शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

मेरी अयोध्या


धू धू कर जलती है
मेरी अयोध्या
बरसों से ज़ख़्मी है
मेरी अयोध्या

धरती के उस खंड में
मुझे ईश्वर दीखता है
धरती के उस खंड में
उसे अल्लाह दीखता है
ईश्वर अल्लाह तो
प्रेम से रहते होंगे
पर खंडित होती है
मेरी अयोध्या

धर्म कब किसी को
अधर्म सिखाता है
भाई भाई को दुश्मन
धर्म कब बनाता है
यह मैल तो मेरे
दूषित मन में है
जिससे मलिन होती है
मेरी अयोध्या

कहती है ये अयोध्या
कि घोर कलयुग जाएगा
मेरी साख को बचाने
एक राम फिर आएगा
तब तक खामोश सी
तमाशा देखती है
सिसकियाँ भरती है
मेरी अयोध्या.