सोमवार, 27 जनवरी 2014

राशि


राशि नाम था  उसका। और शौक था सबको राशिफल सुनाना।

 इसी साल अप्रैल में उसकी सगाई हुई थी अर्नब  के साथ। सगाई  क्या, पूरी दौड़भाग थी।  दोनों अलग अलग जात बिरादरी के थे, ऊपर से प्रांत  भी अलग। राशि गुजरात  से तो अर्नब बंगाल से।  प्रीमियर संस्थान से एम बी ए की पढाई कर  रहे थे , बड़ी मुश्किल से फाइनल की परीक्षा के बाद वक़्त निकाल पाये थे अपनी सगाई के लिए।  शादी की तारीख तो क्या वर्ष का कोई अता  पता नहीं था , दोनों को पहले अपने कैरियर पर ध्यान देना  था।  कैंपस सिलेक्शन तो हो गया था पर मंदी की मार अभी थमी नहीं थी।  कम से कम दो साल तो लगने ही थे कैरियर को ठीक ठाक आकार देने को। इसलिए सगाई करके रख दी थी।

उनका कॉलेज अहमदाबाद में था, और वहीं राशि का घर भी ।  पढ़ाई के दौरान अक्सर अर्नब सॅटॅलाइट रोड में राशि के घर जाया करता था , पहले क्लासमेट की हैसियत से, फिर दोस्त , फिर अच्छा दोस्त। राशि के माता पिता यूं तो जात बिरादरी में रिश्ता करने के पक्षधर थे, पर राशि के इतने बड़े कॉलेज में दाखिले के बाद उन्होंने किसी भी स्थिति का सामना करने का मन बना लिया था। आखिर उनकी बिरादरी में राशि के बराबर या उससे अच्छे लड़के तो मिलने से रहे। अब तो पूरा भारत उन्हें अपनी ही बिरादरी का लगता था। राशि के अनेक सहपाठी जो देश के कोने कोने से आये होते थे, अक्सर उसके घर आ जाया करते थे।  राशि का घर अहमदाबाद में होने के बावजूद उसे हॉस्टल में रहना पड़ता था , बीच बीच में वक़्त निकालके घर आती रहती थी।  पर नवरात्रि हो या उत्तरायण , राशि और उसके दुनिया भर के दोस्त उसके घर धमक जाते थे। आंटी के हाथ का ऊंधीयू और अंकल के साथ पतंगबाजी का मजा ही कुछ और था। कई लड़के तो सिर्फ राशि से एक साल छोटी बहन के दर्शन करने आते थे जो कॉलेज के साथ साथ मॉडलिंग में हाथ आजमा रही थी और अक्सर रैंप शोज में दिख जाती थी।

धीरे धीरे राशि के मम्मी पापा को समझ आ गया था कि बाकी दोस्तों में से अर्नब कुछ ख़ास है।  और फाइनल इयर आते आते दोनों ने अपने अपने घर बात कर ली। दोनों घरवालों को कोई ख़ास दिक्कत नहीं थी, सिवाय इसके कि रोज़ माछ भात खाने वाले अर्नब  के घरवालों के बीच शुद्ध शाकाहारी राशि कैसे  एडजस्ट कर पायेगी! अर्नब के पापा ने तो बड़ी मासूमियत से बोला था, ओरे बाबा फिश तो ''भेज''होता है, नॉनभेज तो मोटोन होता है !  राशि के पापा थोडा घबरा गए थे पर राशि ने इशारे से समझा दिया था।

 हालांकि अर्नब बारहवीं के बाद घर से दूर रहने के कारण अब तक घाट घाट का पानी पी चुका  था और उसकी ज़िन्दगी में और भी तरह के आहार जुड़ चुके थे, इसलिए ये कोई ख़ास चिंता की बात नहीं थी।

सगाई के बाद दोनों अपने अपने शहर चले गए।  अर्नब को मुम्बई की एक कंपनी में अच्छी खासी नौकरी मिली थी और राशि को बंगलौर में। दोनों को फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिखता था शादी करके एक साथ रहने का , बस मेहनत किये जाते थे, वही उनके हाथ में था।

