सोमवार, 8 सितंबर 2014

क्या बनोगे बुटरू




अलसायी सी सुबह थी। शुभा ने खिड़की से पर्दा हटाया तो रिमझिम फुहार में धुली हुई गार्डन की हरियाली से आँखें चौंधिया गयी। पर अभी ये सब निहारने का वक़्त नहीं था ।  नहा धोकर नाश्ता तैयार  करना था। रविवार का दिन घडी के कांटे पर सवार होकर आता  था , जिसमें हफ्ते भर की अस्तव्यस्तता को सहेजना भी होता था , बोरिंग दलिया से हटके  कुछ स्वादिष्ट नाश्ता भी तैयार करना होता था , और परिवार के साथ क्वालिटी टाइम भी बिताना होता था । आज का मेनू था गर्मागर्म पोहा और बुटरु  के मनपसंद फिंगर चिप्स।  ओफ्फो फिर भूल गयी ! बुटरू  नहीं, अच्छा खासा नाम है उसका, आरव ! कितनी बार पियूष उसे डाँट चुके थे इस बात पर, अब बेटा  बड़ा हो रहा है, कम से कम नाम तो अच्छा पुकारो कि  दोस्तों के सामने खिल्ली न उड़ जाए। एक बार गलत नाम उनकी ज़बान पे चढ़ गया तो फिर अपने बस से बाहर। पर शुभा को तो अपने चार साल के बेटे के लटके हुए गोल गोल गाल दीखते थे और जेहन से एक ही आवाज़ आती थी ,  बुटरू।

नाश्ता तैयार  था,  पियूष भी हफ्ते भर की सब्ज़ी लेकर मंडी से लौट चुके थे। आरव अपने कुछ पसंदीदा खिलौनों के साथ व्यस्त था। फिंगर चिप्स के लालच में दौड़ा चला आया।  शुभा ने भी चालाकी दिखाते हुए फिंगर चिप्स को पोहे के साथ मिला दिया। जितना पोहा उनमें चिपक जाएगा उतना तो कम से कम बुटरू के , ओफ़्फ़ो आरव के पेट में जाएगा।

घड़ी का काँटा बढ़ता जाता था और शुभा के माथे की शिकन भी।  एक एक पल कितना कीमती था । सप्ताह के बाकी दिन  तो मीना और राधा के भरोसे पूरा घर होता था। एक खाना पकाकर जाती , दूसरी घर का बाकी काम करने के साथ आरव को स्कूल बस से उतारकर खाना खिलाकर सुलाती थी।  रविवार को इस मशीनी ज़िन्दगी को ब्रेक मिलता था।

खैर, लगभग सब काम हो चुका  था।  वाशिंग मशीन चला दी थी, एक घंटे का टाइम सेट करके। अब उसके पास कुछ वक़्त था , आरव के साथ बिताने के लिए। पूरे हफ्ते दिनभर  माँ से दूर रहने वाला बच्चा रविवार को माँ को एक सेकंड के लिए नहीं छोड़ता था। नाश्ता करके वे दोनों आरव के रूम में चले गए। पियूष अखबार का पुलिंदा लेकर बाहर बरामदे में बैठ गए ।  शुभा ने अलमारी से एक ब्लैंक कलर बुक और क्रेयॉन निकाल लिए। कुछ हफ़्तों से यही रूटीन चला आ रहा था, वे दोनों पहले रंगों की दुनिया में डूबकर कुछ नए नक़्शे  ईजाद करते, फिर बुटरू के पसंदीदा खिलौनों से खेलते। मन के अंदर शुभा बेख़ौफ़ उसे बुटरू पुकारती थी, आखिर पियूष मन के अंदर तो नहीं झाँक सकते थे न।

