले जायेगी। अपन तो एक दूसरे की शकल देखते रह जायेंगे।  ''

रश्मि चाय में पत्ती डाल  रही थी और उन दोनों का तूलिका बखान सुन रही थी। तूलिका ये तूलिका वो। चाय कप में उड़ेलकर उसने दोनों को शांत करवाया।

''अच्छे से बताओ क्या हुआ , ऐसे खिचड़ी मत पकाओ। ''

सोनाक्षी  ने चाय की चुस्की ली और बिस्तार से पूरा किस्सा बयान करना शुरू किया। कैसे वो लोग एस एम के नोट्स लेने उसके पीजी वाले रूम गए थे जहां सीनियर्स आये थे उन लोगों का इंट्रो लेने। और कैसे तूलिका ने अपनी विभिन्न कलाओं से उन्हें ऐसा प्रभावित किया कि उन्हें रूम में बाकी लडकियां नज़र ही नहीं आई।

यूं तो अपनी स्मिता और सोनाक्षी कोई छोटी मोटी  तोप नहीं थे , कॉलेज के पहले सेमेस्टर  से ही लड़के इनसे बात करने के मौके तलाशते रहते थे और हम शाम रश्मि को उनके कान में फूंक मारकर ''आई वांट टू  मेक फ्रेंड सीप विद  यू '' का सीप साफ़ करना पड़ता था। हर रोज़ पता नहीं कितने इनके नाम के मुरझाये फूल लेक्चर हॉल टू में अंतिम सांस लेते थे। लेकिन ये दोनों मैडम नोट्स और असाइनमेंट सबमिशन के टॉपिक के अलावा और कोई ऊल जलूल बात किसी से करती नहीं थीं। इन दोनों की एक ही कमजोरी थी , क्लास का टॉपर।  उससे ये दोनों बड़ी प्रभावित रहती थीं और जा जा के बात भी करती थीं। टोपर बाद में खुद को चिंगोटी काटता था।

एक और मज़ेदार बात थी इनसे  जुडी। स्मिता सीबीएसई बोर्ड से पढ़ी थी और सोनाक्षी स्टेट बोर्ड से , तो इसलिए लड़के लोग भी उसी बैकग्राउंड के हिसाब से इनके पीछे पड़ा करते थे।  एक बार एक स्टेट बोर्ड वाला लड़का इनके पीछे हाँफते हुए आया और हिम्मत करके इन्हें रोककर पूछा। ''आप दोनों में से सोनाक्षी कौन है ?'' सोनाक्षी ने बताया कि मैं हूँ तो लड़का बोला ''सोनाक्षी जी  आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं क्या आप मुझसे फ्रेंडसीप करेंगी ?''

हँसते हँसते दोनों का पेट दर्द हो गया था , और रूम पर रश्मि का भी..... 'मतलब बन्दे को सोनाक्षी बहुत पसंद है फ्रेंडशिप भी करना चाहता है पर उसे मालूम नहीं कि सोनाक्षी है कौन! हा हा हा हा!''

और ऐसे ही हँसते खेलते दिन निकल रहे थे कि तूलिका नाम का साया इनके लेक्चर हॉल टू में मंडराने लगा। तूलिका एक मिस्टीरियस बंदी थी , हर किसी की पहुँच  से बाहर।  बात करती तो लगता शायरियाँ झड़ रही हैं ,  किस्से सुनाना शुरू करती तो लगता जॉन अब्राहम इसी का पडोसी है और बिपाशा ने तो इससे जलना भी शुरू कर दिया है। इस तरह एक एनिग्मा से घिरी तूलिका  ने धीरे धीरे प्रोफेसर से लेकर टॉपर तक को प्रभावित करना शुरू कर दिया।  तूलिका की फैन फॉलोइंग मास में नहीं क्लास में होती थी, और बाकी सारे बन्दे उसे मुंह खोलकर देखते और मिस्ट्री समझने की कोशिश करते रहते। औसतन एक सेमेस्टर में एक बन्दे को सेंटी करने का इंटरनल टारगेट रखा था उसने, चाँद बादल बारिश और अपनी शायरियां झाड़कर। सुनने में आता था कि तूलिका बादल घिरते हैं तो खिड़की पर एकटक बैठकर शायरियां लिखती है और जब सावन बरसता  है तो वो नन्हे बच्चों की तरह बाहर जाकर भीगती है, पगला जाती है।

