गुरुवार, 20 नवंबर 2014

हाथी की सवारी


''हाथी की सवारी?"
'' हाँ, सब लोग तो कर रहे हैं। करवा लो इसको भी। ''
''पर मम्मीजी , अभी?  ''
''और क्या।  कहते हैं हाथी पर बैठने से राजगद्दी  मिलती है। ''

हम्म, तो राजगद्दी के लिए हाथी की सवारी ! बेटे को राजा महाराजा बनाने का सपना मैंने तो नहीं देखा था। जो बनाना था उसकी मेहनत के दम पर, और राजा महाराजा तो कभी नहीं!

और सबसे बड़ी बात, हाथी पर बैठने के नाम से ही पसीने छूट जाते थे। पिछली बार इसके पापा साथ में थे तो घोड़े की सवारी करवा दी थी बेटे को , मैं तो दूर से रिकॉर्डिंग कर रही थी।  सोच भी नहीं सकती थी उस पर बैठने के बारे में ! बाप बेटे दोनों बड़े खुश थे वापस लौटकर , और मैं भी!

तो यही मेरा प्लान था।  जितने भी एडवेंचरस काम थे वो पापा को सिखाने थे , बाकी सब मुझे सम्भालना था।  पर यहां तो दिक्कत ये थी कि पापा ही नदारद थे।  और हाथी सामने खड़ा था , एक अवसर की तरह जिसके  जल्द दुबारा मिलने की कोई गारंटी नहीं थी थी ! कन्फ्यूज्ड हो गयी मैं।  और  मम्मीजी ने राजगद्दी वाला उदाहरण फिर दिया  तो मेरा कन्फ्यूज़न जाता रहा।  नहीं बनाना मुझे इसको राजा यार , देखी जायेगी ! कहीं हाथी ज़रुरत से ज्यादा हिल डुल गया तो भावी राजा की मम्मी तो वहीं ढेर हो जायेगी ! ये ट्रिप ठीक ठाक निकल जाए, हाथी तो मिलते रहेंगे।  नहीं भी मिले तो क्या !

और मैंने बगलें झाँकते हुए मुद्दे को टाल दिया।  मम्मीजी ने कोशिश तो काफी की थी पोते को  राजगद्दी दिलाने की पर फिलहाल उनकी डरपोक बहू हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।

पर मम्मीजी की उदासी देखके मुझसे रहा नहीं गया।  मैंने हौले से बेटे से  पूछा , बैठना है आपको बेटा ? वो भी उतना ही कन्फ्यूज्ड लग रहा था,  बोला आप बैठोगे तभी बैठूंगा।  उसने भी मम्मा दादी की बातें सुन ली थीं !

तो ये बड़ी विषम परिस्थिति हो गयी थी।  दादी, बुआ, चाचा सब  थे, पर बैठना उसको मेरे ही साथ था।  फिर तो हो गया, माँ बेटा दोनों पहली बार बैठेंगे, कौन किसको संभालेगा! बुआ और चाचा भी अगर साथ बैठते तो भी हाथी का डर जाता नहीं था। क्या भरोसा , संभाल पाएं कि  नहीं।

इसी उधेड़बुन में मैं आगे बढ़ने लगी , सोचा हाथी पीछे छूट जायेगा तो कन्फ्यूजन भी जाता रहेगा।  बाकी लोग भी चुपचाप मेरे पीछे हो लिए। दादी के अलावा किसी को ख़ास इंट्रेस्ट भी नहीं था , सब थके हुए थे।  पूरा राजा का महल घूम आये थे , हाथी के दर्शन से पहले।

बेटा मेरा हाथ पकड़कर चल रहा था। मुड़ मुड़कर हाथी को देख रहा था।  दो हाथी थे , एक एक करके राउंड  लगा रहे थे।  जब एक राउंड पर रहता तो दूसरा गन्ना खाता।

बेटा थोड़ा शांत हो गया था।  समझ गया था शायद।  इससे पहले तो  सवालों के ढेर लगा देता था , मम्मा हाथी क्या खा रहा ? क्यों खा रहा ? ऐसा क्यों, वैसा क्यों ?

 और फिर थोड़ी देर में अपनी चुप्पी तोड़ते हुए उसने पूछा, मम्मा हम लोग हाथी पे क्यों नहीं बैठ रहे ?

इस सवाल ने मुझे निरुत्तर कर दिया था। बेटा मेरे साथ हाथी पर बैठना चाहता था।  पापा वाला ऑप्शन भी नहीं था।  हाथी ट्रेन्ड थे , डर वाली कोई  बात नहीं थी।  क्या मैं अपने बेटे को दुखी कर सकती थी ?

अपने डर के बारे मैं मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता था। हाथी जितनी ऊंचाई वाले निर्जीव ट्रांसफार्मर  जो मेरे स्विचयार्ड में रहते थे , जिनके हिलने डुलने या मुझे गिरा देने का कोई डर नहीं था ,  उनपर तो मैं नहीं चढ़ पाती थी।  एक बार शटडाउन के दौरान कोशिश की थी चढ़ने की , जब बाकी लोगों को देखा उसपर चढ़ चढ़ कर इंस्पेक्शन करते हुए। पर आधी सीढ़ी से उतर आई ! कहीं ऊपर जाके चक्कर आ गया तो यहां खड़े लोग तो समझ ही नहीं पाएंगे अब मैडम का क्या करें!

समस्याएं यूँ  भी हाथी जैसी पहाड़ सी ही तो होती थी , और उनका समाधान भी उनपर चढ़कर ही निकलता  था। पर साक्षात हाथी ही आ जाए तो ?
फिर मैंने कुछ सोचा , और ननद के साथ खुसपुस की।  उसने सर हिलाया।  थोड़ी देर में वो टिकट काउंटर में खड़ी थी। हम लोग हाथी पर बैठ रहे थे! चाचा को फोटो खींचने के लिए नीचे छोड़ दिया था। मैं बेटा और बुआ, तीन जन का टिकट करवा लिया।

मम्मीजी ने पहले ही समझा दिया था कि बेटा चप्पल पहनके मत चढ़ जाना गणेश जी का रूप होते हैं।  ऊपर मंच पर चढ़कर हाथी वाहक ने भी उतरवा दिए। हाथी गन्ना खाकर तैयार था, मंच के सामने। पहले मैं चढ़ी, फिर बेटे को लिया और फिर बुआ चढ़ी। डरते डरते बैठ गयी। बहुत इत्मीनान से चल रहा था हाथी , पर उतने में ही मेरी हालत खराब थी। बेटा खुश था , बुआ तटस्थ थी , चाचा फोटो खींच रहे थे। अच्छा लगने लगा था। लेकिन मन में ये डर बरकरार था कि अभी हाथी को कोई इंट्रेस्टिंग चीज दिख गयी या दूसरा हाथी उसके हिस्से का गन्ना खाने लगा तो ये कहीं दौड़ने न लगे। दिल थाम कर एन्जॉय  करने की कोशिश कर रही थी। दूर कहीं लोग ऊँट की सवारी कर रहे थे तो लग रहा था कहीं बेटे का अगला लक्ष्य ऊँट न हो, क्योंकि उसमें तो मैं बैठने से रही! आखिर जीवित घर लौटना भी था।

 नीचे बाकी पर्यटक हमें देखकर फोटो ले रहे थे , बाय बाय कर रहे थे। मज़ा आ रहा था।  आखिरकार एक चक्कर पूरा हुआ। हाथी मंच की तरफ वापस चल पड़ा।  बीच में गन्ना पड़ा था तो उस तरफ चल दिया था पर मालिक ने लगाम कसी और वापस लाइन में ले आया। इतने में ही मैं चिल्लाने को तैयार थी।

वापस आये , और फोटोज देखी चाचा के कैमरे में। बेटे की ख़ुशी उसके मुँह पर झलक रही थी। हाथी की सवारी से पता नहीं उसको राजगद्दी मिले न मिले , पर मुझे सुकून ज़रूर मिल गया था।


शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

तसव्वुर के तोते


''यार बड़ी गजब है तूलिका तो । कुछ भी करा लो उससे। ''
''हाँ यार बहुत लोड देती है। उसके तो आस पास रहना मुश्किल है। वाइवा के सबरे मार्क्स तो वही ले जायेगी। अपन तो एक दूसरे की शकल देखते रह जायेंगे।  ''

रश्मि चाय में पत्ती डाल  रही थी और उन दोनों का तूलिका बखान सुन रही थी। तूलिका ये तूलिका वो। चाय कप में उड़ेलकर उसने दोनों को शांत करवाया।

''अच्छे से बताओ क्या हुआ , ऐसे खिचड़ी मत पकाओ। ''

सोनाक्षी  ने चाय की चुस्की ली और बिस्तार से पूरा किस्सा बयान करना शुरू किया। कैसे वो लोग एस एम के नोट्स लेने उसके पीजी वाले रूम गए थे जहां सीनियर्स आये थे उन लोगों का इंट्रो लेने। और कैसे तूलिका ने अपनी विभिन्न कलाओं से उन्हें ऐसा प्रभावित किया कि उन्हें रूम में बाकी लडकियां नज़र ही नहीं आई।

यूं तो अपनी स्मिता और सोनाक्षी कोई छोटी मोटी  तोप नहीं थे , कॉलेज के पहले सेमेस्टर  से ही लड़के इनसे बात करने के मौके तलाशते रहते थे और हम शाम रश्मि को उनके कान में फूंक मारकर ''आई वांट टू  मेक फ्रेंड सीप विद  यू '' का सीप साफ़ करना पड़ता था। हर रोज़ पता नहीं कितने इनके नाम के मुरझाये फूल लेक्चर हॉल टू में अंतिम सांस लेते थे। लेकिन ये दोनों मैडम नोट्स और असाइनमेंट सबमिशन के टॉपिक के अलावा और कोई ऊल जलूल बात किसी से करती नहीं थीं। इन दोनों की एक ही कमजोरी थी , क्लास का टॉपर।  उससे ये दोनों बड़ी प्रभावित रहती थीं और जा जा के बात भी करती थीं। टोपर बाद में खुद को चिंगोटी काटता था।

एक और मज़ेदार बात थी इनसे  जुडी। स्मिता सीबीएसई बोर्ड से पढ़ी थी और सोनाक्षी स्टेट बोर्ड से , तो इसलिए लड़के लोग भी उसी बैकग्राउंड के हिसाब से इनके पीछे पड़ा करते थे।  एक बार एक स्टेट बोर्ड वाला लड़का इनके पीछे हाँफते हुए आया और हिम्मत करके इन्हें रोककर पूछा। ''आप दोनों में से सोनाक्षी कौन है ?'' सोनाक्षी ने बताया कि मैं हूँ तो लड़का बोला ''सोनाक्षी जी  आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं क्या आप मुझसे फ्रेंडसीप करेंगी ?''

हँसते हँसते दोनों का पेट दर्द हो गया था , और रूम पर रश्मि का भी..... 'मतलब बन्दे को सोनाक्षी बहुत पसंद है फ्रेंडशिप भी करना चाहता है पर उसे मालूम नहीं कि सोनाक्षी है कौन! हा हा हा हा!''