शुभा उसे कुछ कुछ बनाकर दे देती और  बुटरू उनकी नक़ल करता रहता, और बीच बीच में बुटरू के हाथ कुछ इस तरह कलर बुक पर चलते जैसे रेत पर लहरें कुछ आकृतियाँ बना जाती हों।  ये देखकर शुभा  को लगता  कि शायद आगे जाकर बुटरू बड़ा आर्टिस्ट बनेगा, लेकिन फिर थोड़ी देर में वो बोर हो जाता और फिर उसके खिलौनों का पिटारा निकलता। दुनिया भर की कार , ट्रक, बस आदि एक लाइन से खिड़की में सज जाते। फिर कभी कार बस को ओवरटेक करती कभी ट्रक का पहिया गढ्ढे में फंस जाता। कभी टोल प्लाजा आ जाता और बुटरू हाथ बढ़ाकर किसी अदृश्य इंसान को अदृश्य पैसे   दे रहा होता। कभी किसी कार का पेट्रोल खत्म हो जाता और बुटरू उसे किसी पेट्रोल पंप में ले जाकर खड़ा कर देता। पियूष उन्हें अक्सर लॉन्ग ड्राइव पर ले जाते थे और वहीं से बुटरू ये सब सीखा था। ये सब देखकर शुभा को लगने लगता कि शायद आगे जाकर बुटरू को असली की कार रेसिंग में मज़ा आने लगे ,  लेकिन उस तरह का करियर तो दूर दूर तक किसी ने नहीं बनाया था, कार  रेसिंग में। तो फिर , शायद उसे कार के पुर्ज़ों में रूचि हो  जाए।  फिर तो उसे मैकेनिकल इंजीनियर बनाना ठीक रहेगा। हाँ अब सही पकड़ में आया , बुटरू को किस लाइन में डालना है।

शुभा ने बुटरू की और देखा, वो एक कार को ट्रक से ओवरटेक करवाने में मशगूल था।  शुभा ने हौले से पूछा , बेटा आप मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहते हो ? बुटरू  ने हैरत से उसे देखा, क्या  मम्मा क्या बनना चाहता ? शुभा ने फिर दोहराया, और इस बार बुटरू ने पकड़ लिया , ''हाँ मम्मा मैं मेककलएनेर बन सकता ।  ये अच्छा आईडिया है।  '' पता नहीं टीवी से या कहाँ से बुटरू ने हर बात के पीछे ''ये अच्छा आईडिया है'' बोलना सीख लिया था।

शुभा जानबूझकर बुटरू से ऐसे सवाल करती जिनका मतलब ही उसे पता न होता।  और फिर उसके नन्हे होठों से गोल गोल गालों के बीच गुजरती हुई और बड़ी बड़ी आँखों से सहमति देती हुई जो बातें निकलती उनसे शुभा का ह्रदय गद्गद  हो जाता।

फिर उसे याद आया, उसने तो और भी सपने  देखे थे बुटरू के लिए।  वो दोनों मिलकर वर्ल्ड टूर पर जाने वाले थे , नयी भाषाएँ , नए व्यंजन , नए  तरीके सीखने वाले थे।  पियूष के काम के प्रेशर को  देखकर लगता नहीं था कि उसे उनके सपनों में जगह मिलेगी ।

शुभा ने तो अभी से स्वैच्छिक सेवानिवृति का प्लान बना दिया  था, आखिर क्या करेंगे ज्यादा  पैसे कमाकर , बस बुटरू की पढ़ाई लिखाई हो जाए , अपने पैरों पर खड़ा हो जाए।  पर यहीं पर शुभा की गाडी अटक जाती थी, बुटरू को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाए ,  अब तक तो ऐसा कोई रुझान नहीं दिख पाया , थोड़ा थोड़ा सब कुछ एन्जॉय कर लेता था। पियूष शुभा की इस चिंता को सुनकर हंस देते थे, कहते थे चार साल के बच्चे की जान लोगी क्या? कुछ न कुछ कर ही लेगा , माँ बाप दोनों काबिल हैं, कुछ तो गुण आएँगे।

लेकिन शुभा उसे काबिल बनाने के लिए पढ़ाई की भट्टी में नहीं झोंकना चाहती थी , उसके  मासूम बचपन के दिन, किशोरावस्था के पंख लगाकर उड़ने के दिन , नए नए प्रयोग करने के , खुले आसमान को पतंगों से नापने के , साइकिल से नयी राहें तलाशने  के दिन , कहाँ से मिल पाएंगे ये दिन अगर सब लोगों की तरह उसे भी भविष्य की तैयारी के लिए अभी से ट्यूशन , कोचिंग वगैरह की भट्टी में झोंक दिया जाए।  शुभा और पियूष भी तो ऐसी ही भट्टी की तपी हुई ईंटें थे।  आज भले ही दोनों समाज में अच्छी स्थिति में थे , स्थापित थे , पर ज़रा सा पीछे मुड़कर देखते ही उन्हें महसूस होता  था कि इस मुकाम को पाने के लिए क्या क्या जाने अनजाने छूटता चला गया।