रश्मि से अपनी रूममेट्स का दुःख देखा नहीं जाता था।   उसके मन में भी इच्छा जागी कि ज़रा देखें तो इस बंदी को। रश्मि भी कविताएं वगैरह लिख लेती थी पर वो वीर रस  की होती थीं और उनसे किसी लड़के को सेंटी नहीं किया जा सकता था। पर इससे रश्मि की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता था।  जब मुझे हिंदी ज्यादा आती है और उर्दू कम तो मैं और क्या कर सकती हूँ।

उस दिन वो तीनों तूलिका के रूम पर गए।  वहाँ कुछ एलीट क्लास के दो बन्दे पहले से बैठे थे जिनमें से एक वर्तमान सेमेस्टर का बकरा था। वो तीनों एक खाली बिस्तर पर बैठ गए।  तूलिका ने जैसे समा बाँध लिया था , अपने किस्से कहानियों से, अपने अतीत को झीने परदे से कुछ दिखाते कुछ छुपाते रहस्यों से।  रश्मि को छोड़कर सब लोग सम्मोहन में थे।  तब उसे बिस्तर पर बेतरतीब पडी एक नोटबुक दिखी।  वो नोटबुक ही थी, डायरी नहीं , ये बात उसे सोनाक्षी ने बतायी थी।  रश्मि को याद आया कि जब सोनाक्षी लोग पहले आये थे तो उन्हें भी ये ऐसे ही बेतरतीब पड़ी मिली थी , मतलब ये एक ''स्ट्रेटेजिक '' तरीका है बेतरतीबी से नोटबुक रखने का। लोग आएं, जिज्ञासावश उसे देखें, और एक बार खोल लें तो फिर तो....

खैर, वो मैकेनिकल की मंडली थी और रश्मि सिविल की , इसलिए बोरियत से बचने के लिए उसने नोटबुक उठा ली। हर पन्ने में कोई रहस्य गहराता जाता था , मय्यत पे मत  आना , बेजान जिस्म हूँ मैं, वगैरह वगैरह।  ऐसा लगता था मानो कितने दुःख देखे हैं उसने और फिर भी मुस्कुराती रहती है। आगे क्या लिखा था… हाँ तसव्वुर में मेरे रहती है वो शामें … तसव्वुर तो लकी अली के गाने में भी था....  तसव्वुर में हैं किसकी परछाइयाँ… वाह वाह उसे इस शब्द का मतलब भी नहीं पता और तूलिका ने इसको लेके शायरी भी लिख डाली ! कितने दिनों से वो सोच रही थी अपने स्कूल की दोस्त रशीदा से पूछेगी इसका मतलब। 

''तूलिका यार तू हंसना मत। ''
''बोल न। ''
''यार ये तसव्वुर क्या होता है ?'' रश्मि ने बड़ी हिम्मत करके पूछा था। अपनी संभावित जगहंसाई को ताक  पर रखकर।
''अम्म…… इट्स एक्चुअली यू नो...  हाउ डू आई एक्सप्लेन… इट्स लाइक.... "

अब तक स्मिता की हंसी छूट चुकी थी ''तुझे नहीं पता न इसका मतलब !''
तूलिका पूरे जोर शोर से  खुद का बचाव कर रही थी पर हमारी देसी लड़कियों को उसकी दुखती रग मिल गयी थी और वो उसपर डंडे से प्रहार कर रही थीं।
''तुझे तसव्वुर का मतलब नहीं पता और तूने उस पर शायरी भी लिख डाली। हा हा हा। ''
तूलिका की हालत खराब थी ।   ''ओह आई  डोंट नो हाउ इट गॉट  देअर इट्स माय पर्सनल डायरी यू नो… ''
''ओहो पर्सनल है, सॉरी सॉरी इसको कहीं छुपा के  रख देना हाँ ?''
''हाँ भूलकर  भी किसी के तसव्वुर में मत आने देना इसको !'' दोनों ताली दे दे कर उसके मज़े ले रहे थे, और रश्मि सोच रही थी, आज रात चैन की नींद आएगी।


गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

हैं हैं ठीकाछे


मैडम एक बात पूछेगा आपसे, आप बुरा तो नहीं मानेगा ?''
''पूछिए फिर देखते हैं !''
''आपको इधर बंगाल में आये कितना बोचोर हो गया ?''
''छह साल हो गया। ''
''तो आप की थोड़ा थोड़ा बांग्ला सीखा है ? अभी देखता है आप हिंदी में ही बात करता है। ''
''हाँ सीखा तो है।  अमी  बांग्ला बोलते पाड़ी । ''
''कहाँ, छह साल से तो हम यही एकटो  लाइन सुनता है।  अरे पूरा डिपार्टमेंट हिंदी सीख गया आपको बांग्ला सिखाने के चक्कर में। ''
''अरे पिनाकी जी , तीन चार साल तो कॉलेज के वक़्त की सीखी गुजराती  को भुलाने में लग गए। बोलना चाहते थे बंगाली और निकलती थी गुजराती। ''
''अरे मैडम हमारा लरका सिर्फ तीन साल से चेन्नई में है इनफ़ोसिस में, वो तो खूब भालो मद्रासी बोलता है अभी । अपना अपना शौक है मैडम , किसी को सीखना अच्छा लगता है किसी को नहीं। ''

नंदिता ने बगलें झांकनी शुरू कर दी। पिनाकी बाबू आज क्लास लेने के चक्कर में थे।

आज दुर्गा सप्तमी थी।  वैसे भी स्टाफ का  कभी काम करने को लेकर ख़ास मूड नहीं रहता था और अभी तो दुर्गा पूजा का वक़्त था। इमरजेंसी काम छोड़कर उनको कोई सीट से हिला नहीं सकता था। ऐसे में पिनाकी बाबू आ गए थे नंदिता को पकाने के लिए , शुभो पूजो के बहाने।

ऐसा नहीं था कि नंदिता को बांग्ला सीखने का शौक नहीं था। कॉलेज मैं उसकी एक रूममेट बंगाली भी थी , जो पूरे तन मन धन से बंगाल का प्रतिनिधित्व करती थी।  वही हथिनी जैसी चाल  , वही सुस्ताई सी आँखें, रसगुल्ले जैसे गाल, माछ भात के विटामिन ई  से दमकती त्वचा।  किसी काम को करने की कोई हड़बड़ी नहीं।  और खान पान के लिए भले पैसे कम  पड़  जाएँ , पार्लर के लिए कोई समझौता नहीं। आइना तकिये के नीचे रखकर सोती थी मोमिता जी , कि सुबह उठते ही अपनी शकल सुधार ले इससे पहले कि कोई उसके अनधुले प्राकृतिक रूप को देख ले ।

तो वहीं से नंदिता को बंगाल की पहली झलक मिली थी।  और थोड़ी इच्छा भी जागृत हुई थी , बंगाली सीखने के लिए।  पर मोमिता  मैडम जो अधिकाँश अपने घरवालों से फ़ोन पर  ''हैं हैं ठीक आछे'' कहती सुनाई देती थी उसने इस राज का पर्दाफाश कर दिया था कि उसे ''हैं हैं ठीक आछे '' से ज्यादा बांग्ला आती ही नहीं थी  , वो तो सिक्किम में पली बढ़ी थी !  तो इस तरह नंदिता का बंगाली सीखने का सपना अधूरा रह गया।  लेकिन मोमिता  के  सानिध्य में उसने और बहुत कुछ सीख लिया।  माछेर झोल , दुर्गा पूजा की धूम, विष्णुपुरी साड़ियाँ, रबिन्द्र संगीत वगैरह वगैरह।

और इसके अलावा कुछ छोटी छोटी बातें , जैसे अगर मोमिता को अगर बाहर कैंटीन  में चाय पिलाने ले जाना होता था तो एक घंटे का नोटिस देना पड़ता था , दूसरी तरफ  बगल वाले रूम की नैना और सुरभि दुपट्टा ड़ालकर वैसे ही चल  देते थे।  जब उनकी दूसरी चाय ख़त्म हो  रही होती थी  तो दूर कहीं से मोमिता  आती दिखती थी , सलीके  की चादर और नज़ाकत  का स्कार्फ़ ओढ़े। नंदिता के  मन में ये लाइन  चलने लगती थी.…एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा।

एक ख़ुमारी सी रहती थी उसके आस पास। और इस ख़ुमारी के ख़ुमार में कुमार भैया सर तक डूब चुके थे , वो भी अंतिम सेमेस्टर में। सलीके और नज़ाकत के कद्रदान आखिरकार मिल चुके थे। दोनों मिलकर एक दूसरे  में मशगूल रहते थे , और बाकी लड़कियां राहत की सांस लेकर दिन भर के काम निपटा लेती  थीं।

