बुधवार, 25 दिसंबर 2013

मोहपाश


"'अरे कविता मैडम वो वाला गाना सुना दीजिये न रिमझिम गिरे सावन । "" शिवानी ने फरमाइश की।  रोली नींद से उठी।  ये फरमाइश भी अभी होनी थी!

कविता मैडम का सर दम्भ से ऊंचा हो गया।  और फिर शुरू हुई सावन की रिमझिम बरसात, जो कि अब वज्रपात का रूप ले चुकी थी। रोली कान खुजाने के बहाने ऊँगली डालकर बैठ गयी ।  बात ही ऐसी थी ,  कविता मैडम की आवाज़ वीर रस वाली थी , और उनसे फरमाइश हो रही थी प्रेमरस की।
गाना  ख़त्म हुआ, और सौभाग्य से कविता मैडम के लेक्चर का वक़्त हो गया, और वो शिवानी को वापस लौटकर  बचा हुआ  प्रेमरस टपकाने का वादा करती हुई निकल गयी।

""तेरा दिमाग  खराब हो गया था , चुपचाप नहीं बैठने दे सकती कविता मैडम को?"" सावन के बाद अब रोली शिवानी पर बरस रही थी।

""क्यों , थोडा मक्खन नहीं मार सकती  ?  जब एक महीने के लिए मैडम घर  गयीं थीं तो उन्ही की स्कूटी में नहीं उड़ रहे थे हम  लोग ! ""
रोली के कान अब भी बज रहे थे।
""अच्छा बाबा चल तुझे गरमागरम कॉफ़ी पिलाती हूँ , बहुत बड़ा झटका लगा है न तुझे !"
""अब तक कान झन्ना रहे हैं। ""

रोली और शिवानी ने इसी साल कॉलेज ज्वाइन किया था लेक्चरर बनकर। जल्द ही अच्छी दोस्ती भी हो गयी थी , और अब दोनों एक साथ पी जी में रहते थे।  लेकिन स्वभाव दोनों का बिलकुल अलग था।  रोली बहुत शांत और गम्भीर थी, और शिवानी उतनी ही  शरारती और तुनकमिजाज़ । 

पहली मुलाक़ात से ही रोली को आभास हो गया था कि शिवानी का कोई स्क्रू तो ज़रूर ढीला है। और वक़्त के साथ उसका शक़ यकीन में बदलता गया।  पहले दिन से ही उसने आस पास के लोगों  बेफ़ज़ूल में पंगे लेने शुरू कर दिए थे।  आयी तो लेक्चरर की हैसियत से थी पर पूरे कॉलेज में कॉलर  खड़ा करके चलती  थी कि कोई मुझे छेड़के तो दिखाओ।  और अगर कोई उसे छेड़ने में रुचि नहीं रखता था तो वो उनको उकसाती भी थी। आये दिन वो किसी को चार बातें सुनाके आती थी और पूछने पर पता चलता था कि अरे यार वो तेरे बारे में फलां फलां कह रहा था तो मैं कैसे सुनती ! मेरे दोस्तों के बारे में कोई एक शब्द भी बोलके तो दिखाए!

रोली सोचती ऐसा क्या कह दिया किसी ने उसके बारे में जो शिवानी सह नहीं पायी। पर धीरे धीरे रोली समझ गयी कि उसका स्वभाव  ही ऐसा है, गर्म मिजाज़।  जो बातें रोली हंसकर सुन लेती थी उन्ही पर शिवानी की तलवारें निकल जाती थीं । और इस  तरह शुरू हुई रोली की रोलरकोस्टर जर्नी।

जहाँ रोली की क्लास में शान्ति रहती थी वहीं  शिवानी की क्लासेस में  कोहराम मचा  रहता था , आज किसी ने उसे गुलाब का फूल दिखाया तो कल किसी को उसने क्लास से बाहर फेंक दिया , ये सब किस्से सुनने को मिलते रहते थे।

और सबसे ज्यादा हँसी  रोली को तब आती थी जब शिवानी लेक्चर के बाद चॉक बचाकर लाती थी और अपनी आपबीतियाँ सुनाते हुए उसे खाते जाती थी।  चॉक वो ऐसे खाती थी जैसे लोग सिगरेट पीते हैं। 

लेकिन कभी कभी उसकी कुछ बातें रोली को समझ नहीं आती थीं और वो उसे समझाने की कोशिश करती थी कि ये ठीक नहीं है , लेकिन शिवानी जितनी ज़िद की पक्की थी उतनी  बच्चों जैसी  नादाँ भी। उसको कोई बात समझाना उतना ही मुश्किल था जितना कविता मैम को गाते हुए चुप कराना। 

 दिखने में शिवानी आकर्षक थी , नैन नक्श तीखे तो नहीं थे पर गोरी और चमकती त्वचा पर उसकी हलकी भूरी आँखें खूब दमकती थीं।  बस एक चीज का उसे मलाल रहता था कि उसकी नाक दबी हुई थी, दिखती ही नहीं थी।  बस वो ठीक हो जाती तो मैडम जी ऐश्वर्या को चार बातें सुनाके आ जाती।

उसकी इसी गोरी सुन्दर काया के कारण अनेक पुरुष सहकर्मी उससे आकर्षित रहते थे।  वो भी अक्सर उनसे  अनजाने में या कभी जान बूझकर हँस हँस के बात कर लेती थी जिससे उनकी  आँखें चमक जाती थीं और अगले दिन वे बाल रंग के आते थे। घर से कॉलेज तो वो लोग सिटी बस से आते थे पर लौटते हुए उसने एक रौनक शर्मा  सर का स्कूटर बुक  कर लिया था और तो और रोली के लिए भी एक दूसरे नागेश  सर का स्कूटर जुगाड़ लिया था! रोली को वो अकेला नहीं  छोड़ती थी , उसे मालूम था रोली खुद से कभी किसी से लिफ्ट मांगने से रही। 

और इसीलिए लौटते समय रौनक सर के चेहरे पर ज्यादा रौनक रहती, और नागेश सर तिरछी नज़र से उन्हें घूरते रहते, फिर रोली उन्हें याद दिलाती कि सर मैं बैठ गयी हूँ पीछे, अब चलें? और वो खिसियाते हुए किक मारने लगते।