एक साल गुजर गया , और ज़िन्दगी के अगले लक्ष्य के बारे में सोचने का वक़्त आ गया।  उनके अनेक क्लासमेट्स ने दूसरी कम्पनियों में अवसर तलाशने शुरू कर दिए थे , इससे उनका पैकेज थोडा बढ़ता रहता था , एक ही कंपनी में पड़े रहने से भाव कम होना शुरू हो जाता था, और फिर यही वक़्त तो था जोर शोर से आगे बढ़ने का , फिर तो शादी करके एक जगह बैठना ही था।

लेकिन पिछले एक साल के अनुभव से अर्नब और उसके अधिकाँश दोस्तों को एक चीज़ परेशान करने लगी थी। समस्या ये थी कि उनका पैकेज तो निस्संदेह आकर्षक था , पर जितना वक़्त और दिमाग वो लोग अपनी नौकरियों में लगा रहे थे और जितना मुनाफा करके अपनी कम्पनियों के मालिकों को दे रहे थे , उस हिसाब से उनकी आय कुछ भी नहीं थी।  आने वाले दिनों में इस सीमित आय के साथ दुनिया भर के लोन्स की किश्तें जुड़ने वाली थीं।  खर्चों की कोई सीमा नहीं थी , लेकिन आय की बढ़ोत्तरी की एक सीमा थी। उनकी जीतोड़ मेहनत  के बल पर उनको तो चार छ परसेंट इन्क्रीमेंट मिलता था पर उनकी कम्पनियों के मालिक अमीर होते जाते थे,। मालिक जो अधिकाँश स्नातक भी नहीं होते थे, बस पुश्तैनी कम्पनियां चला रहे थे ! वो तो इतना पढ़ लिख के बस सफ़ेद  कालर वाले मजदूर बनके रह गए थे। कई बार तो मीटिंग्स के दौरान ये मालिक लोग उन्हें ऐसी ऐसी बातों पर हड़का देते थे जो वास्तव में उन कम पढ़े मालिकों की सीमित  समझ से बाहर होती थी। फिर इन लोगों को समझ में आता था कि शायद भैंस के आगे बीन बजा दी गयी है।

अर्नब सोच रहा था , शायद वक़्त आ गया था मजदूर से मालिक बनने का। अपनी प्रतिभा पर उसे कोई शक नहीं था , शक था तो अपनी किस्मत पर। अगर सिर्फ मेहनत करके लोग बड़े बिज़नेसमैन बन जाते तो
बात ही क्या थी।  निस्संदेह किस्मत एक बड़ा फैक्टर थी, एक नयी राह पर आगे बढ़कर सफलता पाने के लिए।

अर्नब और उसके मुम्बई के  दो दोस्तों ने मिलकर सोचा कि उन्हें एक बार रिस्क तो लेना चाहिए।  अगर सही राह मिल गयी तो चलने में क्या हर्ज़ है , कम से कम एक मौका तो दे ही सकते हैं ज़िन्दगी को। उसके बाद तो फिर शादी और बच्चे, फिर थोड़ी ये सब कर पाएंगे। और अगर किस्मत खराब भी निकली तो देर सवेर दूसरी नौकरी तो मिल ही जायेगी, बस  पैकेज थोडा इधर उधर हो जायेगा। प्रीमियर कॉलेज से एम बी ए करने का यही  तो फायदा था। भूखे तो नहीं मरेंगे।

अर्नब को चिंता थी तो राशि की। उसके घरवाले उनकी जल्द शादी करवाना चाहते थे। उनकी चिंता भी जायज थी , सगाई और शादी के बीच का वक़्त बहुत लम्बा भी नहीं होना चाहिए।  पर अर्नब जिस राह पर चलना चाहता था उसमें उसे थोडा वक़्त चाहिए  था अपने आपको स्थापित करने का। उसने राशि से बात की और अपनी इच्छा जाहिर की। राशि खुद इस दौर से गुजर रही थी और ये चीज़ समझ सकती थी। उसे भी अर्नब की प्रतिभा पर पूरा भरोसा था। उसने अर्नब को आश्वासन दिया कि वो अपने घरवालों को समझा लेगी और वो लोग उसे पर्याप्त वक़्त देंगे अपने कैरियर पर ध्यान देने का।  ये सुनकर अर्नब को बहुत अच्छा लगा था।