और ऐसे ही हँसते खेलते दिन निकल रहे थे कि तूलिका नाम का साया इनके लेक्चर हॉल टू में मंडराने लगा। तूलिका एक मिस्टीरियस बंदी थी , हर किसी की पहुँच  से बाहर।  बात करती तो लगता शायरियाँ झड़ रही हैं ,  किस्से सुनाना शुरू करती तो लगता जॉन अब्राहम इसी का पडोसी है और बिपाशा ने तो इससे जलना भी शुरू कर दिया है। इस तरह एक एनिग्मा से घिरी तूलिका  ने धीरे धीरे प्रोफेसर से लेकर टॉपर तक को प्रभावित करना शुरू कर दिया।  तूलिका की फैन फॉलोइंग मास में नहीं क्लास में होती थी, और बाकी सारे बन्दे उसे मुंह खोलकर देखते और मिस्ट्री समझने की कोशिश करते रहते। औसतन एक सेमेस्टर में एक बन्दे को सेंटी करने का इंटरनल टारगेट रखा था उसने, चाँद बादल बारिश और अपनी शायरियां झाड़कर। सुनने में आता था कि तूलिका बादल घिरते हैं तो खिड़की पर एकटक बैठकर शायरियां लिखती है और जब सावन बरसता  है तो वो नन्हे बच्चों की तरह बाहर जाकर भीगती है, पगला जाती है।

रश्मि से अपनी रूममेट्स का दुःख देखा नहीं जाता था।   उसके मन में भी इच्छा जागी कि ज़रा देखें तो इस बंदी को। रश्मि भी कविताएं वगैरह लिख लेती थी पर वो वीर रस  की होती थीं और उनसे किसी लड़के को सेंटी नहीं किया जा सकता था। पर इससे रश्मि की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता था।  जब मुझे हिंदी ज्यादा आती है और उर्दू कम तो मैं और क्या कर सकती हूँ।

उस दिन वो तीनों तूलिका के रूम पर गए।  वहाँ कुछ एलीट क्लास के दो बन्दे पहले से बैठे थे जिनमें से एक वर्तमान सेमेस्टर का बकरा था। वो तीनों एक खाली बिस्तर पर बैठ गए।  तूलिका ने जैसे समा बाँध लिया था , अपने किस्से कहानियों से, अपने अतीत को झीने परदे से कुछ दिखाते कुछ छुपाते रहस्यों से।  रश्मि को छोड़कर सब लोग सम्मोहन में थे।  तब उसे बिस्तर पर बेतरतीब पडी एक नोटबुक दिखी।  वो नोटबुक ही थी, डायरी नहीं , ये बात उसे सोनाक्षी ने बतायी थी।  रश्मि को याद आया कि जब सोनाक्षी लोग पहले आये थे तो उन्हें भी ये ऐसे ही बेतरतीब पड़ी मिली थी , मतलब ये एक ''स्ट्रेटेजिक '' तरीका है बेतरतीबी से नोटबुक रखने का। लोग आएं, जिज्ञासावश उसे देखें, और एक बार खोल लें तो फिर तो....

खैर, वो मैकेनिकल की मंडली थी और रश्मि सिविल की , इसलिए बोरियत से बचने के लिए उसने नोटबुक उठा ली। हर पन्ने में कोई रहस्य गहराता जाता था , मय्यत पे मत  आना , बेजान जिस्म हूँ मैं, वगैरह वगैरह।  ऐसा लगता था मानो कितने दुःख देखे हैं उसने और फिर भी मुस्कुराती रहती है। आगे क्या लिखा था… हाँ तसव्वुर में मेरे रहती है वो शामें … तसव्वुर तो लकी अली के गाने में भी था....  तसव्वुर में हैं किसकी परछाइयाँ… वाह वाह उसे इस शब्द का मतलब भी नहीं पता और तूलिका ने इसको लेके शायरी भी लिख डाली ! कितने दिनों से वो सोच रही थी अपने स्कूल की दोस्त रशीदा से पूछेगी इसका मतलब। 

''तूलिका यार तू हंसना मत। ''
''बोल न। ''
''यार ये तसव्वुर क्या होता है ?'' रश्मि ने बड़ी हिम्मत करके पूछा था। अपनी संभावित जगहंसाई को ताक  पर रखकर।
''अम्म…… इट्स एक्चुअली यू नो...  हाउ डू आई एक्सप्लेन… इट्स लाइक.... "

अब तक स्मिता की हंसी छूट चुकी थी ''तुझे नहीं पता न इसका मतलब !''
तूलिका पूरे जोर शोर से  खुद का बचाव कर रही थी पर हमारी देसी लड़कियों को उसकी दुखती रग मिल गयी थी और वो उसपर डंडे से प्रहार कर रही थीं।
''तुझे तसव्वुर का मतलब नहीं पता और तूने उस पर शायरी भी लिख डाली। हा हा हा। ''
तूलिका की हालत खराब थी ।   ''ओह आई  डोंट नो हाउ इट गॉट  देअर इट्स माय पर्सनल डायरी यू नो… ''
''ओहो पर्सनल है, सॉरी सॉरी इसको कहीं छुपा के  रख देना हाँ ?''
''हाँ भूलकर  भी किसी के तसव्वुर में मत आने देना इसको !'' दोनों ताली दे दे कर उसके मज़े ले रहे थे, और रश्मि सोच रही थी, आज रात चैन की नींद आएगी।


गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

हैं हैं ठीकाछे


मैडम एक बात पूछेगा आपसे, आप बुरा तो नहीं मानेगा ?''
''पूछिए फिर देखते हैं !''
''आपको इधर बंगाल में आये कितना बोचोर हो गया ?''
''छह साल हो गया। ''
''तो आप की थोड़ा थोड़ा बांग्ला सीखा है ? अभी देखता है आप हिंदी में ही बात करता है। ''
''हाँ सीखा तो है।  अमी  बांग्ला बोलते पाड़ी । ''
''कहाँ, छह साल से तो हम यही एकटो  लाइन सुनता है।  अरे पूरा डिपार्टमेंट हिंदी सीख गया आपको बांग्ला सिखाने के चक्कर में। ''
''अरे पिनाकी जी , तीन चार साल तो कॉलेज के वक़्त की सीखी गुजराती  को भुलाने में लग गए। बोलना चाहते थे बंगाली और निकलती थी गुजराती। ''
''अरे मैडम हमारा लरका सिर्फ तीन साल से चेन्नई में है इनफ़ोसिस में, वो तो खूब भालो मद्रासी बोलता है अभी । अपना अपना शौक है मैडम , किसी को सीखना अच्छा लगता है किसी को नहीं। ''

नंदिता ने बगलें झांकनी शुरू कर दी। पिनाकी बाबू आज क्लास लेने के चक्कर में थे।

आज दुर्गा सप्तमी थी।  वैसे भी स्टाफ का  कभी काम करने को लेकर ख़ास मूड नहीं रहता था और अभी तो दुर्गा पूजा का वक़्त था। इमरजेंसी काम छोड़कर उनको कोई सीट से हिला नहीं सकता था। ऐसे में पिनाकी बाबू आ गए थे नंदिता को पकाने के लिए , शुभो पूजो के बहाने।

ऐसा नहीं था कि नंदिता को बांग्ला सीखने का शौक नहीं था। कॉलेज मैं उसकी एक रूममेट बंगाली भी थी , जो पूरे तन मन धन से बंगाल का प्रतिनिधित्व करती थी।  वही हथिनी जैसी चाल  , वही सुस्ताई सी आँखें, रसगुल्ले जैसे गाल, माछ भात के विटामिन ई  से दमकती त्वचा।  किसी काम को करने की कोई हड़बड़ी नहीं।  और खान पान के लिए भले पैसे कम  पड़  जाएँ , पार्लर के लिए कोई समझौता नहीं। आइना तकिये के नीचे रखकर सोती थी मोमिता जी , कि सुबह उठते ही अपनी शकल सुधार ले इससे पहले कि कोई उसके अनधुले प्राकृतिक रूप को देख ले ।

तो वहीं से नंदिता को बंगाल की पहली झलक मिली थी।  और थोड़ी इच्छा भी जागृत हुई थी , बंगाली सीखने के लिए।  पर मोमिता  मैडम जो अधिकाँश अपने घरवालों से फ़ोन पर  ''हैं हैं ठीक आछे'' कहती सुनाई देती थी उसने इस राज का पर्दाफाश कर दिया था कि उसे ''हैं हैं ठीक आछे '' से ज्यादा बांग्ला आती ही नहीं थी  , वो तो सिक्किम में पली बढ़ी थी !  तो इस तरह नंदिता का बंगाली सीखने का सपना अधूरा रह गया।  लेकिन मोमिता  के  सानिध्य में उसने और बहुत कुछ सीख लिया।  माछेर झोल , दुर्गा पूजा की धूम, विष्णुपुरी साड़ियाँ, रबिन्द्र संगीत वगैरह वगैरह।

और इसके अलावा कुछ छोटी छोटी बातें , जैसे अगर मोमिता को अगर बाहर कैंटीन  में चाय पिलाने ले जाना होता था तो एक घंटे का नोटिस देना पड़ता था , दूसरी तरफ  बगल वाले रूम की नैना और सुरभि दुपट्टा ड़ालकर वैसे ही चल  देते थे।  जब उनकी दूसरी चाय ख़त्म हो  रही होती थी  तो दूर कहीं से मोमिता  आती दिखती थी , सलीके  की चादर और नज़ाकत  का स्कार्फ़ ओढ़े। नंदिता के  मन में ये लाइन  चलने लगती थी.…एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा।

एक ख़ुमारी सी रहती थी उसके आस पास। और इस ख़ुमारी के ख़ुमार में कुमार भैया सर तक डूब चुके थे , वो भी अंतिम सेमेस्टर में। सलीके और नज़ाकत के कद्रदान आखिरकार मिल चुके थे। दोनों मिलकर एक दूसरे  में मशगूल रहते थे , और बाकी लड़कियां राहत की सांस लेकर दिन भर के काम निपटा लेती  थीं।

जब कुमार भैया का आखिरी सेमेस्टर पूरा हुआ और वो दोनों बिछड़ गए तो मोमिता बाज़ार से जगजीत सिंह का ''कोई  फ़रियाद '' कलेक्शन ले आई और खाने पीने और सोने के अलावा बाकी वक़्त उसमें डूब गयी।  नंदिता से रहा न गया तो अपनी तंग जेब से पैसे निकालकर इयरप्लग ले आई उसके लिए।
उस समय नया नया मोबाइल चला था, नोकिया का।  मोमिता पहली लड़की थी उसे लेने वाली।  उधर कुमार भैया को भी जबरदस्ती खरीदवा दिया था।  और फिर जब एयरटेल की फ्री एसएमएस वाली स्कीम लांच हुई तो कुमार भैया ने शुरू शुरू में उसके ''खाना खाया ? ब्रश किया? ''  प्रश्नों के  उत्तर मिस यू जोड़कर दिए पर
धीरे धीरे वक़्त के तकाजे के साथ मोमिता का मोबाइल खामोशी में डूबता चला गया।  और तब नंदिता और उसके पडोसी रूममेट्स के सामने उसे ज़िंदा रखने का चैलेंज आ गया।  उसके आंसू और जगजीत सिंह की ग़ज़लें थमने का नाम नहीं लेती थी और सेमेस्टर की परीक्षाएं सर पर थीं।  ऐसे में तीनों ने एक प्लान बनाया।

उनके पूरे बैच की लिस्ट निकालके एक काबिल मुर्गा ढूँढा गया और उसे जाल में फंसाया गया। उन दिनों लड़कों के लड़कियों को लेकर ज्यादा क्राइटेरिया नहीं होते थे।  बस वो लड़की हो इतना काफी होता था।  और इस तरह विकास को मोमिता को संभालने की ज़िम्मेदारी यह कहकर सौंप दी गयी इससे अच्छी लड़की तुझे क्या मिलेगी इसके कान में दो  दिन के अंदर गोविंदा के गाने बजने चाहिए।

विकास ने ज़िम्मेदारी बखूबी निभायी।  मोमिता ने अपने धूल खाते आईने को साफ़ किया और तकिये ने नीचे रख दिया। लड़कियों ने राहत की साँस ली।


पढाई लिखाई ख़त्म हुई , दुनिया भर के टेस्ट्स दिए और एक दो जगह नंदिता ने क्लिक भी कर लिया। आल इंडिया लेवल था , भारत के किसी भी कोने में पटका जा सकता था।  और पटका गया बंगाल में।  नंदिता वैसे ही घुमक्कड़ प्रकार की थी, घर से जितने दूर पोस्टिंग मिलती उतनी रोमांचित हो जाती।  पर अभी उसने बंगाल का पानी नहीं पिया था।