इस तरह जुगाड़ पानी से शिवानी की गाडी चलती रहती थी। 

और जैसे इतना तमाशा  कम था, कुछ दिनों के अंदर शिवानी मैडम के दिलो दिमाग में एक सहकर्मी घर करने लगा जो कि उसी की तरह गोरा और खूबसूरत था।  इन दोनों की खासियत ये थी कि दोनों के अंदर अपने रूप और  ज्ञान का अहंकार कूट कूट के भरा था और दोनों को लगता था कि सामने वाला उसे लाइन दे रहा है, न कि वो सामने वाले को। हकीकत ये थी कि दोनों एक दूसरे  से खतरनाक रूप से आकर्षित थे और चाहते थे कि बस सामने वाला अब इकरार कर ही डाले, पर यहीं पर दोनों की गाडी रुक जाती थी, पहल कौन करे। और इसी खिंचाव का नतीजा ये हुआ कि कुछ वक़्त बाद उनकी सब्र की इम्तिहान हो गयी और जैसा शिवानी से अपेक्षित था उसने  गौरव नाम के इस युवक को उकसाना शुरू कर दिया। वो बेचारा अन्य सहकर्मियों के बीच कुछ बोल रहा होता तो मैडम कूद जाती और फिर उनके बीच अंट शंट बहस चलने लगती।  दोनों गर्म खून थे , और दोनों एक दूसरे के धैर्य की परीक्षा ले चुके थे , इसलिए अब खोने को कुछ नहीं बचा था।  हाँ बाकी लोग ज़रूर उठ उठकर खिसक लेते।

लेकिन रोली, जो कि शिवानी की रूममेट भी थी और गौरव की करीबी दोस्त भी , दोनों के दिल का हाल जानती थी।  दोनों एक दूसरे  से प्यार से रहना चाहते थे, एक दूसरे  का नाम सुनकर उनके चेहरे अनायास खिल जाते थे।  लेकिन उनका अहंकार उन्हें छोड़ता नहीं था। रोली ने शुरू शुरू में इनके प्यार को मकाम पर पहुंचाने की कोशिश भी की पर उनकी गुरूर भरी बेहूदा हरकतें देखकर वो भी समझ गयी कि इनके झमेले से दूर रहना ही बेहतर है, पता चले कि किसी  दिन दोनों मिलके रोली को ही किसी मुसीबत में डाल  दें ।

और फिर साथ रहते हुए रोली को शिवानी के बारे में एक बात पता चली जिससे वो बहुत असहज हो गयी। 

शिवानी की ज़िन्दगी में कोई और भी था , चेतन, उसका कॉलेज के वक़्त से चला आ रहा अफेयर । यही नहीं, शिवानी के पास जो मोबाइल फ़ोन था वो भी उसी बन्दे का दिया हुआ था।  लेकिन शिवानी ने ये बात सिर्फ रोली को बतायी थी, मतलब गौरव इस बात को नहीं जानता था।

उसके बाद से रोली एक अजीब सी उलझन में पड़ गयी।  एक तरफ शिवानी  की दोस्ती की खातिर वो उसके पुराने अफेयर के बारे में किसी को नहीं बताना चाहती थी, और दूसरी तरफ उसे दिख रहा था कि गौरव धीरे धीरे शिवानी के करीब जाना चाहता था।

नैतिकता का तकाज़ा था कि वो गौरव को जाके सच बात बता दे ताकि  शिवानी के साथ आगे बढ़ने से पहले उसे उसकी सच्चाई  पता हो। उसके बाद फिर उसे जो करना है वो करे। लेकिन ये एक राज़ था जो शिवानी ने उसे विश्वास में लेके बताया था , वो उसका विश्वास भी नहीं तोड़ सकती थी।

अंततः रोली ने फैसला किया कि वो खुद से गौरव को कुछ नहीं बताएगी, लेकिन अगर उसने सामने से उससे पूछ लिया तो फिर सोच समझकर फैसला लेगी। आखिर दोनों बच्चे तो नहीं हैं, अपना भला बुरा देख सकते हैं।

रोली का ये अंतर्द्वंद्व चलता रहा , और उसे शिवानी के साथ घुटन सी महसूस होने लगी।  शिवानी उसका बहुत ख़याल रखती थी , कोई भी काम, यहाँ तक कि कम्पनियों में नौकरी के फॉर्म तक अकेले नहीं भरती थी।  दुनिया जहां से लड़ झगड़ के आती थी उसके  लिए सो अलग।  लेकिन उसकी निजी ज़िन्दगी की कारगुजारियां  रोली के गले नहीं उतर पा रही थी।

गौरव शिवानी के मामले में संजीदा होता जा रहा था।  उसे शिवानी की खिलखिलाती हंसी, उसकी हलकी भूरी  आँखें, और तो और उसके नासमझी भरे पंगों में भी प्यार आने लगा था।  ये बात शिवानी को भी दिखने लगी थी, और वो भी अब अपना रंग बदलने लगी थी।  उसने भी अब गौरव के साथ सहज होकर बात करना शुरू कर दिया था।  अपनी ज़िन्दगी की बातें उसके साथ शेयर करने लगी थी। 

 रोली की उलझन को और बढ़ाने के लिए बाकी के सहकर्मी भी मैदान में कूद पड़े थे।  गौरव के दोस्त उसे शिवानी के नाम से छेड़ने लगे थे।  दोनों की जोड़ी दिखने में वैसे ही आकर्षक थी , और अब तो दोनों में तालमेल भी बनने लगा था। शिवानी भी इन सब अफवाहों से खुश रहती थी।  वो भी गौरव से बात करने के मौके तलाशती थी, हालांकि दोनों ने अब तक  संयम रखा था और उनका गुरूर अब भी  अड़ंगे डालता था।
लेकिन रोली को दिखने लगा था कि अब गौरव के सब्र का बाँध टूटने लगा था और उसकी भावनाएं इस कदर हिलोरे मार रही थीं कि गौरव उसके सामने कभी भी घुटनों के बल गिर  सकता था ।

शिवानी ये सब बहुत गर्व से रोली को बताती थी , कि कैसे गौरव अब दीन  हीन  सा उसके प्यार में पागल हो चुका  था और  एकटक उसकी आँखों में देखता रहता था जब वो उससे बात करती थी । रोली हैरान हो जाती ये सुनकर। आखिर क्यों शिवानी सब जानकार भी गौरव को बढ़ावा दे रही थी , जब उसकी ज़िन्दगी में एक शख्स पहले से था जो इन सब बातों से अनजान उससे बेइंतहां प्यार करता था। इस बात पर उस बेचारे का अपने घरवालों से झगड़ा भी हो चुका था पर वो घरवालों को छोड़कर शिवानी के पीछे पड़ा था।

शिवानी ने रोली को बताया था कि उसका  चेतन से प्यार एकतरफा था और जितना पागल वो शिवानी के लिए था उतनी पागल शिवानी उसके लिए नहीं थी।  लेकिन रोली को ये तो दिख रहा था कि वो उसका मोबाइल अब भी लेके घूमती थी और तो और गौरव को भी वही नंबर दे दिया था !