बस फिर क्या था।  तीनो दोस्तों ने मिलकर सम्भावनाएं तलाशनी शुरू कर दीं। कुछ ही वक़्त में उन्होंने एक नयी कंपनी की नींव डाल  दी और अपने पुराने संपर्कों के ज़रिये छोटा मोटा काम तलाशना शुरू कर दिया। अर्नब के दिल में अब भी एक डर  रहता था कि इतनी मेहनत के बाद अगर किस्मत ने साथ नहीं दिया तो फिर क्या होगा।  कंपनी की नौकरी वो छोड़ चुका  था।  इतना बड़ा रिस्क लेकर उसने न सिर्फ अपनी बल्कि राशि की ज़िन्दगी को भी अधर में डाल दिया था।  क्या ये बेहतर नहीं होता कि वो बंगलौर में दूसरी नौकरी  ढूंढ लेता और वो दोनों हंसी ख़ुशी  साथ रहते।  दो लोगों की आय क्या कम होती घर चलाने के लिए? पर बात सिर्फ इसकी नहीं थी , बात थी अपनी प्रतिभा को उचित अवसर देने की।  और संयोग से राशि ये बात समझती थी।

अर्नब की नयी कंपनी को छोटे मोटे काम मिलने शुरू हुए।  वो लोग काफी उत्साहित थे। जी जान से काम करते थे।  छोटी छोटी बातों पर पूरा ध्यान देते थे। क्लाइंट्स उनके काम से खुश भी हुए थे और ज्यादा काम देने का आश्वासन भी दिया था।  पर हफ़्तों से महीने गुजर जाते और उन्हें यही छोटे मोटे प्रोजेक्ट्स  मिलते रहते।  बड़ा काम मिलने का  बस आश्वासन मिलता था।  अर्नब और उसके दोस्तों ने उत्साह नहीं छोड़ा था , वो लोग जानते थे सफल होना इतना आसान नहीं। पीछे पड़े रहना पड़ता है तब जाकर एक स्वर्णिम मौका मिलता है। इसलिए वो लोग लगे रहते थे।  हाँ लेकिंन अब पैसों की चिंता सताने लगी थी।  अभी उनकी आय इतनी नहीं हुई थी कि शादी करके घर बसाया जा सके। अर्नब के दिल में जो किस्मत का खौफ था वो अब सामने आने लगा था। अगर किस्मत ने साथ नहीं दिया तो? क्या राशि के मम्मी पापा खुश होंगे अपनी बेटी का हाथ उसके हाथ में देकर जो फिलहाल उससे आधा भी नहीं कमा पा रहा था।  कैसे खुश रख पायेगा वो राशि को?

उसकी ये चिंता बातों बातों में राशि तक भी पहुँचने लगी , और तब राशि ने स्थिति को संभालकर अर्नब का हौसला बढ़ाना शुरू किया। जिस दिन उसकी किसी बड़े क्लाइंट से मीटिंग होती उससे पहले राशि उसे उसका साप्ताहिक भविष्यफल पढ़के सुनाती। आपके प्रयास सफल होंगे , वरिष्ठ अधिकारियों के बीच ख्याति बढ़ेगी , नए अवसर मिलेंगे। ये सब सुनके अर्नब को अपनी किस्मत पर यकीन होने लगता और वो दुगुने उत्साह से काम पर जाता। ये सिलसिला चलता रहता और राशि के साप्ताहिक भविष्यफल अर्नब के लिए उम्मीद की नयी किरण लेकर आते। भले ही बाद में अधिकाँश बातें गलत निकलती पर मन के किसी कोने में अर्नब को अब अपनी किस्मत पर यकीन सा होने लगा था , लगता था कि प्रयास करते रहेंगे तो आज नहीं तो कल किस्मत एक मौका ज़रूर देगी। 

एक  साल बीत गया , और अर्नब को थोड़े बेहतर प्रोजेक्ट्स  मिलने शुरू हुए। राशि के प्रोत्साहन और साप्ताहिक राशिफलों की बदौलत अब अर्नब की कंपनी ने एक पहचान  बना ली थी , मार्किट में उनका नाम हो गया था।  हालांकि कोई बड़ा काम अब तक नहीं मिला था।  लेकिन अब अर्नब ने फैसला कर लिया था कि राशि को अधिक देर तक इंतज़ार नहीं करवाएगा।  अब उसकी कंपनी से ठीक ठाक आमदनी हो जाती थी । उसने राशि से अपनी शादी की तारीख  निकलवाने को कहा।  राशि बहुत खुश थी। उसने घर पर ये बात बतायी और दोनों के परिवार वालों ने मिलकर अगले महीने की  एक तारीख  तय कर दी। वक़्त बहुत कम था , कार्ड्स छपने थे, बाँटने थे , शौपिंग करनी थी।  राशि एक सप्ताह पहले छुट्टी लेकर घर आ गयी।