और सब्र के जैसे बाँध उसने मोमिता के साथ रहकर तोड़े थे उससे कहीं ऊंचे और मज़बूत बाँध यहाँ आकर उससे तुड़वाये गए।  और बदले में उसने बंगालियों के सब्र के बाँध तोड़ दिए बांग्ला बोलने में।  ये उनके लिए एक चैलेंज की बात हो गयी थी नंदिता मैडम से बांग्ला बुलवाना ।  और सब एक एक करके फेल होते जा रहे थे। वो लोग ज़रूर खूब भालो हिंदी सीख लिए थे। ऑफिस का चपरासी भी ''मैडम चाय  खायेगा ? '' वाली हिंदी फ्लॉन्ट करने लगा था।

खैर , पिनाकी बाबू मैडम को पूजो की बधाई देकर रूम से बाहर निकलने लगे। इधर नंदिता मैडम का फ़ोन बजने लगा। दो तीन घंटियों बाद नंदिता ने फ़ोन उठाया।

''की बोल्छो तुमि ? कालके छुट्टी नेबे ? ....... ना बाबा कालके होबे ना कोनो रोकोम  …… कालके ऐशो, रोब्बारे निए नो.....ना होले तोमार मे के पाठी देबे कालके ठीकाछे ? ''

नंदिता मैडम कामवाली को कुछ समझा रही थी और पिनाकी बाबू दरवाजे पर खड़े सर खुजा रहे थे।







सोमवार, 8 सितंबर 2014

क्या बनोगे बुटरू




अलसायी सी सुबह थी। शुभा ने खिड़की से पर्दा हटाया तो रिमझिम फुहार में धुली हुई गार्डन की हरियाली से आँखें चौंधिया गयी। पर अभी ये सब निहारने का वक़्त नहीं था ।  नहा धोकर नाश्ता तैयार  करना था। रविवार का दिन घडी के कांटे पर सवार होकर आता  था , जिसमें हफ्ते भर की अस्तव्यस्तता को सहेजना भी होता था , बोरिंग दलिया से हटके  कुछ स्वादिष्ट नाश्ता भी तैयार करना होता था , और परिवार के साथ क्वालिटी टाइम भी बिताना होता था । आज का मेनू था गर्मागर्म पोहा और बुटरु  के मनपसंद फिंगर चिप्स।  ओफ्फो फिर भूल गयी ! बुटरू  नहीं, अच्छा खासा नाम है उसका, आरव ! कितनी बार पियूष उसे डाँट चुके थे इस बात पर, अब बेटा  बड़ा हो रहा है, कम से कम नाम तो अच्छा पुकारो कि  दोस्तों के सामने खिल्ली न उड़ जाए। एक बार गलत नाम उनकी ज़बान पे चढ़ गया तो फिर अपने बस से बाहर। पर शुभा को तो अपने चार साल के बेटे के लटके हुए गोल गोल गाल दीखते थे और जेहन से एक ही आवाज़ आती थी ,  बुटरू।

नाश्ता तैयार  था,  पियूष भी हफ्ते भर की सब्ज़ी लेकर मंडी से लौट चुके थे। आरव अपने कुछ पसंदीदा खिलौनों के साथ व्यस्त था। फिंगर चिप्स के लालच में दौड़ा चला आया।  शुभा ने भी चालाकी दिखाते हुए फिंगर चिप्स को पोहे के साथ मिला दिया। जितना पोहा उनमें चिपक जाएगा उतना तो कम से कम बुटरू के , ओफ़्फ़ो आरव के पेट में जाएगा।

घड़ी का काँटा बढ़ता जाता था और शुभा के माथे की शिकन भी।  एक एक पल कितना कीमती था । सप्ताह के बाकी दिन  तो मीना और राधा के भरोसे पूरा घर होता था। एक खाना पकाकर जाती , दूसरी घर का बाकी काम करने के साथ आरव को स्कूल बस से उतारकर खाना खिलाकर सुलाती थी।  रविवार को इस मशीनी ज़िन्दगी को ब्रेक मिलता था।

खैर, लगभग सब काम हो चुका  था।  वाशिंग मशीन चला दी थी, एक घंटे का टाइम सेट करके। अब उसके पास कुछ वक़्त था , आरव के साथ बिताने के लिए। पूरे हफ्ते दिनभर  माँ से दूर रहने वाला बच्चा रविवार को माँ को एक सेकंड के लिए नहीं छोड़ता था। नाश्ता करके वे दोनों आरव के रूम में चले गए। पियूष अखबार का पुलिंदा लेकर बाहर बरामदे में बैठ गए ।  शुभा ने अलमारी से एक ब्लैंक कलर बुक और क्रेयॉन निकाल लिए। कुछ हफ़्तों से यही रूटीन चला आ रहा था, वे दोनों पहले रंगों की दुनिया में डूबकर कुछ नए नक़्शे  ईजाद करते, फिर बुटरू के पसंदीदा खिलौनों से खेलते। मन के अंदर शुभा बेख़ौफ़ उसे बुटरू पुकारती थी, आखिर पियूष मन के अंदर तो नहीं झाँक सकते थे न।

शुभा उसे कुछ कुछ बनाकर दे देती और  बुटरू उनकी नक़ल करता रहता, और बीच बीच में बुटरू के हाथ कुछ इस तरह कलर बुक पर चलते जैसे रेत पर लहरें कुछ आकृतियाँ बना जाती हों।  ये देखकर शुभा  को लगता  कि शायद आगे जाकर बुटरू बड़ा आर्टिस्ट बनेगा, लेकिन फिर थोड़ी देर में वो बोर हो जाता और फिर उसके खिलौनों का पिटारा निकलता। दुनिया भर की कार , ट्रक, बस आदि एक लाइन से खिड़की में सज जाते। फिर कभी कार बस को ओवरटेक करती कभी ट्रक का पहिया गढ्ढे में फंस जाता। कभी टोल प्लाजा आ जाता और बुटरू हाथ बढ़ाकर किसी अदृश्य इंसान को अदृश्य पैसे   दे रहा होता। कभी किसी कार का पेट्रोल खत्म हो जाता और बुटरू उसे किसी पेट्रोल पंप में ले जाकर खड़ा कर देता। पियूष उन्हें अक्सर लॉन्ग ड्राइव पर ले जाते थे और वहीं से बुटरू ये सब सीखा था। ये सब देखकर शुभा को लगने लगता कि शायद आगे जाकर बुटरू को असली की कार रेसिंग में मज़ा आने लगे ,  लेकिन उस तरह का करियर तो दूर दूर तक किसी ने नहीं बनाया था, कार  रेसिंग में। तो फिर , शायद उसे कार के पुर्ज़ों में रूचि हो  जाए।  फिर तो उसे मैकेनिकल इंजीनियर बनाना ठीक रहेगा। हाँ अब सही पकड़ में आया , बुटरू को किस लाइन में डालना है।

शुभा ने बुटरू की और देखा, वो एक कार को ट्रक से ओवरटेक करवाने में मशगूल था।  शुभा ने हौले से पूछा , बेटा आप मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहते हो ? बुटरू  ने हैरत से उसे देखा, क्या  मम्मा क्या बनना चाहता ? शुभा ने फिर दोहराया, और इस बार बुटरू ने पकड़ लिया , ''हाँ मम्मा मैं मेककलएनेर बन सकता ।  ये अच्छा आईडिया है।  '' पता नहीं टीवी से या कहाँ से बुटरू ने हर बात के पीछे ''ये अच्छा आईडिया है'' बोलना सीख लिया था।

शुभा जानबूझकर बुटरू से ऐसे सवाल करती जिनका मतलब ही उसे पता न होता।  और फिर उसके नन्हे होठों से गोल गोल गालों के बीच गुजरती हुई और बड़ी बड़ी आँखों से सहमति देती हुई जो बातें निकलती उनसे शुभा का ह्रदय गद्गद  हो जाता।

फिर उसे याद आया, उसने तो और भी सपने  देखे थे बुटरू के लिए।  वो दोनों मिलकर वर्ल्ड टूर पर जाने वाले थे , नयी भाषाएँ , नए व्यंजन , नए  तरीके सीखने वाले थे।  पियूष के काम के प्रेशर को  देखकर लगता नहीं था कि उसे उनके सपनों में जगह मिलेगी ।

शुभा ने तो अभी से स्वैच्छिक सेवानिवृति का प्लान बना दिया  था, आखिर क्या करेंगे ज्यादा  पैसे कमाकर , बस बुटरू की पढ़ाई लिखाई हो जाए , अपने पैरों पर खड़ा हो जाए।  पर यहीं पर शुभा की गाडी अटक जाती थी, बुटरू को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाए ,  अब तक तो ऐसा कोई रुझान नहीं दिख पाया , थोड़ा थोड़ा सब कुछ एन्जॉय कर लेता था। पियूष शुभा की इस चिंता को सुनकर हंस देते थे, कहते थे चार साल के बच्चे की जान लोगी क्या? कुछ न कुछ कर ही लेगा , माँ बाप दोनों काबिल हैं, कुछ तो गुण आएँगे।

लेकिन शुभा उसे काबिल बनाने के लिए पढ़ाई की भट्टी में नहीं झोंकना चाहती थी , उसके  मासूम बचपन के दिन, किशोरावस्था के पंख लगाकर उड़ने के दिन , नए नए प्रयोग करने के , खुले आसमान को पतंगों से नापने के , साइकिल से नयी राहें तलाशने  के दिन , कहाँ से मिल पाएंगे ये दिन अगर सब लोगों की तरह उसे भी भविष्य की तैयारी के लिए अभी से ट्यूशन , कोचिंग वगैरह की भट्टी में झोंक दिया जाए।  शुभा और पियूष भी तो ऐसी ही भट्टी की तपी हुई ईंटें थे।  आज भले ही दोनों समाज में अच्छी स्थिति में थे , स्थापित थे , पर ज़रा सा पीछे मुड़कर देखते ही उन्हें महसूस होता  था कि इस मुकाम को पाने के लिए क्या क्या जाने अनजाने छूटता चला गया।

वे दोनों  मध्यम वर्ग की उपज थे जिनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था। जब दुनिया को देखने जानने की समझ आई तो खुद को ट्यूशन और कोचिंग से घिरा पाया।  अपनी हॉबीज़ के लिए वक़्त देना तो दूर उन्हें पता करने का भी वक़्त नहीं मिल पाया। वक़्त तब दिया जब कॉलेज जाकर पता चला कि हॉबीज़ होना ज़रूरी है, एम बी ए के इंटरव्यू में पूछा जाता है।

पर बुटरू के लिए शुभा के पास दूसरे प्लान थे। वो दूसरों की तरह बुटरू को ''मिस मौरिस '' के पास सुन्दर लिखावट और अच्छी इंग्लिश के लिए नहीं भेज पाती थी । चार साल के बच्चे हैं, ये भी कोई ट्यूशन जाने की उम्र है ?अब क्या छठी कक्षा से आई आई टी की कोचिंग शुरू करवा देंगे?  यही सोच सोचकर शुभा जितना भी वक़्त मिलता  उसे खुद ही कहानियां सुना सुना कर पढ़ाती रहती थी , और बुटरू भी बड़ी बड़ी आँखों से मम्मा की बात सुनता रहता और मम्मा को भी अपनी कहानियां सुनाता रहता। हँसते खेलते वो दर्जनों बातें सीख जाता , एफिल टावर से लेके इंडिया गेट, पेंगुइन से लेकर पांडा , सब  कुछ तो शुभा उसे इंटरनेट पर दिखा दिखाकर याद करवा देती।  एक बार गलती से डबल्यू टी सी पर हमले वाली वीडियो दिखा दी थी , तब से पीछे पड़ गया था , मम्मा एरोप्लेन  में आग कैसे लग गयी , बिल्डिंग नीचे क्यों गिर गयी ? ये एक नुक्सान था इंटरनेट का , बहुत संभलकर वीडियो दिखाने पड़ते थे , वैसे भी आड़े तिरछे विज्ञापन फुदकते रहते थे स्क्रीन पर , बिकिनी बालाओं के, शॉपिंग वेबसाइट के, और बुटरू  तैयार रहता था क्लिक करने के लिए।


''मम्मा देखो बारिश आई छम छम छम !'' हलकी हलकी फुहार गिरने लगी थी और बुटरू खिड़की से बाहर हाथ निकालकर बूंदों को छूने की कोशिश कर रहा था।  शुभा को याद आया कि पियूष को इस मौसम में चाय पीने का मन कर रहा होगा , इसलिए वो उठकर जाने लगी।  बुटरू पीछे से चिल्लाया ''कहाँ जा रहे हो मम्मा ?''
''आपके लिए दूध और पापा मम्मा  के लिए चाय बनाने। ''

''हाँ ये अच्छा आईडिया है , चलो मैं भी आपकी हेल्प कर देता हूँ। ''बुटरू भी पीछे पीछे चल पड़ा। हैल्प करने में बड़ा मज़ा आता था उसे, फिर भले ही उससे कथित हैल्प लेने के लिए माँ बाप को तरीके इज़ाद करने पड़ते थे।  चाय बनाने में बुटरू का रोल था चायपत्ती और चीनी के डब्बे  मम्मा को पकड़ाना। और इसके लिए शुभा को उसे गोदी में उठाना पड़ता था !