वे दोनों  मध्यम वर्ग की उपज थे जिनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था। जब दुनिया को देखने जानने की समझ आई तो खुद को ट्यूशन और कोचिंग से घिरा पाया।  अपनी हॉबीज़ के लिए वक़्त देना तो दूर उन्हें पता करने का भी वक़्त नहीं मिल पाया। वक़्त तब दिया जब कॉलेज जाकर पता चला कि हॉबीज़ होना ज़रूरी है, एम बी ए के इंटरव्यू में पूछा जाता है।

पर बुटरू के लिए शुभा के पास दूसरे प्लान थे। वो दूसरों की तरह बुटरू को ''मिस मौरिस '' के पास सुन्दर लिखावट और अच्छी इंग्लिश के लिए नहीं भेज पाती थी । चार साल के बच्चे हैं, ये भी कोई ट्यूशन जाने की उम्र है ?अब क्या छठी कक्षा से आई आई टी की कोचिंग शुरू करवा देंगे?  यही सोच सोचकर शुभा जितना भी वक़्त मिलता  उसे खुद ही कहानियां सुना सुना कर पढ़ाती रहती थी , और बुटरू भी बड़ी बड़ी आँखों से मम्मा की बात सुनता रहता और मम्मा को भी अपनी कहानियां सुनाता रहता। हँसते खेलते वो दर्जनों बातें सीख जाता , एफिल टावर से लेके इंडिया गेट, पेंगुइन से लेकर पांडा , सब  कुछ तो शुभा उसे इंटरनेट पर दिखा दिखाकर याद करवा देती।  एक बार गलती से डबल्यू टी सी पर हमले वाली वीडियो दिखा दी थी , तब से पीछे पड़ गया था , मम्मा एरोप्लेन  में आग कैसे लग गयी , बिल्डिंग नीचे क्यों गिर गयी ? ये एक नुक्सान था इंटरनेट का , बहुत संभलकर वीडियो दिखाने पड़ते थे , वैसे भी आड़े तिरछे विज्ञापन फुदकते रहते थे स्क्रीन पर , बिकिनी बालाओं के, शॉपिंग वेबसाइट के, और बुटरू  तैयार रहता था क्लिक करने के लिए।


''मम्मा देखो बारिश आई छम छम छम !'' हलकी हलकी फुहार गिरने लगी थी और बुटरू खिड़की से बाहर हाथ निकालकर बूंदों को छूने की कोशिश कर रहा था।  शुभा को याद आया कि पियूष को इस मौसम में चाय पीने का मन कर रहा होगा , इसलिए वो उठकर जाने लगी।  बुटरू पीछे से चिल्लाया ''कहाँ जा रहे हो मम्मा ?''
''आपके लिए दूध और पापा मम्मा  के लिए चाय बनाने। ''

''हाँ ये अच्छा आईडिया है , चलो मैं भी आपकी हेल्प कर देता हूँ। ''बुटरू भी पीछे पीछे चल पड़ा। हैल्प करने में बड़ा मज़ा आता था उसे, फिर भले ही उससे कथित हैल्प लेने के लिए माँ बाप को तरीके इज़ाद करने पड़ते थे।  चाय बनाने में बुटरू का रोल था चायपत्ती और चीनी के डब्बे  मम्मा को पकड़ाना। और इसके लिए शुभा को उसे गोदी में उठाना पड़ता था !

किचन में बुटरू शुभा को डब्बा पकड़ा रहा था और शुभा सोच रही थी , बहुत मेहनत लगेगी और बहुत हिम्मत भी , लेकिन बुटरू  को वो रेस में दौड़ता चूहा नहीं बनाएगी। अच्छी शिक्षा देगी , संस्कार देगी , और अंत में पूछेगी ''क्या बनोगे बुटरू ?''