रविवार  का दिन था। दोनों की फ़ोन पर लम्बी बातों का दिन।
"क्या कहती है मेरी राशि इस हफ्ते ?   बोर हो रहा था सोचा यही पता कर लूं। ""
" हा हा, मज़ाक उड़ा  रहे हो मेरे राशिफलों का !""
"नहीं नहीं , तुम्हारे राशिफलों की बदौलत ही तो आज तुमसे शादी करने की हालत में हूँ , वरना  किस्मत से तो यकीन ही उठता जा रहा था। ""
""अच्छा ? वैसे इस हफ्ते लिखा है नए आयाम खुलेंगे !""
""कौन सी दिशा में खुलेंगे ये लिखा है ? वैसे भी शादी करके तो खुल ही रहे हैं आयाम !"
"और क्या! ये कोई छोटा आयाम है ! अगले हफ्ते तुम मेरे दरवाजे पर दस्तक दे रहे होंगे। "
"वो तो अभी भी दे रहा हूँ। ""
''मतलब?''
''मतलब दरवाजा खोलो , कब से बजा रहा हूँ पर तुम हो कि फ़ोन पर लगी हुई हो !"'
राशि को कुछ समझ नहीं आ रहा था।  तब तक उसकी मम्मी ने दरवाजा  खोला। सामने अर्नब खड़ा था। मम्मी के पैर छूकर अंदर आ गया।

""सब ठीक तो है बेटा ? आप अचानक यहाँ ? राशि ने भी नहीं बताया मुझे। ""

''राशि को खुद नहीं पता था ! सरप्राइज है मम्मीजी !""
''ओहो! तुम बैठो राशि  के साथ मैं पानी लेके आती हूँ।''
''नहीं आंटी पानी वानी बाद में । पहले आशीर्वाद दीजिये। आपके बेटी की भविष्यवाणियां अब जाकर सच हुई हैं ! बड़ा काम मिल गया है हमें , पूरे पांच करोड़ का !""
''सच! वाह बेटे ये तो बहुत ख़ुशी की बात है , है न राशि ? मैं मिठाई लेके आती हूँ और तुम्हारे पापा को भी बताती हूँ , छत पर गए हैं पतंग उड़ाने!''
''अंकल नहीं सुधरेंगे ! रिटायरमेंट के मजे ले रहे हैं !"'
आंटी हँसते हुए अंदर चली गयी।

 राशि अब भी मुंह खोलकर खड़ी  थी। न तो अपनी आँखों पर विश्वास होता था न कानों से सुनी बात पर।अर्नब उसे देखकर हँस रहा था।

''मैडम मैं ये खबर सुनाने के लिए पहली फ्लाइट लेके अहमदाबाद आया हूँ और आप हैं कि। ''
राशि को होश आया , अर्नब को अपने कमरे में लेके गयी और चेयर  पर बिठाया।

''तुम सच बोल रहे हो ? पाँच करोड़ का प्रोजेक्ट ? ""
''हाँ ! कल ही टेंडर खुला  था पर मैंने सोचा फ़ोन के बदले यहाँ आकर तुम्हें बताऊँ।  इतनी बड़ी खबर है , तुम्हारा रिएक्शन देखना था।''
राशि चेयर पर बैठी रो रही थी , ज्यादा ख़ुशी भी सम्भाली नहीं जाती थी। अर्नब ने उठाया और गले लगा लिया।

अंकल शायद छत से आ गए थे। आवाज आ रही थी। दोनों बाहर आ गए ।  आंटी ने चाय भी बना दी थी। मिठाइयों की प्लेट उनका इंतज़ार कर रही थी।  अर्नब ने अंकल का भी आशीर्वाद लिया। सब लोग हंसी ख़ुशी बातें कर रहे थे। समधियों को भी फ़ोन से बधाई का आदान प्रदान हो गया।

''वैसे राशि तुम कौन से अखबार से पढ़कर मेरा राशिफल बता रही थी ज़रा दिखाओ तो ?''

