गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

हूँ मैं वही..


ज़िन्दगी के पन्नों में मुरझाती सी इक कली हूँ
ढूंढो तो शायद खुशबुओं का पता मिलेगा.

आईने में जमी बरसों की परतों तले
तकती आँखों में ख्वाबों का मकां मिलेगा.

उम्र की बेतरतीब झुर्रियों में दफ़न कहीं
यौवन के हर मौसम का निशाँ मिलेगा.

हूँ मैं वही, बस नज़रिए ज़मानों के बदल जाते हैं.
हूँ मैं वही, बस पते ठिकानों के बदल जाते हैं.

शनिवार, 12 मार्च 2011

नश्वरता



पर्वतों की ऊंचाइयों में
कहीं खोकर रह जाएगा
सागर की गहराइयों में 
दफन होकर रह जाएगा

उन्मुक्त आंचल का विस्तार 
कभी तूफान समेट लेंगे
कभी तपते सूरज में
यह अस्तित्व पिघल जाएगा

कितना कुछ भी आर्जित कर लूं
सब कुछ पीछे रह जाएगा
 यह तन मिट्टी से उपजा था
मिट्टी में ही मिल जाएगा