किचन में बुटरू शुभा को डब्बा पकड़ा रहा था और शुभा सोच रही थी , बहुत मेहनत लगेगी और बहुत हिम्मत भी , लेकिन बुटरू  को वो रेस में दौड़ता चूहा नहीं बनाएगी। अच्छी शिक्षा देगी , संस्कार देगी , और अंत में पूछेगी ''क्या बनोगे बुटरू ?''


बुधवार, 13 अगस्त 2014

सफ़रनामा- १


ट्रेन स्टेशन छोड़ने को बेताब थी,  और मैं था कि  अभी दौड़ ही रहा था, शाहरुख़ खान की तरह।  अंततः जब ट्रेन  को पकड़ा और सीट पर पहुंचा तो काजोल तो नहीं पर कजरारे नैनों वाले  दास साहब मेरा बेसब्री से वेट करते नज़र आये। और इसकी वजह जानने में मुझे दो  मिनट ज्यादा वक़्त नहीं लगा। दास जी को बोलने की बीमारी थी और उन्हें दूर दूर तक बोगी में कोई शिकार नहीं दिख रहा था।   मेरे नोवेल पढ़ते हुए इत्मीनान से पसर कर सफर पूरा करने के ख्वाब चूर होते नज़र आने लगे।

दास साहब ने एक सिरे से मुझसे गप्पें मारनी शुरू की और  दूसरे सिरे से मैंने छटपटाना। लगभग पंद्रह मिनट बाद मैंने खुद को एक भयंकर मोदी बहस में संलिप्त पाया। मोदी बहस की ख़ास बात ये होती है कि ये आर या पार वाली बहस होती है, बन्दा या फिर मोदी का अंधभक्त होता है या फिर जानी दुश्मन, और इस विषय पर बहस करना स्वास्थय के लिए अधिक लाभदायक नहीं होता , इसलिए थोड़ी देर में मैं मोबाइल पर फेक कॉल करने लगा, मानो मेरी फ्लाइट डिले हो गयी हो और कोई इम्पोर्टेन्ट मीटिंग मिस होने वाली हो। दास साहब शिद्दत से मेरी कॉल पूरी होने का इंतज़ार कर रहे थे ताकि फिर से मुझे उस बहस में घसीटें , पर मैं सतर्क था। इतने में एक स्टेशन आ गया और मेरी नए सहयात्री के लिए पुकार भगवान ने सुन ली।  बल्कि कुछ ज्यादा ही सुन ली, क्योंकि नए पैसेंजर जो  अधेड़ उम्र के थे उनकी पत्नी दूसरी बोगी में थी और आते ही इन्होने दास साहब से सीट बदलवाने की गुजारिश  कर डाली, जो दास साहब ने इस उम्मीद में स्वीकार कर ली कि शायद दूसरी बोगी में कोई उनकी टक्कर का फुरसतिया मिल जाए।
उसके बाद मैंने एक सेकंड की भी देर न करते हुए अपना बैकपैक उठाया और ऊपर वाली बर्थ में चला गया , क्योंकि नए सहयात्री का  भी कोई भरोसा नहीं था कब शुरू हो जाएँ , ट्रैन यात्रा अच्छे अच्छों  को दार्शनिक बना देती है।
इस तरह बम्बई से दिल्ली की यात्रा गाने सुनते और नावेल पढ़ते निकल गयी। नीचे उतरा तो अंकल आंटी मुझे शिकायत की दृष्टि से देख रहे थे मानो मैंने अपने सहयात्री होने का धर्म अच्छे से नहीं निभाया। मैं अनजान बनकर बाहर निकल गया।  एक पड़ाव पार हो चुका  था। पर सफर अभी और लम्बा था।

पिछले तीन महीनों से बड़े भाईसाहब फेसबुक पर फोटोज डाल डाल कर सबको जला रहे थे।  उनकी पोस्टिंग एक दूर दराज के पहाड़ी गाँव में हुई थी जहां एक छोटे से प्राइमरी स्कूल को वो  और एक अन्य टीचर  मिलकर संभाल रहे थे।  गाँव बहुत ही सुन्दर लोकेशन  पर था , उसी की फ़ोटोज़ खींच खींचकर भाईसाहब हमको जलाते रहते थे। जब मुझसे रहा न गया तो मैंने बैग पैक किया और निकल पड़ा, भैया के सुकून में खलल डालने।  भाभीजी और तीन  साल का भतीजा मम्मी पापा के साथ गौचर में उस घर में रहते थे जो रिटायरमेंट के बाद पापा ने बनवाया था। भैया  का गाँव सुन्दर भर था , और कोई खूबी नहीं थी , न हॉस्पिटल , न प्ले स्कूल। इसीलिए अकेले वहाँ डले हुए थे। पर नसीब अच्छा था कि बीएसएनएल का सिग्नल मिल जाता था सो इंटरनेट चल जाता था, जिसका परिणाम होता था फेसबुक पर जलाने वाली तसवीरें।

 खैर, दिल्ली में मुझे एक रात गुजारनी थी और मैं बम्बई से जो सोचकर निकला था वो ये था कि टिंकू के साथ रुक जाऊँगा। पर दिल्ली पहुंचकर याद आया कि टिंकू तो अपने भैया भाभी के साथ रहता था और उसके दो छोटे छोटे भतीजे भी थे।  मतलब किसी दूकान में रूककर चॉकलेट लेनी पड़ेगी।  फिर याद आया, मिक्की भी तो रहता था नोएडा में, अकेला। वो सही रहेगा।  मैंने मिक्की को शार्ट नोटिस दिया और उसके रिस्पांस से ऐसा लग रहा था मानो ऑफिस में जम्प कर  रहा है।  होता है , ज़िन्दगी इतनी पकेली हो गयी है कि पुराने यार दोस्त मिलने से उछलने कूदने का ही मन करता है। मिक्की स्कूल में मेरा लंगोटिया यार था , उसके बाद ऑरकुट के जरिये संपर्क हुआ दो साल पहले। अब मिलना भी हो जाएगा।

देर रात तक बात करते रहे। गप्पें खत्म ही नहीं होती थीं।  पर मिक्की का फ़ोन हर दो मिनट में पिंग पिंग हो रहा था , मतलब दूसरे  छोर वाला बन्दा या बन्दी अमूमन रात के बारह बजे नियमित रूप से उसके कॉल का इंतज़ार करता था। पर क्योंकि अभी इस रिश्ते का कोई नाम नहीं पड़ा महसूस होता था इसलिए मैं जम्हाइयां लेते हुए उसे शुभ रात्रि कहकर सो गया।  उसका रिएक्शन था  शर्म मिश्रित  मुस्कराहट।

अगली सुबह मैंने दिल्ली से हरिद्वार की बस पकड़ी।  बस वैसे ऋषिकेश तक जाती थी पर मैंने हरिद्वार तक का ही टिकट लिया, क्योंकि बस वाला एकाध घंटा हरिद्वार में रूककर आगे की सवारी भरता था। 

(ये पोस्ट किसी और की कहानी मेरी ज़ुबानी है, इससे आगे लिखने का काम उसको करना है।  देखें कब तक करता है !)


शनिवार, 5 अप्रैल 2014

अन्य कहानियां


मेरी अन्य कहानियां पाठकगण नीचे दिए लिंकों में जाकर पढ़ सकते हैं।

आज़ादी के लड्डू : http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2014/azadi.htm

बोस साहब और उनका घोड़ा : http://www.rachanakar.org/2014/04/blog-post_5576.html

 ढलते सूरज को सलाम : http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2014/dsks.htm

धन्यवाद। 

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

चिंटू जी का वॉकमैन

 चिंटू जी को गाना सुनने का बहुत शौक था।

उन दिनों आइपॉड नहीं हुआ करता था, और न ही मोबाइल।  गाना सुनना  हो तो या फिर रेडियो साथ लेके चलना पड़ता था या फिर पसंदीदा गाने सुनने हों तो एक छोटा सा वॉकमैन रखना पड़ता था। वॉकमैन भी अलग अलग साइज़ के आते थे। सस्ते वाले वॉकमैन थोडा बड़े होते थे और जेब में नहीं घुसते थे। अच्छी कंपनी के स्लीक वॉकमैन महंगे आते थे और मध्यम  वर्ग के बजट के बाहर होते थे। वही मध्यम वर्ग जिसे छोटे बड़े खर्चों के लिए बजट बनाना पड़ता था और अधिक ज़रुरत की चीज़ों के लिए कम ज़रुरत की चीज़ों पर कटौती करनी पड़ती थी। अब गाने सुनना तो कोई ज़रुरत की चीज़ होती नहीं, वो तो बस एक शौक होता था , वो भी खासकर युवा वर्ग का, जिसके पीछे पूरा खानदान पढाई करने और नौकरी ढूंढने के लिए पड़ा रहता था , और इसलिए उन्हें वॉकमैन सरीखी चीज़ देना इन लोगों के लिए एक भयावह सपना जैसा होता था। सिर्फ वही युवा जो बचपन से ही अपनी उद्दंड प्रवृति के कारण जाने जाते थे  और जिनसे बड़े बूढ़े भी खौफ खाते थे, अपनी जिद के बल पर वॉकमैन  खरीदने का दम रखते थे। और बाकी लोग  इनसे  वॉकमैन उधार लेकर अपने शौक पूरा किया करते थे।