राशि इधर उधर देख रही थी मानो कुछ ढूंढ रही हो । राशि की मम्मी को हँसी आ गयी।
''कुछ होगा तो दिखाएगी न ! ''
''मतलब मम्मीजी  ?''
''मतलब बेटा ये अपने मन से कुछ भी बोलती रहती है , कोई अखबार नहीं होता इसके हाथ में! मुझे तो लगता है इसे अब तक तुम्हारी राशि भी नहीं पता , ज़रा पूछो तो इससे !''
अर्नब राशि को देख रहा था , ''हाँ ज़रा बताओ तो मेरी राशि कौन सी है ? तुम्हें मालूम तो है न ?''

राशि हँसने  लगी , '' मैं ही तो हूँ तुम्हारी राशि!''

अर्नब के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान तैर गयी।

बुधवार, 8 जनवरी 2014

छाता


"पार्लर पूछ रही हूँ यार , नाई  की  दुकान नहीं ! ""
""हाँ तो पार्लर ही बता रही हूँ। सब उसी के पास जाते हैं।  "
""अच्छा ? मतलब लड़का थ्रेडिंग करेगा , फेशियल करेगा ?""
""हाँ और  बहुत अच्छा करता है, एक बार चली जाना, खुद देख लेना। जस्सू भी  वहीं जाती है। ""

अंजू जल्दी से निकल गयी, ऑफिस थोडा दूर था, बस पकड़नी पड़ती थी ।  पर मीनू को अब तक उसका कहा  हजम नहीं हो रहा था, बड़े शहरों में तो सुना था , बम्बई दिल्ली में, पर  इस छोटे से शहर में भी लड़के ब्यूटी पार्लर चला रहे हैं, और लडकियां जा भी रही हैं उनके पास। वाह!

मीनू चाय लेने  ऊपर मकानमालकिन आंटी के घर चली गयी।  सुबह सुबह सात बजे एक वही उठकर चाय पीती थी, और सब लडकियां बिस्तर में घुसी रहती थीं। उनका काम भी क्या था , मस्ती करने आयी थीं।  आस पास के छोटे बड़े कस्बों से आयी थीं। निकिता एयर होस्टेस का कोर्स कर रही थी, जसमीत उर्फ़ जस्सू इंग्लिश बोलने चालने  का कोर्स करने, एन आर आई के साथ शादी होनी थी एक दो महीने में। पूनम प्राइवेट से एम् ए  कर रही थी, साथ में कंप्यूटर क्लास जाती थी ।  इन सबको क्या करना था जल्दी उठकर।  आराम से गप्पें मारते हुए उठते थे , पूरा दिन मस्ती करते थे, नयी नयी नेल पोलिश लगाते थे , बालों में नए नए कलर करते थे , पैसों की भी कमी नहीं थी और वक़्त की भी नहीं।  लेकिन मीनू के पास थी, दोनों की। इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर थी, साथ में आगे की पढाई के लिए तैयारी कर रही थी। पर तैयारी हो नहीं पाती थी , छोटे से दो कमरों के घर में जगह ही नहीं मिलती थी शान्ति से पढ़ने के लिए। 

आंटी बाहर बरामदे में बैठकर चाय पी रही थी , मीनू किचन से चाय लेकर आंटी के साथ बैठ गयी। 

""बहुत ठण्ड है बेटा , अच्छे से रहा करो कान बांधकर। ""
""हाँ आंटी , टाइम ही नहीं मिलता बाज़ार जाकर स्कार्फ़ लाने का। अचानक से ठण्ड बढ़ गयी। ""
""आज ले आना। अपने लिए टाइम निकाला करो, तुम ठीक रहोगे तब तो  बाकियों को ठीक रख पाओगे   ""
""बात तो सही है आंटी।  ""
मीनू को आंटी के साथ बैठना अच्छा लगता था, बहुत हिम्मतवाली थी आंटी।  उनके पति उन्हें छोड़कर गाँव रहते थे , बेटा नाकारा सा घर में बैठा रहता था , बहू रूठकर मायके में बैठ गयी थी ।  बेटी की शादी हुई थी पर कुछ मानसिक समस्या के कारण पति ने उसे यहाँ छोड़ दिया था। नीचे के दो कमरों से मिलने वाले किराए से घर चलता था ।  लेकिन इतने बड़े समस्याओं के पोटले को सर पर ढोकर  आंटी के मुंह पर शिकन तक नहीं आती थी। मुस्कुराती रहती थीं, और नसीहतें देती रहती थीं। बस यही कारण था कि मीनू अक्सर आंटी के साथ बैठ जाया करती थी। आंटी भी उसके साथ अपने सुख दुःख बांटती थी , बाकी सब लड़कियों में एक वही तो थी जो आंटी की बात समझ सकती थी।  संघर्ष चाहे जैसा भी हो, दो संघर्षरत व्यक्ति देर सवेर दोस्त बन ही जाते थे।