मतलब शिवानी खतरनाक रूप से और पूरे होशो हवास में दो ज़िंदगियों  के साथ खेल रही थी।  छोटी छोटी बातों पर बखेड़ा खड़ा करना ठीक था , पर दो शरीफ लड़कों की भावनाओं से इस तरह खिलवाड़ , रोली का नाम अब विचलित हो उठा था , और देर सवेर वो गौरव को शिवानी की ये सच्च्चाई बताना चाहती  थी।

लेकिन उससे पहले गौरव को कहीं और से ये बात पता चल गयी। उसने शाम को रोली को घर बुलाया और उसे ये बात बतायी। रोली  ने अनजान बनने का नाटक किया।  गौरव बहुत दुखी था , वो वाकई में शिवानी को बहुत चाहने लगा था, और अब समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। उसे लग रहा था कि शिवानी हालात की शिकार है और उसकी उससे सहानुभूति बढ़ गयी थी।  ये देखकर रोली हैरान थी  , मतलब अब गौरव का कुछ नहीं हो सकता।  अब वो शिवानी के जाल में फंस चुका  था।

लेकिन अब रोली को गौरव से सहानुभूति होनी बंद हो गयी थी।  अगर सब कुछ दिखकर भी वो उसी गर्त में जा गिरना चाहता था तो फिर ये उसकी समस्या थी।

हाँ लेकिन रोली को चेतन के लिए ज़रूर चिंता होने लगी थी।  उसे तो ये सब मालूम ही नहीं था। वो तो दूसरे  शहर में अपना थोडा बहुत पैसा इस पर लुटाये पड़ा था।  न तो बेचारा अपने कैरियर पर ध्यान दे पा रहा था न परिवार पर।

रोली ने शिवानी के मन को टटोलना चाहा कि वो दोनों में से किसके लिए ज्यादा गम्भीर है।  एक तरफ सांवला और साधारण सा चेतन था जो उसके प्यार में लुटा पिटा सा खाली हाथ ज़िन्दगी से संघर्ष कर रहा था , और दूसरी तरफ गोरा चिट्टा और आकर्षक उच्च कोटि समृद्ध ब्राह्मण लड़का गौरव , जो कि एक लेक्चरर के रूप में पहले ही बहुत लोकप्रिय था, खासकर कॉलेज की लड़कियों में ।

रोली को मालूम था कि शिवानी किसे चुनेगी।  और इससे अधिक अपना वक़्त जाया  करना रोली ने उचित नहीं समझा और अपने काम से काम रखने लगी। जब लड़के खुद ही कुँए में कूदने को आतुर हों तो कोई क्या कर सकता है।

लेकिन शिवानी की ज़िन्दगी में फैला कचरा सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं था।  पुरुषों को इस कदर आकर्षित करने के बाद उसने जो अपनी ज़िन्दगी के लिए प्लान बनाया था वो हैरतअंगेज़ था। वो अक्सर दुसरे शहरों में किसी बाबा के सत्संग में जाती रहती थी। बाबा भी ऐसे जिनके खिलाफ वो कुछ सुन नहीं सकती थी।  रोली तो इन बाबाओं की असलियत जानती थी और शिवानी के नासमझ स्वभाव को भी, इसलिए उसने उसे चेताया भी था, पर शिवानी ने उल्टा उसे डाँट  दिया था।  एक बार जब वो सत्संग  से लौटी तो रोली ने मज़ाक में उससे बाबा का प्रसाद माँगा तो शिवानी ने गुस्से में कहा था कि बाबा का प्रसाद सिर्फ उनके भक्तों को ही मिल सकता है। रोली का मुंह खुला का खुला रह गया था। कोई इतना पढ़ लिख कर इन ढोंगी बाबाओं के चक्कर में इस कदर पड़ सकता है कि उन्हें भगवान् ही मानने लगें, उनकी बेसिरपैर बातों पर आँख मूंदकर भरोसा कर लें। शिवानी अक्सर रोली को उनके चमत्कारों के बारे में बताती थी , कैसे भक्त लोग सत्संग में उठ उठकर अपने असल ज़िन्दगी में हुए बाबा के असर का बखान करते थे। रोली कुछ नहीं बोलती थी , मालूम था ये कोई आसान काम नहीं था।  ढोंगी बाबाओं ने पूरे देश में आतंक मचा रखा था, ये शिवानी तो बहुत छोटे खेत की मूली थी।

और मैडम का अगला लक्ष्य था बाबा से दीक्षा लेना। उसमें अभी दो साल बाकी थे , तो शिवानी उसी का इंतज़ार कर रही थी।  और जब रोली उससे पूछती  कि फिर उसके इन अफेयर्स का क्या होगा तो वो हंसने लग जाती थी। मतलब शिवानी एक होपलेस केस थी , पूरी तरह से। अच्छी खासी इंजीनियरिंग की डिग्री और आकर्षक व्यक्तित्व के बाद भी कोई  अपनी ज़िन्दगी  का इस तरह कचूमर निकाल सकता है ये देखने वाली बात थी।  और रोली देख रही थी।

रोली ने तो वैसे ही निर्णय ले लिया था कि अब वो शिवानी की बेफजूल की बातों में परेशान नहीं होगी। वो लोग आपस में वैसे ही रहते, अच्छी सहेलियों की तरह। शिवानी रोली पर जान देती और  रोली भी उसकी दोस्ती का मान रखती।

लेकिन ज़िन्दगी का कचूमर बनाने वाले इंसान को ज़िन्दगी भी कहाँ आसानी से बख्शती थी। जल्द ही शिवानी ने कॉलेज में इतने फ़िज़ूल के  झगडे मोल ले लिए ,इतना रायता फैला दिया , कि उसका लोग उससे दूर रहने लगे। दिल के मारे गौरव ने एक बार उससे शाम को मिलकर उसे टेढ़े मेढ़े शब्दों में उसकी राय ज़रूर पूछी, लेकिन उस पर भी शिवानी के  गोलमोल जवाब देखकर वो भी उदास हो गया , और फिर उसके दोस्तों ने उसे आइना दिखाना शुरू कर दिया तो वो सही वक़्त पर चेत गया।  उसे भी समझ आ गया कि शिवानी अपने पुराने अफेयर और  उसकी भावनाओं के साथ एक साथ खेल रही है और ये देखकर उसका मन विरक्त हो गया। रूप का आकर्षण कुछ वक़्त तक बाँध सकता है , पर उसके बाद तो इंसान की नीयत को सम्भालना होता है। यहाँ तो नीयत ही नदारद  थी।

जब शिवानी का भी दम घुटने लगा तो उसने शहर के दूसरे  कॉलेजों  में इंटरव्यू देना शुरू कर दिया और एक अच्छे कॉलेज में उसका चयन हो भी गया।  आखिर पढ़ाई में तो वो मेधावी थी ही।