चिंटू जी दूसरी जमात में आते थे। गानों का भयानक शौक था इन्हें, और आशिक़ी का खुमार भी।  उस पर कुमार सानू के विरह वाले गीत तो इनके आँसू टपका के ही छोड़ते थे। साँसों की ज़रुरत है जैसे ज़िन्दगी के लिए.. बस इक सनम चाहिए आशिक़ी के लिए।  लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि चिंटू जी कहीं दिल लगा बैठे थे , दिल साबुत था और चिंटू जी के पास ही था। लेकिन आमिर खान की फिल्में देखकर उनका भी मन करता था कि अब बस दुनिया जहां छोड़ दें और जंगल में जाकर एक कुल्हाड़ी से पेड़ काटना शुरू कर दें और उसकी लकड़ी से अपना घर भी बना लें और बची हुई लकड़ी बेचके महबूबा को पैसे भी पकड़ा दें घर चलाने के लिए। फिर याद आता था कि महबूबा तो है नहीं, इसलिए प्लान स्थगित हो जाता था। उन्हें मालूम था कि उनकी वर्तमान सेहत के चलते कोई ठीक ठाक महबूबा मिलने से रही , फूँक मारने से तो उड़ जाते थे वो। लेकिन रोमांटिक गाने सुनने के लिए तो इन सब की ज़रुरत नहीं थी , ज़रुरत थी तो सिर्फ एक वॉकमैन की। पर वो भी चिंटू जी को नसीब नहीं होता था , पापा ने बोला था बेटे जिस दिन क्लास में अव्वल आ जाओगे सबसे पहले तुम्हें वॉकमैन दिलवाऊंगा , पर यही काम तो चिंटू जी से नहीं हो पाता था।  भला ये कोई क्लास में अव्वल आने के उम्र थी! ये तो माधुरी के पोस्टर  लगाने, आशिक़ी के गाने सुनने की उम्र थी , कोई समझता ही नहीं था चिंटू जी को।

और इस तरह चिंटू जी को मनपसंद गाने  सुनने के लिए यहाँ वहाँ हाथ फैलाना पड़ता था।  उस पर भी दुनिया भर के नियम कायदे।  पड़ोस के मिक्की  के पास एक वॉकमैन था, सस्ता वाला पर कामचलाऊ, वहीं से बीच बीच में उठा लेते थे चिंटू जी।  लेकिन मिक्कीजी भी कम नहीं थे , एक बार ब्लैंक कैसेट पकड़ा दी थी मनपसंद गानों की  लिस्ट के साथ, भरवाने के लिए। भरवाने का खर्चा चिंटू जी का ! एक गाना डलवाने के डेढ़  रुपये लगते थे।  बीस रुपये की चपत। इतने में तो ''साजन''  की नयी कैसेट आ जाती, चिंटू जी सोच रहे थे। खैर, उस बहाने तीन दिन तक मिक्की  का वॉकमैन दबाके रखा चिंटू जी ने, या यूं कहें कि निचोड़ डाला।  जब लौटाने गया तो मिक्की ने चलाके देखी  , खर्र खर्र कर रहा था।  चिंटू जी भाग लिए थे। मिक्की ने चुपचाप नेल पोलिश रिमूवर निकाला और रुई में डुबाया।

इस तरह दिन कट रहे थे, कि एक दिन दूर के चाचाजी का फ़ोन आया।  उनकी इकलौती बेटी नीलम  की शादी थी।  शादी वादी में जाना चिंटू जी को कुछ समय से  पसंद नहीं आता था, जब से थोड़े बड़े हुए थे ।  घरवालों के  बजट के कारण  चिंटू जी को नए कपडे खरीदने के लिए पैसे नहीं मिलते थे।  दुल्हन की सहेलियों पर इम्प्रैशन भी नहीं जमा पाते थे चिंटू जी। इससे अच्छा तो न जाना बेहतर था।  और नीलम दीदी से भी उनका कोई ख़ास लगाव नहीं था। बचपन में खेलते थे, पर काफी वक़्त से मिले ही नहीं थे। चिंटू जी ने पापा को बोल दिया कि उन्हें पढाई करनी है , बोर्ड सर पर हैं , और इसलिए वो शादी में नहीं जा पाएंगे। मन ही मन सोच रहे थे कि थोडा खाली वक़्त और खाली घर मिलेगा तो यहाँ वहाँ पतंगबाज़ी करेंगे , पर इतने खुशकिस्मत कहाँ थे चिंटू जी। चाचाजी ने बोल के रखा था कि और कोई आये न आये चिंटू जी को तो ज़रूर आना है , अरे भाई दुल्हन के इकलौते भाई हैं वो ! सारी भाइयों वाली रस्में उन्हें ही तो पूरी करनी हैं।  अब तो कुछ नहीं हो सकता था। 

फिर अनायास ही चिंटू जी को कुछ याद आया। एक साल पहले जब नीलम दीदी के घर गए थे छुट्टियों में तो उन्होंने अपना नया वॉकमैन दिखाया था। वाह, कितना स्लीक था, फिलिप्स का, बजता था तो लगता था फूल झड़ रहे हैं।  चिंटू जी के 'पॉकेट टेस्ट ' में भी पास हो गया था।  सबसे छोटी जेब में घुस जाता था।  तो क्या नीलम दीदी उसे अपने साथ ससुराल ले जाएंगी ? छी छी , चाचाजी को तो बिलकुल पसंद नहीं आएगी ये बात।  बोलेंगे मायके में जितनी मनमानी करनी थी कर ली, अब ससुराल में मत शुरू हो जाना ये कान में लगाके।  एक संस्कारी बहू थोड़ी ऐसे गाने वाने सुनती है। पडोसी क्या बोलेंगे। और फिर चाचाजी नज़रें घुमाके देखेंगे तो परदे के पास चिंटू खड़ा दिखेगा और वो ख़ुशी से अपने हाथों से उस वॉकमैन को उसके अगले वारिस को सौंप देंगे। लो बेटा , नीलम के बाद अब तुम ही तो हमारा सहारा हो।  खयाली पुलाव लम्बे होते जा रहे थे।

और चिंटू जी शादी में जाने के लिए राज़ी हो गए , एक छोटी सी शर्त के साथ कि कम से कम शर्ट तो नयी खरीदवा दो , लड़की का इकलौता भाई अच्छा भी तो दिखना चाहिए।

चिंटू जी को अंदेशा भी नहीं था कि उन्होंने किस दलदल में ख़ुशी ख़ुशी पाँव रख दिए हैं।  दुल्हन के इकलौते भाई को सिर्फ रस्में थोड़ी निभानी होती थी , छगन हलवाई से हर दो दो घंटे में मिठाइयां लाना, फूलवाले से ताज़ा फूल लाना, बेसन नहीं है , घी ख़त्म हो गया , दिन में पचासों चक्कर चिंटूजी के नीलम दी की स्कूटी में लग जाते थे।  लड़की वाले थे, काम कभी ख़त्म ही नहीं होता था।  ऊपर से मेहमानों की आवभगत। उफ्फ़ , थक जाते थे चिंटू जी।  नन्ही सी जान थे। लेकिन दिल में जो अरमान लिए इतनी दूर चले आये थे , उसके बारे में सोचते ही रिफ्रेश हो जाते थे और स्कूटी लेके उड़ने लगते थे।

और फिर  रस्में शुरू हुईं ।  चिंटू जी को नीलम दीदी  को गोद में लेके यहाँ से वहाँ रखना पड़ता था।  चालीस किलो के चिंटू जी और पैंसठ किलो की नीलम दीदी। फिर पंडितजी ने हालात की गम्भीरता को समझते हुए चिंटू जी को बोला कि आप बस दुल्हन को पकड़के रखिये, उठाने की ज़रुरत नहीं, भाई का हाथ लगना ही काफी है। लम्बी सांस छोड़ी चिंटू जी ने।

नयी शर्ट पहनके चिंटू जी पाँव ज़मीन पर नहीं रख पा रहे थे। उन्हें लगता कि सब उन्हें ही देख रहे हैं, और सबको लगता कि किसी हैंगर पर शर्ट डाल दी गयी है । और जब  बरात आयी तो जी हर उस जगह पहुँचे जहां टी आर पी  बढ़ाने का स्कोप था। ऐसा लग रहा था मानो पूरी शादी चिंटूजी के कन्धों से होके गुज़र रही है। दूल्हा दुल्हन हों न हों , विडियो कैमरे के सामने चिंटूजी ज़रूर दिखते थे, पसीना पोंछते हुए , गम्भीर मुद्रा में।

और फिर चिंटू जी की नज़र दूल्हे की बहन रुचिका पर ठहर गयी ।  चिंटू जी का मानना था कि बाकी लोग तो नीलम दी की ससुराल से आये होंगे पर रुचिका सीधी जन्नत से आयी है। अब तो बिना वॉकमैन के चिंटू जी के कानों में कुमार सानू के गाने बजने लगे थे।

मैं दुनिया भुला दूंगा आ आ आ तेरी चाहत में।

 तेरे दर पर सनम, चले आये एएएएए ।

लेकिन चिंटू जी ने इन सबके बीच अपना लक्ष्य नहीं  भुलाया था। उनकी नज़रें लगातार वॉकमैन को ढूंढती रहती थीं , जो किसी कारणवश दिख नहीं रहा था।  अब चिंटू जी चिंतित हो गए थे।  सोच रहे थे किसी न किसी तरह से तो मुद्दा उठाना पड़ेगा वॉकमैन के अगले वारिस का।

और फिर जब नीलम दीदी की विदाई का वक़्त हुआ तो चिंटू जी को पता चला कि उन्हें भी दीदी के साथ ससुराल लखनऊ जाना है।  लड़की का भाई शादी के वक़्त लड़की के साथ जाता है और बहन को ठीक ठाक ससुराल में जमाके वापस आता है।  चिंटू जी की जिम्मेदारियां ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थीं , लेकिन वे मन ही मन खुश थे , एक तो रुचिका को और देखने का मौका मिलेगा, और दूसरा वॉकमैन के बारे में बात करने का बहाना मिलेगा। नीलम दी को थोडा देर अकेला देखकर चुपके से उनके पास पहुंचे।

''दीदी मुझे तो आपके साथ लखनऊ आना है न ?"'
''हाँ चिंटू , तू मेरा भाई है न इसलिए । वैसे मैंने मना किया था कि ज़रुरत नहीं है तेरे स्कूल चल रहे होंगे तुझे लेट हो लाएगा पर कोई मेरी  सुनता ही नहीं !''
''अरे दीदी कैसी बात करती हो आपका भाई हूँ मैं , इतना हक़ भी नहीं मेरा आप पर!''
''थैंक्स चिंटू। '' दी खुश हो गयी थी।
''वैसे दीदी, मैं सोच रहा था , मैं तो वहाँ बोर हो जाउंगा, किसी को जानता भी नहीं न , और आप तो बिजी रहोगी, तो इसलिए आपका वो वॉकमेन था न , वो कुछ समय के लिए मैं ले सकता हूँ ?'
'' अरे ये भी कोई पूछने की बात है , बिलकुल रख लेना।  वहाँ अलमारी में रखा है , कैसेट भी रख लेना अपनी पसंद की। ''

पहला पड़ाव पार हो चुका  था।  लेकिन वहाँ जाकर तो दी को वापस करना पड़ेगा। शायद उनका दिल पिघल जाए।  कम से कम वॉकमैन की बात तो छिड़ ही गयी थी।

और चिंटू जी  ने पूरे रास्ते वॉकमैन के मज़े लिए।  बोल राधा बोल, सड़क, और भी कुछ कुछ कैसेट ले आये थे ।  रिचार्ज वाली बैटरी थी।

लेकिन ये ख़ुशी ज्यादा देर नहीं चली। लखनऊ पहुँचते ही रुचिका ने चिंटू जी के इर्द गिर्द मंडराना शुरू कर दिया था , मौका देखते ही पूछ लिया।
''चिंटू भइया , ये  वॉकमैन कितना प्यारा है , आपका है क्या ? मैं थोड़ी देर के लिए ले सकती हूँ ?''

चिंटू जी का दिल टूट चूका था। ''रुचिका जी ये वॉकमैन हमारा नहीं, आपकी भाभी का है। '' सच तो बोलना ही था।
''अरे वाह ! भाभीजी का मतलब हमारा ! मैं भी भाभीजी को बोलके आती हूँ कि चिंटू भइया के जाने के बाद ये हम  ले लेंगे ! आखिर इतना हक़ तो बनता है हमारा !''