""अच्छा आंटी  आपने बिजली वाले को बुलाया आज?""
""बिजली वाला? क्यों बेटा ?"" आंटी फिर भूल गयी थीं ।
""वो मैंने बोला था न आपको, वो छोटा वाला कमरा जो हमारे कमरे से लगा हुआ है , वहाँ लाइट लग जाती तो मुझे थोडा अलग बैठकर पढ़ने की जगह मिल जाती।  "" मीनू बहुत दिनों से आंटी को बोल रही थी इस बारे में।  उनके कमरे के साथ एक छोटा सा कमरा लगा हुआ था जो अभी स्टोर रूम की तरह इस्तेमाल होता था।  उसमें थोड़ी सी जगह थी बैठने की। वहीं बैठकर मीनू शांति से पढ़ना चाहती थी।  मीनू ने बोला भी था कि बिजली लगाने का जो खर्च होगा वो दे देगी, पर आंटी पता नहीं क्यों टाल रही थीं।
""ओहो बेटा मैं रोज भूल जाती हूँ।  आज पक्का बुला दूँगी। मुझे मालूम है तुझे पढ़ना है बेटा। ""
""ठीक है आंटी, मैं चलती हूँ।  ""चाय ख़त्म हो गयी थी।

नीचे आकर मीनू जल्दी से तैयार हुई, रात में बनाये लेक्चर के नोट्स पर नज़र डाली, थोडा बहुत बदलाव किया , फिर नहाने घुस गयी।  देर हो रही थी , बस पकड़नी थी। बस स्टॉप जाने  में ही दस मिनट लग जाते थे। 

तैयार होकर निकली तो देखा बारिश शुरू हो गयी थी, पर अब कुछ नहीं हो सकता था, उसका पुराना छाता पिछले साल टूट गया था। मौसम की दूसरी बरसात थी।  कल भी मीनू भीग गयी थी पर बाज़ार जाकर नया छाता लाने का वक़्त ही नहीं मिला।  आज फिर भीगना था। आज तो किसी भी हालत में बाज़ार जाना ही पड़ेगा, मीनू सोच रही थी।

कॉलेज पहुँचते पहुँचते मीनू बुरी तरह भीग चुकी थी , और  सबसे बड़ी समस्या ये थी कि पहला लेक्चर उसी का था।  इस हालत में फाइनल इयर की क्लास लेना मतलब लड़कों की गन्दी फब्तियां झेलना जो उनकी फुसफुसाहट से समझ आ जाती थी। मीनू का दिमाग तेज़ चल रहा था , किसी तरह पहला लेक्चर टल जाता।  फिर उसकी नज़र अमन पर पड़ी।
""अरे अमन तुम बैठे हो, लेक्चर नहीं जा रहे ? ""
""नहीं मेरा पहला  लेक्चर फ्री है।  ""
""और दूसरा कौन सी क्लास में है ?"
""फाइनल इयर में, क्यों ?""

मीनू ने राहत की सांस ली । अमन अपने सब लेक्चर अच्छे से तैयार करके आता था।  कुछ दिनों से वो दोनों साथ में काफी वक़्त बिताते थे, खाली लेक्चर्स में , लंच में। एक अपनापन सा महसूस होने लगा था उसके साथ ।  इतनी सी मदद के लिए तो वो पूछ ही सकती थी।

""असल में मेरा पहला लेक्चर है पर मैं इतनी भीग गयी हूँ कि.""
""हाँ भीग तो तुम गयी हो, आज शाम को छाता ज़रूर ले लेना। अपने लिए वक़्त निकाला करो।  ""
""हाँ पक्का ले लूंगी पर अभी तुम थोड़ी हेल्प कर दोगे प्लीज? पहला लेक्चर तुम ले लोगे?""
कुछ पल का मौन।
""आई एम्  सॉरी मीनू, कल मैं लेक्चर की तैयारी कर नहीं पाया , अभी बैठकर वही कर रहा था। मैं पहला लेक्चर नहीं ले पाउँगा।  ""