कॉलेज बदलने के बाद शिवानी को घर भी बदलना पड़ा क्योंकि ये घर बहुत दूर पड़ जाता था। और तब जाकर रोली को मुक्ति मिली एक ऐसे मोहपाश से जिसमें दोस्ती थी , प्यार था , पर साथ में थी एक घुटन, एक जंजाल।

उसके बाद शिवानी का क्या हुआ रोली को पता नहीं चला, लेकिन सुनने में आया था कि उसने चेतन को भी इसी शहर में बुला लिया था और अपने ही कॉलेज में लगवा दिया था।  जुगाड़ू तो वो थी ही।

लेकिन रोली को दिख रहा था कि कैसे चेतन, एक सीधा साधा प्यार का मारा नौजवान, एक अँधेरी गर्त  में गिरा जा रहा था ,  एक ऐसी गर्त में जहां उसका एक साथी तो था , पर वो भी खुद रौशनी की तलाश में पंख फड़फड़ा रहा था। ये गर्त थी उस मोहपाश की जिससे उस ढोंगी बाबा ने शिवानी को अपने वश में किया था, और शिवानी ने चेतन को और गौरव को । गौरव जैसे लोग जो वक़्त रहते गर्त के बाहर आ जाते  उनके लिए ज़िन्दगी लौट आती  थी । और ज़िन्दगी सबको मौका देती थी , बाहर आने का। ज़िन्दगी ने शिवानी को भी मौका दिया था रोली और गौरव के रूप में , अपनी ज़िन्दगी को नए सिरे से संवारने का , सही फैसले लेने का , पर उसके आँख पर बंधी अहंकार की पट्टी ने उसे वापस  खींच लिया। और अब वो अपने साथ साथ चेतन को भी लेके जा रही थी,  वही चेतन जो इतने साल उसके साथ बिताकर भी कुछ नहीं समझा , जिसे बस उसकी भूरी आँखें दिखती थीं , और उनका मोहपाश।

रोली बस यही दुआ करती थी कि जो बात वो उस चॉक खाने वाली सनसनीखेज लड़की को न समझा सकी वो ज़िन्दगी उसे आगे चलके समझा दे, थोड़े कम कठोर शब्दों में। आखिर वो दिल की बुरी नहीं थी , बस मिजाज की मारी थी।

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

आखिरी सैलाब


दरवाज़ा जोर से बजा ।
"आ रही हूँ  बाबा , तोड़ेगी क्या ?" नीतू अंदर से चिल्लाई। जानती थी ये काम पल्लवी  के अलावा कोई नहीं कर सकता।

""हाँ बोल, क्या बात है ?"" नीतू ने दरवाज़ा खोला।
""आइसक्रीम खाने चलेगी?"
""अभी?
""चल ना मैं खिला रही हूँ।  तू बस स्कूटी निकाल ले। सिटी सेंटर जायेंगे। "
""सिटी सेंटर? आइसक्रीम खाने के लिए? यहाँ पास में भी तो मिलती है!"
""अरे यार तुझे चलना है कि नहीं? वहाँ अच्छा आइस क्रीम पार्लर है। और गाडी  मैं चलाउंगी
चिंता मत कर। "
नीतू अभी स्कूटी चलाना सीख ही रही थी।  लाइसेंस भी नहीं बना था।

""ठीक है। थोडा तैयार होने देगी या ऐसे ही चल पडूं ?" नीतू को अब भी अचानक का यह प्लान हजम नहीं हो रहा था, पर पल्लवी पूरे मूड में थी।
""पाँच मिनट में तैयार हो जा। ज्यादा टाइम मत लगाना। "

थोड़ी देर में वो  स्कूटी में बैठकर निकलने लगे। हल्का सा अँधेरा छा  रहा था। लेडीज  हॉस्टल के बाहर की स्ट्रीट लाइट्स जलने लगीं थी। हॉस्टल की बाकी लडकियां  उन्हें जाते  हुए घूरकर देख रही थीं। थोड़ी देर में उनकी स्कूटी  भीड़भाड़ भरी सड़कों में दौड़ने लगी । 

""अचानक से क्या सूझा तुझे?""
""ऐसे ही यार मूड ठीक नहीं था सोचा थोडा घूम फिर लेंगे । ""
कुछ दिनों से पल्लो का मूड ठीक नहीं था।  ये बात नीतू भी जानती थी।

लगभग दो  महीने पहले दोनों नयी कंपनी ज्वाइन करके इस हॉस्टल में शिफ्ट हुए थे , और पास पास का कमरा होने के कारण धीरे धीरे उनकी बातचीत होने लगी जो अब अच्छी दोस्ती में बदल गयी थी।

पहली मुलाक़ात से ही नीतू को समझ आ गया था कि पल्लवी एक ज़िंदादिल लड़की है।  पूरे बैच में कुल चार लडकियां थीं जिनमें से बाकी दो लडकियां अपने तक ही सीमित रहती थीं और अधिकाँश वक़्त अपने बॉयफ्रेन्डस् के साथ फ़ोन पर ही गुजारती थीं।  सिर्फ खाने के वक़्त मेस में उन सबकी आपस में भेंट होती थी। 

पर पल्लो के साथ नीतू की अलग ही दिनचर्या बन गयी थी। दोनों सुबह उठकर मॉर्निंग वाक करते थे, फिर सामने  वाली दुकान  में चाय पीते थे। उसके बाद तो ऑफिस जाने की तैयारियां करनी होती थीं।  फिर शाम को वापस उसी दुकान  में चाय पीते थे। उसके बाद या फिर कॉमन रूम में जाकर टीवी देखते हुए  टीटी खेलते थे या फिर कमरे में आकर गप्पें मारते थे।

इतने में भी उनका  मन नहीं भरता था। कॉलेज के बाद की नयी नयी नौकरी और ज़िन्दगी थी। कॉलेज के भुखमरी वाले दिनों के बाद अचानक से जेब में पैसे आ गए थे।  इसलिए शुक्रवार को जो कोई भी मूवी लगी हो उसे देखना फ़र्ज़ बन जाता था,  उस चक्कर में रामगोपाल की शोले भी देख ली थी।  अक्सर शाम को चिकन रोल या सूप वगैरह का प्लान बन जाता था। सन्डे को तो मैस में खाना पाप होता था।

बाकी दोनों  लडकियां बॉयफ्रेन्डस् की फ़ोन पर उपलब्धता के अनुसार उनके  प्लान में शामिल हुआ करती थीं। उन दोनों का मामला थोड़ा पेंचीदा था सो वो दोनों अक्सर एक दूसरे  के रूम में जाकर रो रहे होते  थे, पर नीतू और पल्लो इन सब हरकतों से दूर कहीं टीटी खेल रहे होते थे या बॉयज हॉस्टल के दबोचे हुए शिकारों को पका रहे होते थे।