जब कुमार भैया का आखिरी सेमेस्टर पूरा हुआ और वो दोनों बिछड़ गए तो मोमिता बाज़ार से जगजीत सिंह का ''कोई  फ़रियाद '' कलेक्शन ले आई और खाने पीने और सोने के अलावा बाकी वक़्त उसमें डूब गयी।  नंदिता से रहा न गया तो अपनी तंग जेब से पैसे निकालकर इयरप्लग ले आई उसके लिए।
उस समय नया नया मोबाइल चला था, नोकिया का।  मोमिता पहली लड़की थी उसे लेने वाली।  उधर कुमार भैया को भी जबरदस्ती खरीदवा दिया था।  और फिर जब एयरटेल की फ्री एसएमएस वाली स्कीम लांच हुई तो कुमार भैया ने शुरू शुरू में उसके ''खाना खाया ? ब्रश किया? ''  प्रश्नों के  उत्तर मिस यू जोड़कर दिए पर
धीरे धीरे वक़्त के तकाजे के साथ मोमिता का मोबाइल खामोशी में डूबता चला गया।  और तब नंदिता और उसके पडोसी रूममेट्स के सामने उसे ज़िंदा रखने का चैलेंज आ गया।  उसके आंसू और जगजीत सिंह की ग़ज़लें थमने का नाम नहीं लेती थी और सेमेस्टर की परीक्षाएं सर पर थीं।  ऐसे में तीनों ने एक प्लान बनाया।

उनके पूरे बैच की लिस्ट निकालके एक काबिल मुर्गा ढूँढा गया और उसे जाल में फंसाया गया। उन दिनों लड़कों के लड़कियों को लेकर ज्यादा क्राइटेरिया नहीं होते थे।  बस वो लड़की हो इतना काफी होता था।  और इस तरह विकास को मोमिता को संभालने की ज़िम्मेदारी यह कहकर सौंप दी गयी इससे अच्छी लड़की तुझे क्या मिलेगी इसके कान में दो  दिन के अंदर गोविंदा के गाने बजने चाहिए।

विकास ने ज़िम्मेदारी बखूबी निभायी।  मोमिता ने अपने धूल खाते आईने को साफ़ किया और तकिये ने नीचे रख दिया। लड़कियों ने राहत की साँस ली।


पढाई लिखाई ख़त्म हुई , दुनिया भर के टेस्ट्स दिए और एक दो जगह नंदिता ने क्लिक भी कर लिया। आल इंडिया लेवल था , भारत के किसी भी कोने में पटका जा सकता था।  और पटका गया बंगाल में।  नंदिता वैसे ही घुमक्कड़ प्रकार की थी, घर से जितने दूर पोस्टिंग मिलती उतनी रोमांचित हो जाती।  पर अभी उसने बंगाल का पानी नहीं पिया था।

और सब्र के जैसे बाँध उसने मोमिता के साथ रहकर तोड़े थे उससे कहीं ऊंचे और मज़बूत बाँध यहाँ आकर उससे तुड़वाये गए।  और बदले में उसने बंगालियों के सब्र के बाँध तोड़ दिए बांग्ला बोलने में।  ये उनके लिए एक चैलेंज की बात हो गयी थी नंदिता मैडम से बांग्ला बुलवाना ।  और सब एक एक करके फेल होते जा रहे थे। वो लोग ज़रूर खूब भालो हिंदी सीख लिए थे। ऑफिस का चपरासी भी ''मैडम चाय  खायेगा ? '' वाली हिंदी फ्लॉन्ट करने लगा था।

खैर , पिनाकी बाबू मैडम को पूजो की बधाई देकर रूम से बाहर निकलने लगे। इधर नंदिता मैडम का फ़ोन बजने लगा। दो तीन घंटियों बाद नंदिता ने फ़ोन उठाया।

''की बोल्छो तुमि ? कालके छुट्टी नेबे ? ....... ना बाबा कालके होबे ना कोनो रोकोम  …… कालके ऐशो, रोब्बारे निए नो.....ना होले तोमार मे के पाठी देबे कालके ठीकाछे ? ''

नंदिता मैडम कामवाली को कुछ समझा रही थी और पिनाकी बाबू दरवाजे पर खड़े सर खुजा रहे थे।