चिंटू जी निराश से खड़े थे, वॉकमैन भी हाथ से निकल चुका  था और जन्नत की परी भी उन्हें भइया बना चुकी थी। 

और चिंटू जी नीलम दीदी के साथ दो दिन बिताके वापस निकलने लगे। ट्रेन आयी और वो अपनी बर्थ में बैठ गए।

ट्रेन  चल पड़ी थी। चिंटू जी सोच रहे थे , खाली हाथ आये थे खाली हाथ जा रहे हैं। अगली बार इन सब चक्करों में नहीं पड़ेंगे ।  अरे , बोर्ड की परीक्षा आ रही है भाई , मज़ाक है क्या ?

प्यास लग आयी थी ।  चिंटू जी ने पानी पीने के लिए बैग खोला। अंदर नीलम दीदी का वॉकमैन आराम फरमा रहा था , और साथ में एक कागज़।

''चिंटू भइया  , हमारी प्यारी भाभीजी ने हमें एक नया वॉकमैन दिया है तोहफे में , शायद उन्हें हमारी पसंद पहले से पता थी। अब ये वॉकमैन आपका हुआ !''

चिंटू जी की आँखें भर आयी थीं । उन्होंने इयरफोन कान में लगाया और यलगार की कैसेट डाल  दी।

सोमवार, 27 जनवरी 2014

राशि


राशि नाम था  उसका। और शौक था सबको राशिफल सुनाना।

 इसी साल अप्रैल में उसकी सगाई हुई थी अर्नब  के साथ। सगाई  क्या, पूरी दौड़भाग थी।  दोनों अलग अलग जात बिरादरी के थे, ऊपर से प्रांत  भी अलग। राशि गुजरात  से तो अर्नब बंगाल से।  प्रीमियर संस्थान से एम बी ए की पढाई कर  रहे थे , बड़ी मुश्किल से फाइनल की परीक्षा के बाद वक़्त निकाल पाये थे अपनी सगाई के लिए।  शादी की तारीख तो क्या वर्ष का कोई अता  पता नहीं था , दोनों को पहले अपने कैरियर पर ध्यान देना  था।  कैंपस सिलेक्शन तो हो गया था पर मंदी की मार अभी थमी नहीं थी।  कम से कम दो साल तो लगने ही थे कैरियर को ठीक ठाक आकार देने को। इसलिए सगाई करके रख दी थी।

उनका कॉलेज अहमदाबाद में था, और वहीं राशि का घर भी ।  पढ़ाई के दौरान अक्सर अर्नब सॅटॅलाइट रोड में राशि के घर जाया करता था , पहले क्लासमेट की हैसियत से, फिर दोस्त , फिर अच्छा दोस्त। राशि के माता पिता यूं तो जात बिरादरी में रिश्ता करने के पक्षधर थे, पर राशि के इतने बड़े कॉलेज में दाखिले के बाद उन्होंने किसी भी स्थिति का सामना करने का मन बना लिया था। आखिर उनकी बिरादरी में राशि के बराबर या उससे अच्छे लड़के तो मिलने से रहे। अब तो पूरा भारत उन्हें अपनी ही बिरादरी का लगता था। राशि के अनेक सहपाठी जो देश के कोने कोने से आये होते थे, अक्सर उसके घर आ जाया करते थे।  राशि का घर अहमदाबाद में होने के बावजूद उसे हॉस्टल में रहना पड़ता था , बीच बीच में वक़्त निकालके घर आती रहती थी।  पर नवरात्रि हो या उत्तरायण , राशि और उसके दुनिया भर के दोस्त उसके घर धमक जाते थे। आंटी के हाथ का ऊंधीयू और अंकल के साथ पतंगबाजी का मजा ही कुछ और था। कई लड़के तो सिर्फ राशि से एक साल छोटी बहन के दर्शन करने आते थे जो कॉलेज के साथ साथ मॉडलिंग में हाथ आजमा रही थी और अक्सर रैंप शोज में दिख जाती थी।

धीरे धीरे राशि के मम्मी पापा को समझ आ गया था कि बाकी दोस्तों में से अर्नब कुछ ख़ास है।  और फाइनल इयर आते आते दोनों ने अपने अपने घर बात कर ली। दोनों घरवालों को कोई ख़ास दिक्कत नहीं थी, सिवाय इसके कि रोज़ माछ भात खाने वाले अर्नब  के घरवालों के बीच शुद्ध शाकाहारी राशि कैसे  एडजस्ट कर पायेगी! अर्नब के पापा ने तो बड़ी मासूमियत से बोला था, ओरे बाबा फिश तो ''भेज''होता है, नॉनभेज तो मोटोन होता है !  राशि के पापा थोडा घबरा गए थे पर राशि ने इशारे से समझा दिया था।

 हालांकि अर्नब बारहवीं के बाद घर से दूर रहने के कारण अब तक घाट घाट का पानी पी चुका  था और उसकी ज़िन्दगी में और भी तरह के आहार जुड़ चुके थे, इसलिए ये कोई ख़ास चिंता की बात नहीं थी।

सगाई के बाद दोनों अपने अपने शहर चले गए।  अर्नब को मुम्बई की एक कंपनी में अच्छी खासी नौकरी मिली थी और राशि को बंगलौर में। दोनों को फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिखता था शादी करके एक साथ रहने का , बस मेहनत किये जाते थे, वही उनके हाथ में था।

एक साल गुजर गया , और ज़िन्दगी के अगले लक्ष्य के बारे में सोचने का वक़्त आ गया।  उनके अनेक क्लासमेट्स ने दूसरी कम्पनियों में अवसर तलाशने शुरू कर दिए थे , इससे उनका पैकेज थोडा बढ़ता रहता था , एक ही कंपनी में पड़े रहने से भाव कम होना शुरू हो जाता था, और फिर यही वक़्त तो था जोर शोर से आगे बढ़ने का , फिर तो शादी करके एक जगह बैठना ही था।

लेकिन पिछले एक साल के अनुभव से अर्नब और उसके अधिकाँश दोस्तों को एक चीज़ परेशान करने लगी थी। समस्या ये थी कि उनका पैकेज तो निस्संदेह आकर्षक था , पर जितना वक़्त और दिमाग वो लोग अपनी नौकरियों में लगा रहे थे और जितना मुनाफा करके अपनी कम्पनियों के मालिकों को दे रहे थे , उस हिसाब से उनकी आय कुछ भी नहीं थी।  आने वाले दिनों में इस सीमित आय के साथ दुनिया भर के लोन्स की किश्तें जुड़ने वाली थीं।  खर्चों की कोई सीमा नहीं थी , लेकिन आय की बढ़ोत्तरी की एक सीमा थी। उनकी जीतोड़ मेहनत  के बल पर उनको तो चार छ परसेंट इन्क्रीमेंट मिलता था पर उनकी कम्पनियों के मालिक अमीर होते जाते थे,। मालिक जो अधिकाँश स्नातक भी नहीं होते थे, बस पुश्तैनी कम्पनियां चला रहे थे ! वो तो इतना पढ़ लिख के बस सफ़ेद  कालर वाले मजदूर बनके रह गए थे। कई बार तो मीटिंग्स के दौरान ये मालिक लोग उन्हें ऐसी ऐसी बातों पर हड़का देते थे जो वास्तव में उन कम पढ़े मालिकों की सीमित  समझ से बाहर होती थी। फिर इन लोगों को समझ में आता था कि शायद भैंस के आगे बीन बजा दी गयी है।

अर्नब सोच रहा था , शायद वक़्त आ गया था मजदूर से मालिक बनने का। अपनी प्रतिभा पर उसे कोई शक नहीं था , शक था तो अपनी किस्मत पर। अगर सिर्फ मेहनत करके लोग बड़े बिज़नेसमैन बन जाते तो
बात ही क्या थी।  निस्संदेह किस्मत एक बड़ा फैक्टर थी, एक नयी राह पर आगे बढ़कर सफलता पाने के लिए।

अर्नब और उसके मुम्बई के  दो दोस्तों ने मिलकर सोचा कि उन्हें एक बार रिस्क तो लेना चाहिए।  अगर सही राह मिल गयी तो चलने में क्या हर्ज़ है , कम से कम एक मौका तो दे ही सकते हैं ज़िन्दगी को। उसके बाद तो फिर शादी और बच्चे, फिर थोड़ी ये सब कर पाएंगे। और अगर किस्मत खराब भी निकली तो देर सवेर दूसरी नौकरी तो मिल ही जायेगी, बस  पैकेज थोडा इधर उधर हो जायेगा। प्रीमियर कॉलेज से एम बी ए करने का यही  तो फायदा था। भूखे तो नहीं मरेंगे।

अर्नब को चिंता थी तो राशि की। उसके घरवाले उनकी जल्द शादी करवाना चाहते थे। उनकी चिंता भी जायज थी , सगाई और शादी के बीच का वक़्त बहुत लम्बा भी नहीं होना चाहिए।  पर अर्नब जिस राह पर चलना चाहता था उसमें उसे थोडा वक़्त चाहिए  था अपने आपको स्थापित करने का। उसने राशि से बात की और अपनी इच्छा जाहिर की। राशि खुद इस दौर से गुजर रही थी और ये चीज़ समझ सकती थी। उसे भी अर्नब की प्रतिभा पर पूरा भरोसा था। उसने अर्नब को आश्वासन दिया कि वो अपने घरवालों को समझा लेगी और वो लोग उसे पर्याप्त वक़्त देंगे अपने कैरियर पर ध्यान देने का।  ये सुनकर अर्नब को बहुत अच्छा लगा था।

बस फिर क्या था।  तीनो दोस्तों ने मिलकर सम्भावनाएं तलाशनी शुरू कर दीं। कुछ ही वक़्त में उन्होंने एक नयी कंपनी की नींव डाल  दी और अपने पुराने संपर्कों के ज़रिये छोटा मोटा काम तलाशना शुरू कर दिया। अर्नब के दिल में अब भी एक डर  रहता था कि इतनी मेहनत के बाद अगर किस्मत ने साथ नहीं दिया तो फिर क्या होगा।  कंपनी की नौकरी वो छोड़ चुका  था।  इतना बड़ा रिस्क लेकर उसने न सिर्फ अपनी बल्कि राशि की ज़िन्दगी को भी अधर में डाल दिया था।  क्या ये बेहतर नहीं होता कि वो बंगलौर में दूसरी नौकरी  ढूंढ लेता और वो दोनों हंसी ख़ुशी  साथ रहते।  दो लोगों की आय क्या कम होती घर चलाने के लिए? पर बात सिर्फ इसकी नहीं थी , बात थी अपनी प्रतिभा को उचित अवसर देने की।  और संयोग से राशि ये बात समझती थी।

अर्नब की नयी कंपनी को छोटे मोटे काम मिलने शुरू हुए।  वो लोग काफी उत्साहित थे। जी जान से काम करते थे।  छोटी छोटी बातों पर पूरा ध्यान देते थे। क्लाइंट्स उनके काम से खुश भी हुए थे और ज्यादा काम देने का आश्वासन भी दिया था।  पर हफ़्तों से महीने गुजर जाते और उन्हें यही छोटे मोटे प्रोजेक्ट्स  मिलते रहते।  बड़ा काम मिलने का  बस आश्वासन मिलता था।  अर्नब और उसके दोस्तों ने उत्साह नहीं छोड़ा था , वो लोग जानते थे सफल होना इतना आसान नहीं। पीछे पड़े रहना पड़ता है तब जाकर एक स्वर्णिम मौका मिलता है। इसलिए वो लोग लगे रहते थे।  हाँ लेकिंन अब पैसों की चिंता सताने लगी थी।  अभी उनकी आय इतनी नहीं हुई थी कि शादी करके घर बसाया जा सके। अर्नब के दिल में जो किस्मत का खौफ था वो अब सामने आने लगा था। अगर किस्मत ने साथ नहीं दिया तो? क्या राशि के मम्मी पापा खुश होंगे अपनी बेटी का हाथ उसके हाथ में देकर जो फिलहाल उससे आधा भी नहीं कमा पा रहा था।  कैसे खुश रख पायेगा वो राशि को?