ऐसा नहीं था कि हमारी पल्लो की ज़िन्दगी बॉयफ्रेंड विहीन थी। और ऐसा भी नहीं था कि उसका  मामला पेंचीदा नहीं था, पर रोने गाने के लिए वो सबसे अंत में समय निकालती थी, जब दिनभर की उछलकूद का कोटा ख़त्म हो जाता था। और तो और उसने नीतू से मशविरा करके  बॉयज हॉस्टल में अपने पसंदीदा लड़कों की लिस्ट भी  बना ली थी अगर उसका  वर्तमान  अफेयर किसी कारणवश नहीं चल पाया तो। आखिर ज़िन्दगी छोटी  है और काम ज्यादा।  इसलिए  उन्होंने बाकी दोनों लड़कियों को भी नोटिस ज़ारी कर दिया था  ताकि वो उन लड़कों से दूर रहे।

बस इस तरह मस्ती चलती रहती थी और वक़्त गुजरता रहता था।
पर पिछले एक हफ्ते से पल्लो कुछ ज्यादा परेशान लग रही थी।  दिनचर्या के विपरीत  उसने ऑफिस से आने के बाद से ही कमरा बंद करके एक डेढ़  घंटे फ़ोन पर बात करना शुरू कर दिया था।  उसके बाद कमरे से बाहर निकलती तो आँखें लाल रहती थीं ।  ये सब देखकर  नीतू का भी मूड खराब हो जाता। लेकिन फिर थोड़ी देर में पल्लो  वापस अपने रंग में आ जाती और तब नीतू की जान में जान आती थी।

उसी दौरान एक दिन  चाय पीने के बाद दोनों शाम को टहलने निकले तो पल्लो ने अपना दुःख नीतू से बाँटा। उसके माता पिता को  उसके समीर  के साथ सम्बन्ध के बारे में पता चल गया था। उन्होंने उसे बता दिया था कि उनकी सहमति से यह शादी  नहीं हो सकती। दूसरी तरफ समीर की माँ  की तबियत बहुत खराब रहने लगी थी तो उसके ऊपर जल्द शादी करने का दबाव आ गया था ताकि बहू उसकी माँ का ख्याल रख सके।

एक तरह से  पल्लो को अपना और समीर का रिश्ता ख़त्म होते दिख गया था और अब वो प्राण पखेरू उड़ने के पहले की तड़प वाले दौर से गुजर रही थी। न तो उसका और न समीर का स्वभाव ऐसा था कि वे अपनी ख़ुशी के लिए परिवार की ख़ुशी कुर्बान कर दें। दोनों घर में बड़े थे और छोटे भाई बहनों की शादी अभी बाकी थी।  लेकिन पूरी तरह हार मानने को दिल नहीं करता था। दिल के एक कोने से अब भी ये दुआ निकलती थी कि काश सब कुछ ठीक हो जाए, काश भगवान् उनकी सुन ले।

नीतू को शुरू  में यह सब मज़ाक लगता था, लेकिन अब ये जानकर  कि पल्लो वाकई में  हालात से समझौता करने और समीर को भूलने के लिए तैयार थी, नीतू को बहुत अजीब सा लग रहा था।  नीतू खुद कभी किसी अफेयर वगैरह में नहीं पड़ी थी, और न पड़ना चाहती थी।  उसका मानना था कि अफेयर करो तो शादी के इरादे से वर्ना करो ही मत। इसलिए हर कदम फूँक फूँक कर रखती थी।इसी फूँकने के चक्कर में लड़के उससे दूर ही रहते थे , इतनी गहरी बातें उनकी समझ में नहीं आती थी।

 रिश्तों को इतनी गम्भीरता से लेने वाली नीतू को जब धीरे धीरे पल्लो के जीवन के इस पहलू का पता चला तो उसके मन कुछ वक़्त के लिए बहुत परेशान हो गया था । वो पल्लो से पूछना चाहती थी कि जब मालूम था कि दिक्कत होगी तो इस राह में आगे बढ़ी ही क्यों थी। पर पल्लो को तो जैसे कभी अपने फैसले से कोई शिकायत ही नहीं रहती । प्यार तो बस हो जाता है, सोच समझ के थोड़ी किया जाता है।फिल्मों में तो यही दिखाते थे । लेकिन जात पात और परिवार की रजामंदी की बातें क्या बिलकुल भी दिमाग में नहीं आती? सच बात तो ये थी कि  जिसने खुद कभी प्यार न किया हो वो उसके अंधेपन को क्या महसूस करती ।

खैर बहुत सी बातें थीं जो नीतू को समझ में नहीं आती थीं और जो पल्लो समझाने की स्थिति में भी नहीं थी। और अब कुछ हो भी नहीं सकता था।  वक़्त का पहिया घुमाकर पहले की गयी गलतियां ठीक नहीं की जा सकती थी। और पल्लो उन यादों को गलतियां मानने को भी तो तैयार नहीं थी। इसलिए नीतू ने इस सच्चाई को उसी रूप में स्वीकार कर लिया। वो लोग ज़िन्दगी के उस दौर में थे जब इंसान दूसरों की नसीहतों से नहीं  अपने फैसलों से आगे बढ़ता था, और नीतू ने पल्लो के निजी ज़िन्दगी में लिए  फैसलों का सम्मान किया और उसी तरह उसकी दोस्त बनी रही जैसे पहले थी। अब भी वो लोग मॉर्निंग वाक करते, चाय के दौर चलते, लड़कों पर शोध होता।

हाँ बीच बीच में पल्लो थोड़ी संजीदा हो जाती, बोलते बोलते उसकी आँखें भीग जाती। उसके और समीर दोनों के माता पिता जोर शोर से उनके लिए रिश्ते ढूंढ रहे थे और अब यही देखना बाकी था कि किसकी शादी पहले होती। वो रोज फ़ोन पर पसंदीदा रिश्तों के बारे में सुनती, कभी कुछ बोल देती कभी कड़वा घूँट  पीकर रह जाती। उन्हें उसकी हँसी सुनायी देती, नीतू को उसके आंसू दीखते।  पर दिन बीतते रहते।

और आज पल्लो नीतू को लेकर शाम के सात बजे सिटी सेंटर आयी थी। आइसक्रीम पार्लर वाकई बहुत अच्छा था, और भीड़भाड़ भी थी, पर उन दोनों को एक जगह मिल गयी बैठने को।

थोड़ी देर में उनके  हाथ में मनपसंद आइसक्रीम थीं । नीतू ने खाना शुरू कर दिया।

पल्लो सड़क में आते जाते लोगों  को देख रही थी। अनगिनत प्रेमी युगल एक दूसरे से सटे कहीं चले जा रहे थे, जात पात से परे, रूढ़ियों से बेफिकर।  इनमें से कितने लोग आगे चलके शादी करके एक दूजे के हो जायेंगे, शायद यही सोच रही थी पल्लो।

" तूने वो लिस्ट कहाँ रखी  है लड़कों वाली? " आइसक्रीम गलते देखकर पल्लो ने खाना शुरू किया ।

"हॉस्टल में है, साथ लेकर नहीं घूमती!" पल्लो को बोलते  देखकर नीतू की जान में जान आयी।

"जात बिरादरी पता करके लिखी है न? इस बार गलती की कोई गुंजाइश नहीं, मालूम है न?"