मीनू सोच रही थी , क्या हो गया आज कल के लड़कों को, ऐसी हालत देखकर भी दिल नहीं पसीजता, दया नहीं आती।  लेकिन  गलती तो उसी की थी , क्यों नहीं ले लिया अपने लिए छाता जब कल से बारिश शुरू हो गयी थी, क्या हुआ अगर शाम को  लौटते लौटते अँधेरा हो गया था और उसका सर दर्द से फट रहा था।  अपनी इज़ज़त तो अपने ही हाथ मैं है।

मीनू जल्दी से नोट्स लेकर फाइनल इयर की क्लास में घुस गयी। अभी अभी दिल टूटा था। इस लेक्चर के बाद दो कप चाय पियेगी , नहीं टोमैटो सूप। मशीन की चाय में बिलकुल टेस्ट नहीं रहता।

लेक्चर ख़त्म हुआ , मीनू बाहर निकली, अमन अंदर घुसा।  और अगले पल वो कैंटीन में टोमैटो सूप पी रही थी।

शाम को एक पार्टी थी ।  उसकी तैयारियां भी करनी थी ।  मीनू को पार्लर गए सदियाँ बीत गयी थीं।  भोंहें जंगल की तरह फ़ैल गयी थीं।  आज शाम को तो किसी भी हालत में पार्लर जाना  ही था , वर्ना साथी लेक्चरर के बीच उसकी हंसाई हो जायेगी।  पिछली बार सब लोग कितने अच्छे से तैयार होकर आये थे पार्टी में, और वो ऐसे ही पहुँच गयी थी।  वहीं से उसने सबक लिया था।  ज़िन्दगी में न चाहते हुए भी कितने ऐसे काम करने पड़ते हैं, वर्ना उसका बस चलता तो पार्टी में ही नहीं जाती।

कॉलेज ख़त्म हुआ, और वो बस में लटकती हुई घर पहुँच गयी।  बिलकुल वक़्त नहीं था।  बाज़ार जाना था , छाता लेना था, स्कार्फ़ लेना था , पार्लर जाना था।  एन आर आई दुल्हन जस्सू ने  टोका , क्या बात है मीनू दी इतनी हड़बड़ी क्यों?  मीनू को बहुत अच्छा मानती थी। बहुत इज़ज़त करती थी उसकी। इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर होना वहाँ की लड़कियों के लिए बड़ी बात तो थी।  मीनू ने पार्टी वाली  बात बतायी।
""कौन सा सूट पहनेंगी आप ?""
""ये वाला। "" मीनू ने दिखाया।
""अरे ये तो रोजमर्रा वाला है।  कोई स्पेशल सूट नहीं है आपके पास ?""
""नहीं यार टाइम ही नहीं खरीदने का।  हाँ एक सूट है भैया की शादी में पहना था , मेहँदी में। ""
""दिखाइये न , फिर बताती हूँ। ""
मीनू ने सूटकेस खोला। एकमात्र चमक दमक वाला सिल्क का सूट था उसके पास। सौभाग्य से जस्सू को वो पसंद आ गया, वरना  उसकी शौपिंग लिस्ट में एक चीज और जुड़ जाती।

""अच्छा आपके  पास इससे मैचिंग कड़े और झुमके वगैरह हैं ?""
मीनू मायूस हो गयी।  मतलब ये सब भी खरीदना बाकी था !
""चिंता मत कीजिये  मेरे पास हैं। आप  पार्लर से आइये  फिर मैं आपको  तैयार करती हूँ। ऐसा तैयार करूंगी कि सबको पार्टी में सिर्फ आप  ही दिखेंगी ।  इतनी सुन्दर हैं आप, बस अपने को टाइम नहीं देतीं। "

मीनू खुश हो गयी।  सुबह से एक  बार दिल टूटा था तो एक बार तारीफ़ भी हुई थी। ज़िन्दगी खट्टी मीठी थी, टोमैटो सूप की तरह।

सूटकेस वापस रखने गयी तो  उसका ध्यान स्टोर में रखे नए सूटकेस की तरफ पड़ा।
""ये किसका है जस्सू ?""
""अरे हाँ  आपको बताना भूल गयी, स्टोर में एक नयी लड़की  शिफ्ट हो रही है।  अभी आंटी के साथ आयी थी रूम देखने । शाम तक  पलंग वगैरह आ  जाएगा। ""

तड़ाक। ये दूसरी बार था।  गम ख़ुशी पर भारी पड़  रहा था।

 अब मीनू समझी कि क्यों आंटी ने अब तक बिजली वाले को नहीं  बुलाया था। उनकी भी समस्या थी , घर का  खर्च चलाना था।  जितनी  ज्यादा लडकियां उतना अच्छा।

अब मीनू ने  निश्चय कर लिया था।  अगले महीने से दूसरा घर ढूंढ लेगी, यहाँ तो उसका कुछ नहीं हो सकता। पर वो ये सब करेगी कब ? वक़्त कहाँ है ?

