गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

हूँ मैं वही..


ज़िन्दगी के पन्नों में मुरझाती सी इक कली हूँ
ढूंढो तो शायद खुशबुओं का पता मिलेगा.

आईने में जमी बरसों की परतों तले
तकती आँखों में ख्वाबों का मकां मिलेगा.

उम्र की बेतरतीब झुर्रियों में दफ़न कहीं
यौवन के हर मौसम का निशाँ मिलेगा.

हूँ मैं वही, बस नज़रिए ज़मानों के बदल जाते हैं.
हूँ मैं वही, बस पते ठिकानों के बदल जाते हैं.