नीतू समझ नहीं पा रही थी, क्या बोले। बस उसकी आँखों में देखे जा रही थी। पल्लो उसकी आँखों के तीखे सवाल नहीं झेल पायी ।

"समीर की शादी है । मंडप में बैठा है अभी। " पल्लो धीरे से बुदबुदाई। नज़रें ज़मीन पर थीं।

नीतू हैरान थी ।  एक रिश्ता आखिरी साँस ले रहा था। उम्मीद की आखिरी डोर टूट चुकी थी । विधाता  ने भी हाथ खड़े कर दिए थे।  पल्लो हार चुकी थी, समीर हार चुका  था।

पल्लो ने  अपना सर नीतू की गोद में रख दिया, अब और आँसू नहीं रोके जाते थे।
नीतू उसे धीरे से सहलाने लगी ,जानती थी  ये आखिरी सैलाब है, इसके बह जाने में ही भला है। एक भारी बोझ के तले ज़िन्दगी की नयी शुरुआत तो नहीं हो सकती न।

थोड़ी देर में पल्लो सहज हो गयी। रिश्ते को श्रद्धांजलि दी जा  चुकी थी।  आगे बढ़ने का वक़्त आ गया था , समीर की तरह।

" कितने बन्दे हैं  ब्राह्मण अपनी लिस्ट में?" पल्लो स्कूटी चला रही थी।  प्रेमी युगल , दुकानें, यादों के चीथड़े, सब पीछे छूटते जा रहे थे।


शनिवार, 30 नवंबर 2013

डेट

                         
तानवी काफी देर से फ़ोन पर थी, करीब आधे घंटे से। निशा का पारा चढ़ रहा था। आधे घंटे बाद जाकर उसने फ़ोन रखा।
"सॉरी मम्मा बात ही कुछ ऐसी थी कि मैं फ़ोन रख ही नहीं पायी। " तानवी अपनी मम्मी का मिजाज जानती थी। निशा किचन चली गयी और तानवी भी पीछे हो ली।
"लाइए मैं कुछ हैल्प कर देती हूँ। " तानवी की मक्खनबाजी चालू थी।  
" रहने दो, बहुत बड़ी हो गयी हो न, अब थोड़ी मम्मी को सब कुछ बताओगी। "
"अरे मम्मी आप नहीं समझोगी, वो रोहित नेहा को डेट पे ले गया था तो वही सब मुझे सुना रही थी। एक एक सेकंड का हिसाब बता रही थी! बेचारा रोहित कितनी कोशिश कर रहा था उसे इम्प्रेस करने की। पर मैं ये सब किसे सुना रही हूँ, आप क्या जानो डेट क्या होती है!" तानवी ने सब्ज़ी काटनी शुरू कर दी। 

निशा का मन कहीं दूर चल पड़ा था। देहरादून की एक भीड़भाड़ वाली सड़क, जिसमें वो और अमन चले जा रहे थे और बतियाये जा रहे थे।
"अच्छा निशा बताओ, वो आभा तुमसे क्या कहती है मेरे बारे में?"
"कुछ नहीं, तुम्हें क्या लगता है ?"
"कुछ तो बोलती होगी, मुझे तो लगता है वो मुझे पसंद करती है "
"अच्छा! और कौन कौन पसंद करता है तुम्हें? "
"मज़ाक मत करो, उसकी आँखों में दिखता है मुझे, अच्छा एक बात बताओ, तुम्हें मालूम है ये डेट क्या होती है?"
"हाँ, क्यों?"
"तो बताओ मैं उसे डेट पे कैसे ले जाऊं? "
निशा हँस रही थी, अमन के मासूम सवालों पर।

"मम्मा कहाँ खो गयी, बताओ आपको मालूम है डेट क्या होती है ?" तानवी उसे वापस वर्तमान में खींच लायी।
"हाँ हाँ मालूम है, इतनी भी बेवकूफ नहीं है तुम्हारी मम्मा। दुनिया देखी है मैंने, तुमसे कहीं ज्यादा !"
"वाह वाह, मेरी मम्मा तो दुनिया की सबसे कूल मम्मा है! फिर तो आप भी ज़रूर डेट पे गए होंगे अपने ज़माने में?"
"तुम्हारे पापा लेके जाते थे। "
अरे वो भी कोई डेट हुई? वो तो जब आपकी बात पक्की हो गयी तब लेके जाते थे, मुझे सब मालूम है, शिल्पा आंटी ने बताया था।  "
हे भगवान् , इस शिल्पा आंटी ने और क्या क्या बता के रखा है इसको !
"अच्छा ठीक है, अब जा थोड़ी पढ़ाई भी कर ले क्योंकि वो तो नेहा तेरे लिए नहीं कर पाएगी न। "
"ओहो देखो तो मुझे जवाब देते नहीं बना तो कैसे भगा रही हो!"
तानवी मुस्कुराते हुए अपने कमरे में चली गयी, और निशा कढाई में तेल डालते हुए तानवी के उस प्रश्न का उत्तर तलाश रही थी, जो अब तक अनुत्तरित रह गया था, ज़िन्दगी के उस अध्याय की तरह जो पूरा होकर भी जब जब जेहन में आता अपने अधूरेपन का एहसास दिला देता।