मीनू जल्दी से निकल गयी, अभी बहुत काम पड़ा था।

बाज़ार जाकर मीनू ने पहले ए टी एम् से पैसे निकाले  फिर अपने ज़रुरत की खरीदारी की।  स्कार्फ़ वाली दूकान से दो तीन ठीक ठाक सूट ले लिए जल्दी सूखने वाले।  कॉटन के सूट सूखते ही नहीं थे।

हलकी सी बारिश अब भी हो रही थी , पर अब मीनू के पास छाता था।  सब खरीदारी करके वो लौटने लगी तो उसी पार्लर पर नज़र गयी जिसका जिक्र अंजू ने किया था। आस पास कोई दूसरा पार्लर नहीं था , मीनू के पास वक़्त भी नहीं था।  चुपचाप अंदर घुस गयी।

मिलन नाम था उस पार्लर का , और उसके सबसे चहेते व्यक्ति का भी।  अभी वो किसी लड़की का फेशियल  कर रहा था जो लगभग होने ही वाला था।  मीनू आश्वस्त हो गयी।  लडकियां आती हैं यहाँ। लेकिन  इसके बाद सिर्फ वही अकेली थी।  बारिश के मौसम में पूरे शहर की लडकियां घर में दुबकी  हुई थीं।
मीनू का नंबर आया, और वो चेयर पर लेट गयी।  सुबह से टूटे दिल के टुकड़े लिए दौड़ते भागते अब जाकर फुर्सत मिली थी, मीनू ने आँख बंद कर ली।
" आप कितने दिनों बाद पार्लर आ रही हैं ?""
"दो महीने हो गए ।  वक़्त ही नहीं मिलता। "" अंतिम बार वो अपने पुराने शहर में गयी थी।
""वक़्त निकाला कीजिये ।  " सुबह से चौथी बार किसी ने उसे ये कहा था।  पर इस बार मान लेने को जी करता था । मिलन ने बहुत नज़ाकत से उसकी घनी भोंहों को सुन्दर आकार दिया था, और अब वो उसके माथे पर हलके हाथों से मसाज कर रहा था।

मीनू का दर्द घुलता जा रहा था। जो  सुकून उसे उसकी प्रिय आंटी, उसके दोस्त अमन और न जाने कौन कौन न दे पाये थे वो सुकून एक हेयरड्रेसर  के हाथों का स्पर्श दे रहा था। मीनू मन ही मन सोच रही थी , इसकी बात नहीं टालेगी।

 बाहर निकलकर  ऑटो किया और घर पहुंची।  जस्सू अपने साजो सामान के साथ उसका इंतज़ार कर रही थी।

""कितने बजे जाना है मीनू दी ? उस हिसाब से आपको तैयार करूँ। "
""सात बजे से है पर मुझे कोई जल्दी नहीं। तू आराम से कर। "" मीनू ने आज ही सबक सीखा था।
""ठीक है दी आप सूट पहनके यहाँ बैठ जाइये। ""

आठ बजे मीनू पार्टी में पहुंची, और वाकई जैसा जस्सू ने वादा किया था, सबकी निगाहें उस पर अटक गयीं। मीनू को इन सब की आदत नहीं थी , चुपचाप जाके स्नैक्स और टोमेटो सूप लेके एक चेयर  पर बैठ गयी।

अमन आस पास मंडरा रहा था , शायद उसके बदले रूप को हजम करने की कोशिश में।  थोड़ी देर में पास वाली चेयर पर आकर बैठ गया।

""हैलो मीनू!""
""हैलो। ""
""तुम्हारी तबियत तो ठीक है न , आज सुबह कितनी भीग गयी थी ? सर्दी तो नहीं हुई ? मुझे बहुत फ़िक्र हो रही थी। और तुमने छाता लिया कि नहीं ? मेरे पास  दो हैं मुझसे......""

मीनू ने बीच में बात काट दी , ""टोमैटो सूप पियो, अच्छा बना है । ""