उसकी ये चिंता बातों बातों में राशि तक भी पहुँचने लगी , और तब राशि ने स्थिति को संभालकर अर्नब का हौसला बढ़ाना शुरू किया। जिस दिन उसकी किसी बड़े क्लाइंट से मीटिंग होती उससे पहले राशि उसे उसका साप्ताहिक भविष्यफल पढ़के सुनाती। आपके प्रयास सफल होंगे , वरिष्ठ अधिकारियों के बीच ख्याति बढ़ेगी , नए अवसर मिलेंगे। ये सब सुनके अर्नब को अपनी किस्मत पर यकीन होने लगता और वो दुगुने उत्साह से काम पर जाता। ये सिलसिला चलता रहता और राशि के साप्ताहिक भविष्यफल अर्नब के लिए उम्मीद की नयी किरण लेकर आते। भले ही बाद में अधिकाँश बातें गलत निकलती पर मन के किसी कोने में अर्नब को अब अपनी किस्मत पर यकीन सा होने लगा था , लगता था कि प्रयास करते रहेंगे तो आज नहीं तो कल किस्मत एक मौका ज़रूर देगी। 

एक  साल बीत गया , और अर्नब को थोड़े बेहतर प्रोजेक्ट्स  मिलने शुरू हुए। राशि के प्रोत्साहन और साप्ताहिक राशिफलों की बदौलत अब अर्नब की कंपनी ने एक पहचान  बना ली थी , मार्किट में उनका नाम हो गया था।  हालांकि कोई बड़ा काम अब तक नहीं मिला था।  लेकिन अब अर्नब ने फैसला कर लिया था कि राशि को अधिक देर तक इंतज़ार नहीं करवाएगा।  अब उसकी कंपनी से ठीक ठाक आमदनी हो जाती थी । उसने राशि से अपनी शादी की तारीख  निकलवाने को कहा।  राशि बहुत खुश थी। उसने घर पर ये बात बतायी और दोनों के परिवार वालों ने मिलकर अगले महीने की  एक तारीख  तय कर दी। वक़्त बहुत कम था , कार्ड्स छपने थे, बाँटने थे , शौपिंग करनी थी।  राशि एक सप्ताह पहले छुट्टी लेकर घर आ गयी।

रविवार  का दिन था। दोनों की फ़ोन पर लम्बी बातों का दिन।
"क्या कहती है मेरी राशि इस हफ्ते ?   बोर हो रहा था सोचा यही पता कर लूं। ""
" हा हा, मज़ाक उड़ा  रहे हो मेरे राशिफलों का !""
"नहीं नहीं , तुम्हारे राशिफलों की बदौलत ही तो आज तुमसे शादी करने की हालत में हूँ , वरना  किस्मत से तो यकीन ही उठता जा रहा था। ""
""अच्छा ? वैसे इस हफ्ते लिखा है नए आयाम खुलेंगे !""
""कौन सी दिशा में खुलेंगे ये लिखा है ? वैसे भी शादी करके तो खुल ही रहे हैं आयाम !"
"और क्या! ये कोई छोटा आयाम है ! अगले हफ्ते तुम मेरे दरवाजे पर दस्तक दे रहे होंगे। "
"वो तो अभी भी दे रहा हूँ। ""
''मतलब?''
''मतलब दरवाजा खोलो , कब से बजा रहा हूँ पर तुम हो कि फ़ोन पर लगी हुई हो !"'
राशि को कुछ समझ नहीं आ रहा था।  तब तक उसकी मम्मी ने दरवाजा  खोला। सामने अर्नब खड़ा था। मम्मी के पैर छूकर अंदर आ गया।

""सब ठीक तो है बेटा ? आप अचानक यहाँ ? राशि ने भी नहीं बताया मुझे। ""

''राशि को खुद नहीं पता था ! सरप्राइज है मम्मीजी !""
''ओहो! तुम बैठो राशि  के साथ मैं पानी लेके आती हूँ।''
''नहीं आंटी पानी वानी बाद में । पहले आशीर्वाद दीजिये। आपके बेटी की भविष्यवाणियां अब जाकर सच हुई हैं ! बड़ा काम मिल गया है हमें , पूरे पांच करोड़ का !""
''सच! वाह बेटे ये तो बहुत ख़ुशी की बात है , है न राशि ? मैं मिठाई लेके आती हूँ और तुम्हारे पापा को भी बताती हूँ , छत पर गए हैं पतंग उड़ाने!''
''अंकल नहीं सुधरेंगे ! रिटायरमेंट के मजे ले रहे हैं !"'
आंटी हँसते हुए अंदर चली गयी।

 राशि अब भी मुंह खोलकर खड़ी  थी। न तो अपनी आँखों पर विश्वास होता था न कानों से सुनी बात पर।अर्नब उसे देखकर हँस रहा था।

''मैडम मैं ये खबर सुनाने के लिए पहली फ्लाइट लेके अहमदाबाद आया हूँ और आप हैं कि। ''
राशि को होश आया , अर्नब को अपने कमरे में लेके गयी और चेयर  पर बिठाया।

''तुम सच बोल रहे हो ? पाँच करोड़ का प्रोजेक्ट ? ""
''हाँ ! कल ही टेंडर खुला  था पर मैंने सोचा फ़ोन के बदले यहाँ आकर तुम्हें बताऊँ।  इतनी बड़ी खबर है , तुम्हारा रिएक्शन देखना था।''
राशि चेयर पर बैठी रो रही थी , ज्यादा ख़ुशी भी सम्भाली नहीं जाती थी। अर्नब ने उठाया और गले लगा लिया।

अंकल शायद छत से आ गए थे। आवाज आ रही थी। दोनों बाहर आ गए ।  आंटी ने चाय भी बना दी थी। मिठाइयों की प्लेट उनका इंतज़ार कर रही थी।  अर्नब ने अंकल का भी आशीर्वाद लिया। सब लोग हंसी ख़ुशी बातें कर रहे थे। समधियों को भी फ़ोन से बधाई का आदान प्रदान हो गया।

''वैसे राशि तुम कौन से अखबार से पढ़कर मेरा राशिफल बता रही थी ज़रा दिखाओ तो ?''

राशि इधर उधर देख रही थी मानो कुछ ढूंढ रही हो । राशि की मम्मी को हँसी आ गयी।
''कुछ होगा तो दिखाएगी न ! ''
''मतलब मम्मीजी  ?''
''मतलब बेटा ये अपने मन से कुछ भी बोलती रहती है , कोई अखबार नहीं होता इसके हाथ में! मुझे तो लगता है इसे अब तक तुम्हारी राशि भी नहीं पता , ज़रा पूछो तो इससे !''
अर्नब राशि को देख रहा था , ''हाँ ज़रा बताओ तो मेरी राशि कौन सी है ? तुम्हें मालूम तो है न ?''

राशि हँसने  लगी , '' मैं ही तो हूँ तुम्हारी राशि!''

अर्नब के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान तैर गयी।

बुधवार, 8 जनवरी 2014

छाता


"पार्लर पूछ रही हूँ यार , नाई  की  दुकान नहीं ! ""
""हाँ तो पार्लर ही बता रही हूँ। सब उसी के पास जाते हैं।  "
""अच्छा ? मतलब लड़का थ्रेडिंग करेगा , फेशियल करेगा ?""
""हाँ और  बहुत अच्छा करता है, एक बार चली जाना, खुद देख लेना। जस्सू भी  वहीं जाती है। ""

अंजू जल्दी से निकल गयी, ऑफिस थोडा दूर था, बस पकड़नी पड़ती थी ।  पर मीनू को अब तक उसका कहा  हजम नहीं हो रहा था, बड़े शहरों में तो सुना था , बम्बई दिल्ली में, पर  इस छोटे से शहर में भी लड़के ब्यूटी पार्लर चला रहे हैं, और लडकियां जा भी रही हैं उनके पास। वाह!

मीनू चाय लेने  ऊपर मकानमालकिन आंटी के घर चली गयी।  सुबह सुबह सात बजे एक वही उठकर चाय पीती थी, और सब लडकियां बिस्तर में घुसी रहती थीं। उनका काम भी क्या था , मस्ती करने आयी थीं।  आस पास के छोटे बड़े कस्बों से आयी थीं। निकिता एयर होस्टेस का कोर्स कर रही थी, जसमीत उर्फ़ जस्सू इंग्लिश बोलने चालने  का कोर्स करने, एन आर आई के साथ शादी होनी थी एक दो महीने में। पूनम प्राइवेट से एम् ए  कर रही थी, साथ में कंप्यूटर क्लास जाती थी ।  इन सबको क्या करना था जल्दी उठकर।  आराम से गप्पें मारते हुए उठते थे , पूरा दिन मस्ती करते थे, नयी नयी नेल पोलिश लगाते थे , बालों में नए नए कलर करते थे , पैसों की भी कमी नहीं थी और वक़्त की भी नहीं।  लेकिन मीनू के पास थी, दोनों की। इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर थी, साथ में आगे की पढाई के लिए तैयारी कर रही थी। पर तैयारी हो नहीं पाती थी , छोटे से दो कमरों के घर में जगह ही नहीं मिलती थी शान्ति से पढ़ने के लिए। 

आंटी बाहर बरामदे में बैठकर चाय पी रही थी , मीनू किचन से चाय लेकर आंटी के साथ बैठ गयी। 

""बहुत ठण्ड है बेटा , अच्छे से रहा करो कान बांधकर। ""
""हाँ आंटी , टाइम ही नहीं मिलता बाज़ार जाकर स्कार्फ़ लाने का। अचानक से ठण्ड बढ़ गयी। ""
""आज ले आना। अपने लिए टाइम निकाला करो, तुम ठीक रहोगे तब तो  बाकियों को ठीक रख पाओगे   ""
""बात तो सही है आंटी।  ""
मीनू को आंटी के साथ बैठना अच्छा लगता था, बहुत हिम्मतवाली थी आंटी।  उनके पति उन्हें छोड़कर गाँव रहते थे , बेटा नाकारा सा घर में बैठा रहता था , बहू रूठकर मायके में बैठ गयी थी ।  बेटी की शादी हुई थी पर कुछ मानसिक समस्या के कारण पति ने उसे यहाँ छोड़ दिया था। नीचे के दो कमरों से मिलने वाले किराए से घर चलता था ।  लेकिन इतने बड़े समस्याओं के पोटले को सर पर ढोकर  आंटी के मुंह पर शिकन तक नहीं आती थी। मुस्कुराती रहती थीं, और नसीहतें देती रहती थीं। बस यही कारण था कि मीनू अक्सर आंटी के साथ बैठ जाया करती थी। आंटी भी उसके साथ अपने सुख दुःख बांटती थी , बाकी सब लड़कियों में एक वही तो थी जो आंटी की बात समझ सकती थी।  संघर्ष चाहे जैसा भी हो, दो संघर्षरत व्यक्ति देर सवेर दोस्त बन ही जाते थे।

""अच्छा आंटी  आपने बिजली वाले को बुलाया आज?""
""बिजली वाला? क्यों बेटा ?"" आंटी फिर भूल गयी थीं ।
""वो मैंने बोला था न आपको, वो छोटा वाला कमरा जो हमारे कमरे से लगा हुआ है , वहाँ लाइट लग जाती तो मुझे थोडा अलग बैठकर पढ़ने की जगह मिल जाती।  "" मीनू बहुत दिनों से आंटी को बोल रही थी इस बारे में।  उनके कमरे के साथ एक छोटा सा कमरा लगा हुआ था जो अभी स्टोर रूम की तरह इस्तेमाल होता था।  उसमें थोड़ी सी जगह थी बैठने की। वहीं बैठकर मीनू शांति से पढ़ना चाहती थी।  मीनू ने बोला भी था कि बिजली लगाने का जो खर्च होगा वो दे देगी, पर आंटी पता नहीं क्यों टाल रही थीं।
""ओहो बेटा मैं रोज भूल जाती हूँ।  आज पक्का बुला दूँगी। मुझे मालूम है तुझे पढ़ना है बेटा। ""
""ठीक है आंटी, मैं चलती हूँ।  ""चाय ख़त्म हो गयी थी।