देहरादून की एक उदास दोपहर थी। निशा अपने किराए के घर में आँखें बंद करके पलंग पर पड़ी थी, मानो ज़िन्दगी में अब कुछ करने को रह गया हो। कल ही एक उडती हुई सी खबर मिली थी , लिफ़ाफ़े में बंद दो नाम जिनकी नौकरी अगले महीने से नहीं रहेगी। क्यों नहीं रहेगी, ये किसी को नहीं पता था। कॉलेज के मालिक का लड़का ही तो वहाँ का वीसी था, जब मन चाहे लोगों को मजदूरों की तरह निकाल देता था। खैर, दो लोगों का निकाला जाना तय था, जिसमें नए लोगों के होने की उम्मीद अधिक थी। निशा को रात भर नींद नहीं आई थी। सुबह से उसका मन उचट रहा था. वो इधर की रह गयी थी उधर की। दोपहर खाने के बाद वो पलंग पर करवट बदल रही थी और शाम होने का इंतज़ार कर रही थी। चार बजते ही उसने चाय चढ़ा दी, वक़्त बिताने के लिए कुछ तो करना था। ये रविवार तो गुजरने का नाम ही नहीं ले रहा था।
निशा सोच रही थी कि चाय पीकर थोड़ी देर मकानमालकिन आंटी के घर चली जाए, शायद वहाँ कुछ मन बहल जाए। फिर उसे याद आया, आंटी को तो पूरे देहरादून में हो रही खौफनाक वारदातों के अलावा कुछ बात करना पसंद ही नहीं था। खून, बलात्कार, डकैती, और तो और अब आतंकवाद भी देहरादून के अखबारों के ज़रिये आंटी के ज़ेहन में भर गया था। उनके अनुसार अब भलाई का ज़माना ही नहीं रह गया था। कल ही तो जब वो कॉलेज से आई तो आंटी ने बड़े प्यार से उसे चाय पर बुलाया और समझाया अब उसे कुछ पैसे अलग से रखने चाहिए क्योंकि आजकल भाई भाई का दुश्मन हो गया है। निशा अपने मासूम भाइयों के बारे में सोच रही थी जिन्हें अब तक ये ही नहीं पता था कि उसका वेतन कितना था! क्या एक दिन वे निशा की कनपटी पर पिस्तौल रखकर उसके सारे पैसे छीन लेंगे ?
और हाँ,उस दिन जब अमन उससे किसी काम से मिलने आया था तो आंटी कैसे उसे घूर रही थी, फिर अगले दिन शाम को आंटी ने निशा को चाय पिलाते हुए समझाया था कि देहरादून में कैसे बलात्कार की घटनाएं बढती जा रही हैं!
नहीं, आज निशा इन सब वारदातों के मूड में नहीं थी। आज उसे कुछ अच्छा चाहिए था, कुछ ऐसा जो उसकी खोयी हुई हँसी से उसे मिला दे, दो पल के लिए ही सही।

