बुधवार, 13 अगस्त 2014

सफ़रनामा- १


ट्रेन स्टेशन छोड़ने को बेताब थी,  और मैं था कि  अभी दौड़ ही रहा था, शाहरुख़ खान की तरह।  अंततः जब ट्रेन  को पकड़ा और सीट पर पहुंचा तो काजोल तो नहीं पर कजरारे नैनों वाले  दास साहब मेरा बेसब्री से वेट करते नज़र आये। और इसकी वजह जानने में मुझे दो  मिनट ज्यादा वक़्त नहीं लगा। दास जी को बोलने की बीमारी थी और उन्हें दूर दूर तक बोगी में कोई शिकार नहीं दिख रहा था।   मेरे नोवेल पढ़ते हुए इत्मीनान से पसर कर सफर पूरा करने के ख्वाब चूर होते नज़र आने लगे।

दास साहब ने एक सिरे से मुझसे गप्पें मारनी शुरू की और  दूसरे सिरे से मैंने छटपटाना। लगभग पंद्रह मिनट बाद मैंने खुद को एक भयंकर मोदी बहस में संलिप्त पाया। मोदी बहस की ख़ास बात ये होती है कि ये आर या पार वाली बहस होती है, बन्दा या फिर मोदी का अंधभक्त होता है या फिर जानी दुश्मन, और इस विषय पर बहस करना स्वास्थय के लिए अधिक लाभदायक नहीं होता , इसलिए थोड़ी देर में मैं मोबाइल पर फेक कॉल करने लगा, मानो मेरी फ्लाइट डिले हो गयी हो और कोई इम्पोर्टेन्ट मीटिंग मिस होने वाली हो। दास साहब शिद्दत से मेरी कॉल पूरी होने का इंतज़ार कर रहे थे ताकि फिर से मुझे उस बहस में घसीटें , पर मैं सतर्क था। इतने में एक स्टेशन आ गया और मेरी नए सहयात्री के लिए पुकार भगवान ने सुन ली।  बल्कि कुछ ज्यादा ही सुन ली, क्योंकि नए पैसेंजर जो  अधेड़ उम्र के थे उनकी पत्नी दूसरी बोगी में थी और आते ही इन्होने दास साहब से सीट बदलवाने की गुजारिश  कर डाली, जो दास साहब ने इस उम्मीद में स्वीकार कर ली कि शायद दूसरी बोगी में कोई उनकी टक्कर का फुरसतिया मिल जाए।
उसके बाद मैंने एक सेकंड की भी देर न करते हुए अपना बैकपैक उठाया और ऊपर वाली बर्थ में चला गया , क्योंकि नए सहयात्री का  भी कोई भरोसा नहीं था कब शुरू हो जाएँ , ट्रैन यात्रा अच्छे अच्छों  को दार्शनिक बना देती है।
इस तरह बम्बई से दिल्ली की यात्रा गाने सुनते और नावेल पढ़ते निकल गयी। नीचे उतरा तो अंकल आंटी मुझे शिकायत की दृष्टि से देख रहे थे मानो मैंने अपने सहयात्री होने का धर्म अच्छे से नहीं निभाया। मैं अनजान बनकर बाहर निकल गया।  एक पड़ाव पार हो चुका  था। पर सफर अभी और लम्बा था।

पिछले तीन महीनों से बड़े भाईसाहब फेसबुक पर फोटोज डाल डाल कर सबको जला रहे थे।  उनकी पोस्टिंग एक दूर दराज के पहाड़ी गाँव में हुई थी जहां एक छोटे से प्राइमरी स्कूल को वो  और एक अन्य टीचर  मिलकर संभाल रहे थे।  गाँव बहुत ही सुन्दर लोकेशन  पर था , उसी की फ़ोटोज़ खींच खींचकर भाईसाहब हमको जलाते रहते थे। जब मुझसे रहा न गया तो मैंने बैग पैक किया और निकल पड़ा, भैया के सुकून में खलल डालने।  भाभीजी और तीन  साल का भतीजा मम्मी पापा के साथ गौचर में उस घर में रहते थे जो रिटायरमेंट के बाद पापा ने बनवाया था। भैया  का गाँव सुन्दर भर था , और कोई खूबी नहीं थी , न हॉस्पिटल , न प्ले स्कूल। इसीलिए अकेले वहाँ डले हुए थे। पर नसीब अच्छा था कि बीएसएनएल का सिग्नल मिल जाता था सो इंटरनेट चल जाता था, जिसका परिणाम होता था फेसबुक पर जलाने वाली तसवीरें।

 खैर, दिल्ली में मुझे एक रात गुजारनी थी और मैं बम्बई से जो सोचकर निकला था वो ये था कि टिंकू के साथ रुक जाऊँगा। पर दिल्ली पहुंचकर याद आया कि टिंकू तो अपने भैया भाभी के साथ रहता था और उसके दो छोटे छोटे भतीजे भी थे।  मतलब किसी दूकान में रूककर चॉकलेट लेनी पड़ेगी।  फिर याद आया, मिक्की भी तो रहता था नोएडा में, अकेला। वो सही रहेगा।  मैंने मिक्की को शार्ट नोटिस दिया और उसके रिस्पांस से ऐसा लग रहा था मानो ऑफिस में जम्प कर  रहा है।  होता है , ज़िन्दगी इतनी पकेली हो गयी है कि पुराने यार दोस्त मिलने से उछलने कूदने का ही मन करता है। मिक्की स्कूल में मेरा लंगोटिया यार था , उसके बाद ऑरकुट के जरिये संपर्क हुआ दो साल पहले। अब मिलना भी हो जाएगा।

देर रात तक बात करते रहे। गप्पें खत्म ही नहीं होती थीं।  पर मिक्की का फ़ोन हर दो मिनट में पिंग पिंग हो रहा था , मतलब दूसरे  छोर वाला बन्दा या बन्दी अमूमन रात के बारह बजे नियमित रूप से उसके कॉल का इंतज़ार करता था। पर क्योंकि अभी इस रिश्ते का कोई नाम नहीं पड़ा महसूस होता था इसलिए मैं जम्हाइयां लेते हुए उसे शुभ रात्रि कहकर सो गया।  उसका रिएक्शन था  शर्म मिश्रित  मुस्कराहट।

अगली सुबह मैंने दिल्ली से हरिद्वार की बस पकड़ी।  बस वैसे ऋषिकेश तक जाती थी पर मैंने हरिद्वार तक का ही टिकट लिया, क्योंकि बस वाला एकाध घंटा हरिद्वार में रूककर आगे की सवारी भरता था। 

(ये पोस्ट किसी और की कहानी मेरी ज़ुबानी है, इससे आगे लिखने का काम उसको करना है।  देखें कब तक करता है !)