नीचे आकर मीनू जल्दी से तैयार हुई, रात में बनाये लेक्चर के नोट्स पर नज़र डाली, थोडा बहुत बदलाव किया , फिर नहाने घुस गयी।  देर हो रही थी , बस पकड़नी थी। बस स्टॉप जाने  में ही दस मिनट लग जाते थे। 

तैयार होकर निकली तो देखा बारिश शुरू हो गयी थी, पर अब कुछ नहीं हो सकता था, उसका पुराना छाता पिछले साल टूट गया था। मौसम की दूसरी बरसात थी।  कल भी मीनू भीग गयी थी पर बाज़ार जाकर नया छाता लाने का वक़्त ही नहीं मिला।  आज फिर भीगना था। आज तो किसी भी हालत में बाज़ार जाना ही पड़ेगा, मीनू सोच रही थी।

कॉलेज पहुँचते पहुँचते मीनू बुरी तरह भीग चुकी थी , और  सबसे बड़ी समस्या ये थी कि पहला लेक्चर उसी का था।  इस हालत में फाइनल इयर की क्लास लेना मतलब लड़कों की गन्दी फब्तियां झेलना जो उनकी फुसफुसाहट से समझ आ जाती थी। मीनू का दिमाग तेज़ चल रहा था , किसी तरह पहला लेक्चर टल जाता।  फिर उसकी नज़र अमन पर पड़ी।
""अरे अमन तुम बैठे हो, लेक्चर नहीं जा रहे ? ""
""नहीं मेरा पहला  लेक्चर फ्री है।  ""
""और दूसरा कौन सी क्लास में है ?"
""फाइनल इयर में, क्यों ?""

मीनू ने राहत की सांस ली । अमन अपने सब लेक्चर अच्छे से तैयार करके आता था।  कुछ दिनों से वो दोनों साथ में काफी वक़्त बिताते थे, खाली लेक्चर्स में , लंच में। एक अपनापन सा महसूस होने लगा था उसके साथ ।  इतनी सी मदद के लिए तो वो पूछ ही सकती थी।

""असल में मेरा पहला लेक्चर है पर मैं इतनी भीग गयी हूँ कि.""
""हाँ भीग तो तुम गयी हो, आज शाम को छाता ज़रूर ले लेना। अपने लिए वक़्त निकाला करो।  ""
""हाँ पक्का ले लूंगी पर अभी तुम थोड़ी हेल्प कर दोगे प्लीज? पहला लेक्चर तुम ले लोगे?""
कुछ पल का मौन।
""आई एम्  सॉरी मीनू, कल मैं लेक्चर की तैयारी कर नहीं पाया , अभी बैठकर वही कर रहा था। मैं पहला लेक्चर नहीं ले पाउँगा।  ""

मीनू सोच रही थी , क्या हो गया आज कल के लड़कों को, ऐसी हालत देखकर भी दिल नहीं पसीजता, दया नहीं आती।  लेकिन  गलती तो उसी की थी , क्यों नहीं ले लिया अपने लिए छाता जब कल से बारिश शुरू हो गयी थी, क्या हुआ अगर शाम को  लौटते लौटते अँधेरा हो गया था और उसका सर दर्द से फट रहा था।  अपनी इज़ज़त तो अपने ही हाथ मैं है।

मीनू जल्दी से नोट्स लेकर फाइनल इयर की क्लास में घुस गयी। अभी अभी दिल टूटा था। इस लेक्चर के बाद दो कप चाय पियेगी , नहीं टोमैटो सूप। मशीन की चाय में बिलकुल टेस्ट नहीं रहता।

लेक्चर ख़त्म हुआ , मीनू बाहर निकली, अमन अंदर घुसा।  और अगले पल वो कैंटीन में टोमैटो सूप पी रही थी।

शाम को एक पार्टी थी ।  उसकी तैयारियां भी करनी थी ।  मीनू को पार्लर गए सदियाँ बीत गयी थीं।  भोंहें जंगल की तरह फ़ैल गयी थीं।  आज शाम को तो किसी भी हालत में पार्लर जाना  ही था , वर्ना साथी लेक्चरर के बीच उसकी हंसाई हो जायेगी।  पिछली बार सब लोग कितने अच्छे से तैयार होकर आये थे पार्टी में, और वो ऐसे ही पहुँच गयी थी।  वहीं से उसने सबक लिया था।  ज़िन्दगी में न चाहते हुए भी कितने ऐसे काम करने पड़ते हैं, वर्ना उसका बस चलता तो पार्टी में ही नहीं जाती।

कॉलेज ख़त्म हुआ, और वो बस में लटकती हुई घर पहुँच गयी।  बिलकुल वक़्त नहीं था।  बाज़ार जाना था , छाता लेना था, स्कार्फ़ लेना था , पार्लर जाना था।  एन आर आई दुल्हन जस्सू ने  टोका , क्या बात है मीनू दी इतनी हड़बड़ी क्यों?  मीनू को बहुत अच्छा मानती थी। बहुत इज़ज़त करती थी उसकी। इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर होना वहाँ की लड़कियों के लिए बड़ी बात तो थी।  मीनू ने पार्टी वाली  बात बतायी।
""कौन सा सूट पहनेंगी आप ?""
""ये वाला। "" मीनू ने दिखाया।
""अरे ये तो रोजमर्रा वाला है।  कोई स्पेशल सूट नहीं है आपके पास ?""
""नहीं यार टाइम ही नहीं खरीदने का।  हाँ एक सूट है भैया की शादी में पहना था , मेहँदी में। ""
""दिखाइये न , फिर बताती हूँ। ""
मीनू ने सूटकेस खोला। एकमात्र चमक दमक वाला सिल्क का सूट था उसके पास। सौभाग्य से जस्सू को वो पसंद आ गया, वरना  उसकी शौपिंग लिस्ट में एक चीज और जुड़ जाती।

""अच्छा आपके  पास इससे मैचिंग कड़े और झुमके वगैरह हैं ?""
मीनू मायूस हो गयी।  मतलब ये सब भी खरीदना बाकी था !
""चिंता मत कीजिये  मेरे पास हैं। आप  पार्लर से आइये  फिर मैं आपको  तैयार करती हूँ। ऐसा तैयार करूंगी कि सबको पार्टी में सिर्फ आप  ही दिखेंगी ।  इतनी सुन्दर हैं आप, बस अपने को टाइम नहीं देतीं। "

मीनू खुश हो गयी।  सुबह से एक  बार दिल टूटा था तो एक बार तारीफ़ भी हुई थी। ज़िन्दगी खट्टी मीठी थी, टोमैटो सूप की तरह।

सूटकेस वापस रखने गयी तो  उसका ध्यान स्टोर में रखे नए सूटकेस की तरफ पड़ा।
""ये किसका है जस्सू ?""
""अरे हाँ  आपको बताना भूल गयी, स्टोर में एक नयी लड़की  शिफ्ट हो रही है।  अभी आंटी के साथ आयी थी रूम देखने । शाम तक  पलंग वगैरह आ  जाएगा। ""

तड़ाक। ये दूसरी बार था।  गम ख़ुशी पर भारी पड़  रहा था।

 अब मीनू समझी कि क्यों आंटी ने अब तक बिजली वाले को नहीं  बुलाया था। उनकी भी समस्या थी , घर का  खर्च चलाना था।  जितनी  ज्यादा लडकियां उतना अच्छा।

अब मीनू ने  निश्चय कर लिया था।  अगले महीने से दूसरा घर ढूंढ लेगी, यहाँ तो उसका कुछ नहीं हो सकता। पर वो ये सब करेगी कब ? वक़्त कहाँ है ?

मीनू जल्दी से निकल गयी, अभी बहुत काम पड़ा था।

बाज़ार जाकर मीनू ने पहले ए टी एम् से पैसे निकाले  फिर अपने ज़रुरत की खरीदारी की।  स्कार्फ़ वाली दूकान से दो तीन ठीक ठाक सूट ले लिए जल्दी सूखने वाले।  कॉटन के सूट सूखते ही नहीं थे।

हलकी सी बारिश अब भी हो रही थी , पर अब मीनू के पास छाता था।  सब खरीदारी करके वो लौटने लगी तो उसी पार्लर पर नज़र गयी जिसका जिक्र अंजू ने किया था। आस पास कोई दूसरा पार्लर नहीं था , मीनू के पास वक़्त भी नहीं था।  चुपचाप अंदर घुस गयी।

मिलन नाम था उस पार्लर का , और उसके सबसे चहेते व्यक्ति का भी।  अभी वो किसी लड़की का फेशियल  कर रहा था जो लगभग होने ही वाला था।  मीनू आश्वस्त हो गयी।  लडकियां आती हैं यहाँ। लेकिन  इसके बाद सिर्फ वही अकेली थी।  बारिश के मौसम में पूरे शहर की लडकियां घर में दुबकी  हुई थीं।
मीनू का नंबर आया, और वो चेयर पर लेट गयी।  सुबह से टूटे दिल के टुकड़े लिए दौड़ते भागते अब जाकर फुर्सत मिली थी, मीनू ने आँख बंद कर ली।
" आप कितने दिनों बाद पार्लर आ रही हैं ?""
"दो महीने हो गए ।  वक़्त ही नहीं मिलता। "" अंतिम बार वो अपने पुराने शहर में गयी थी।
""वक़्त निकाला कीजिये ।  " सुबह से चौथी बार किसी ने उसे ये कहा था।  पर इस बार मान लेने को जी करता था । मिलन ने बहुत नज़ाकत से उसकी घनी भोंहों को सुन्दर आकार दिया था, और अब वो उसके माथे पर हलके हाथों से मसाज कर रहा था।

मीनू का दर्द घुलता जा रहा था। जो  सुकून उसे उसकी प्रिय आंटी, उसके दोस्त अमन और न जाने कौन कौन न दे पाये थे वो सुकून एक हेयरड्रेसर  के हाथों का स्पर्श दे रहा था। मीनू मन ही मन सोच रही थी , इसकी बात नहीं टालेगी।

 बाहर निकलकर  ऑटो किया और घर पहुंची।  जस्सू अपने साजो सामान के साथ उसका इंतज़ार कर रही थी।

""कितने बजे जाना है मीनू दी ? उस हिसाब से आपको तैयार करूँ। "
""सात बजे से है पर मुझे कोई जल्दी नहीं। तू आराम से कर। "" मीनू ने आज ही सबक सीखा था।
""ठीक है दी आप सूट पहनके यहाँ बैठ जाइये। ""

आठ बजे मीनू पार्टी में पहुंची, और वाकई जैसा जस्सू ने वादा किया था, सबकी निगाहें उस पर अटक गयीं। मीनू को इन सब की आदत नहीं थी , चुपचाप जाके स्नैक्स और टोमेटो सूप लेके एक चेयर  पर बैठ गयी।

अमन आस पास मंडरा रहा था , शायद उसके बदले रूप को हजम करने की कोशिश में।  थोड़ी देर में पास वाली चेयर पर आकर बैठ गया।

""हैलो मीनू!""
""हैलो। ""
""तुम्हारी तबियत तो ठीक है न , आज सुबह कितनी भीग गयी थी ? सर्दी तो नहीं हुई ? मुझे बहुत फ़िक्र हो रही थी। और तुमने छाता लिया कि नहीं ? मेरे पास  दो हैं मुझसे......""

मीनू ने बीच में बात काट दी , ""टोमैटो सूप पियो, अच्छा बना है । ""