पांच बजे उसने खुद को अमन का दरवाज़ा खटखटाते पाया।
अमन और निशा अक्सर कॉलेज के बाद एक दूसरे के साथ वक़्त बिताते थे , कभी किसी ढाबे में मोमो खाते हुए, कभी घंटाघर के पास खरीदारी करते हुए, तो कभी बस यूं ही देहरादून की सडकों में भटका करते थे। उस छोटे से शहर में, जहाँ लोग कुछ हासिल करने के लिए थोड़े वक़्त के लिए जाते थे, फिर कुछ हासिल करके आगे बढ़ जाते थे। ज़िन्दगी की इसी दौड़ में निशा की तन्हाइयों ने अमन की तन्हाइयों में अपना कुछ वक़्त का साथी ढूंढ लिया था।
अमन की मकानमालकिन आंटी निशा को घूरे जा रही थी, शायद वो भी कल अमन को देहरादून में बढ़ रहे बलात्कार के बारे में बताने वाली थी।
थोड़ी देर में दरवाज़ा खुला। अमन शायद अभी नींद से जगा था। कितना सुकून था उसकी ज़िन्दगी में, लगता था लिफ़ाफ़े वाली बात उसे याद ही नहीं थी।
निशा को देखकर वो भी खुश हो गया था, रविवार काटना उसके लिए भी मुश्किल हो जाता था।
"सो रहे थे?"
"नहीं अभी उठा ही था, सोच ही रहा था क्या करू!"
"क्या करू? चाय बनाओ। घर में मेहमान आया है!"
"हाँ बिलकुल" अमन ने चाय का पानी चढ़ा दिया। यूँ तो वो चाय नहीं पीता था, पर निशा के साथ ने उसे चाय का भी साथी बना दिया था। निशा को चाय पीना बहुत पसंद था।
"तुम इतनी उदास सी क्यों लग रही हो?" अमन ने चायपत्ती डालते हुए पूछा।
"तुम क्या जानो, नौकरी खोने की उदासी क्या होती है!" निशा ने कटाक्ष किया।
"अरे, नौकरी तो मेरी भी जा सकती है, अभी नाम थोड़ी पता चला है, तुम तो अभी से मुँह बनाके बैठ गयी। "
"हाँ पर तुम्हें अपनी नौकरी पर विशवास है और मुझे नहीं। " निशा शून्य में ताक रही थी।
अमन ने चाय का कप उसे पकड़ाया और बिस्तर के एक कोने में बैठ गया। घर में एक ही कुर्सी थी जिसमें निशा बैठी हुई थी।
"तुम्हें क्या फर्क पड़ता है अगर नौकरी चली भी जाए। तुम्हें थोड़े ही हमेशा यहाँ रहना था। तुम तो इस साल किसी किसी अच्छी कंपनी में नौकरी पाकर ही रहोगी। उसी की तैयारी के लिए तो तुम यहाँ आई थी ?"
"हाँ मगर तैयारी हो कहाँ पा रही है। पूरा दिन बीत जाता है कभी लेक्चर की तैयारी में कभी खाना बनाने में। लगता है अब तो ये नौकरी रहेगी कोई और मिलेगी। "
"तुम आज कुछ ज्यादा ही अपसेट लग रही हो। ज़रुरत से ज्यादा। अरे अपसेट तो मुझे होना चाहिए जिसे हमेशा यहीं रहना है, जिसका और कोई मुकाम नहीं।"
"ये क्या कोई छोटा मुकाम है? तुम्हें पढ़ाना अच्छा लगता है, और मुझे मालूम है एक दिन तुम बहुत नाम कमाओगे। इसीलिये कल के लिए तुम्हें डर नहीं लग रहा, तुम्हारे जैसे टीचर को कोई हाथ भी नहीं लगा सकता, बच्चे ही बगावत कर लेंगे!"
अमन कुछ सोच रहा था। निशा का मिजाज़ आज ज्यादा ही बिगड़ा था, उसे ठीक करना इतना आसान नहीं था।
"वीर ज़ारा लगी है, बगल वाले सिनेमा में। चलोगी?"
"मज़ाक कर रहे हो?"
"नहीं, मैं खुद वहाँ जाने वाला था, अकेले। चलो , अच्छा लगेगा। ज़िन्दगी हमें उदास कर सकती है, पर उदासियों के बीच ख़ुशी ढूंढना तो हमारे हाथ में है ?"
निशा अचानक से मिले इस निमंत्रण को समझ नहीं पा रही थी। इस छोटे से शहर में वो और अमन गलियों में भटकते हुए ठीक थे, पर पिक्चर जाते हुए तो लोग उन्हें ही वीर ज़ारा समझ बैठेंगे! और उनके ही तो कॉलेज के कई लड़के गए होंगे पिक्चर देखने, उन्हें तो मसाला मिल जाएगा!
लेकिन आज का दिन कुछ अलग था, आज निशा को इन खुशियों की, इन अच्छे लम्हों की ज़रुरत थी । बाकी सबसे वो बाद में निपट सकती थी। इससे पहले कि वो खुद हाँ करती, अमन ने अपना जैकेट उसे पकड़ा दिया "ये ले लो, बाहर ठण्ड है, लौटते हुए रात हो जायेगी। और जल्दी चलो, छह बजे का शो है। "
वाकई में सोचने के लिए ज्यादा वक़्त नहीं था, सो उसने जैकेट पहन लिया। थोड़ी देर में वे आराघर की सड़क पर चल रहे थे, सिनेमाहाल की तरफ।
"वैसे तुम अकेले क्यों जा रहे थे? आभा को क्यों नहीं पूछा?" निशा ने अमन को छेड़ना शुरू किया। अब वो अपने मूड में रही थी।
"वो इतने दूर रहती है, जब तक पहुंचेगी पिक्चर ख़तम हो जाएगी!"
"तो होने देते, अगला शो देख लेते, फिर उसे घर तक छोडके आते। इतनी मेहनत तो करनी पड़ती है! "
"अरे छोडो , कुछ अच्छी बात करो कहाँ उसका नाम ले रही हो!"
निशा हैरान थी।
उसकी हैरानी कोई नयी नहीं थी। बात पिछले महीने की थी जब वो कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपने घर गयी थी। जब लौटकर आई तो आभा ने कॉलेज में उसे चहकते हुए बताया था की अमन उसे डेट पर ले गया था। निशा को विश्वास नहीं आया था पर फिर अमन ने भी इस बात की पुष्टि की थी, शाम को टहलते हुए। निशा को काफी राहत मिली थी की अब वे उसके ज़रिये नहीं बल्कि सीधे सीधे बात कर रहे थे, पहले तो वो उनके बीच कबूतर का काम करती थी।
निशा एक हफ्ते के लिए गयी थी और इस दौरान अमन ने आभा को अपने खालीपन का साथी बनाया  अमन उसे परेड ग्राउंड में मेला दिखाने ले गया, और उन्होंने पलटन बाज़ार में खरीदारी भी की। निशा को कुछ दिन और रुकना पड़ा। जब वो लौटी तो अमन ने एक सांस में पूरी कहानी उसे बता दी।
लेकिन उस दिन के बाद से अमन ने आभा के बारे में बात करना बहुत कम कर दिया। पता नहीं क्यों।
खैर, वो लोग सिनेमाहाल पहुँच गए थे और अमन ने दो टिकेट ले लिए। निशा ने पर्स खोलते हुए अमन से टिकेट के दाम पूछे तो अमन को हँसी गयी।
"एक मूवी मैं तुम्हें खुद से नहीं दिखा सकता?"
"ठीक है अगली बार टिकेट मैं ले लूंगी। "
"वाह मतलब एक और मूवी तुम्हारे साथ देखने मिल जायेगी!"
"क्या?"
"कुछ नहीं कुछ नहीं!" अमन मुस्कुराया," वैसे तुम बाकी लड़कियों से कुछ क्यों नहीं सीखती, आभा से ही सीख लेती पूरा दिन कॉलेज में साथ रहती हो। "
"बाकी लडकियां अलग हैं, मैं अलग हूँ, मुझे मुफ्त में अपने ऊपर खर्चे करवाना हजम नहीं होता। "
अमन कुछ सोच रहा था और निशा को देख रहा था।
फिल्म शुरू हो गयी। बहुत सुन्दर कहानी थी, अमर प्रेम की कहानी। कुछ तो इस कहानी ने और कुछ हॉल के अँधेरे ने एक अलग सा समा बाँध लिया था। निशा के दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी, शायद अमन की भी। इस तरह के रूमानी माहौल में दोनों ने कभी वक़्त नहीं बिताया था, खासकर तब जब सामने परदे पर दो दिलों की कहानी चल रही हो।
मैं ही मैं अब तुम्हारे ख्यालों में हूँ।
मैं जवाबों में हूँ, मैं सवालों में हूँ।
फिल्म ख़त्म हुई और अमन निशा को घर के बाहर तक छोड़कर आगे बढ़ गया , पर कुछ था जो दोनों के लिए थम सा गया था, शायद वक़्त, शायद दिलों की धड़कन।
अगले दिन वो लिफाफा भी खुला और उसमें निशा का नाम भी आया, पर निशा में जाने कहाँ से एक अजब सी हिम्मत गयी थी, जो उसने और दूसरी लेक्चरर ने मिलकर कॉलेज के प्रिंसिपल से मिलकर पिछले एक साल में अपने योगदान के बारे में विस्तार से चर्चा की और उन्हें आश्वस्त करके लिफ़ाफ़े का किस्सा ही ख़त्म कर दिया। कल तक जो निशा निराशा और आशंकाओं से घिरी हुई थी वही आज आत्मविश्वास से भरी हुई थी और आगे के सफ़र को नयी उमंग के साथ तय करने को तैयार थी।
अमन और निशा यूँ ही वक़्त बिताते रहे, एक दूसरे के दुःख सुख का सहारा बनकर। निशा ने नए सिरे से बेहतर अवसर की तैयारी शुरू कर दी थी। पर अमन के लिए वक़्त निकल ही आता था, रविवार की खाली शामों में। वो लोग फिर कभी सिनेमा देखने नहीं गए, पर देहरादून की वही पुरानी गलियाँ अब रूमानी सी लगने लगी थी, वही पुरानी स्टोव वाली चाय अब अधिक मिठास लिए होती थी।

और फिर वह दिन भी आया,जब ज़िन्दगी ने निशा के दरवाज़े पर दस्तक दी निशा की मेहनत रंग लायी, और उसे दूसरे शहर में सरकारी नौकरी मिल गयी। निशा काफी खुश थी, और बहुत लगन से अपना इस्तीफ़ा लिख रही थी।
अमन उसकी नौकरी की खबर सुनकर सीधा लेक्चर से उसके केबिन में आया था।
"जा रही हो? "
"हाँ। "
"मैंने सुना, अच्छी जॉब मिल गयी है तुमको। बधाई।"
"थैंक्स।"
अमन चुपचाप निशा को इस्तीफ़ा लिखते हुए देख रहा था। जैसे कुछ कहना चाहता हो।
" लिख दिया? दिखाओ। "
निशा ने इस्तीफ़ा अमन को पकड़ाया।
अमन ने कागज़ मोड़कर जेब में रख दिया।
"मत जाओ। "
"जाना तो पड़ेगा। कागज़ दे दो वरना दूसरा लिखना पड़ेगा। "
अमन कुर्सी में बैठ गया , निशब्द सा।

"मम्मा सब्जी जल रही है क्या? बदबू रही है। " तानवी की आवाज़ सुनकर निशा सब्जी चलाने लगी।