शनिवार, 12 मार्च 2011

नश्वरता



पर्वतों की ऊंचाइयों में
कहीं खोकर रह जाएगा
सागर की गहराइयों में 
दफन होकर रह जाएगा

उन्मुक्त आंचल का विस्तार 
कभी तूफान समेट लेंगे
कभी तपते सूरज में
यह अस्तित्व पिघल जाएगा

कितना कुछ भी आर्जित कर लूं
सब कुछ पीछे रह जाएगा
 यह तन मिट्टी से उपजा था
मिट्टी में ही मिल जाएगा