बुधवार, 17 जून 2009

बेफजूली

शायद यही मंज़र हमारे
ख़्वाबों में आता होगा
शायद यही देखकर हम
आज ठिठक कर ठहरे हें.

जंजीरों में गर लिपटते
तो टूटने की आस होती
वो भला क्या करे, जिसपर
आंखों से लगते पहरे हें.

कैसी बातें करते हें
एक चिराग से क्या होगा
लाखों भी फीके पड़ेंगे
ये गर्त खासे गहरे हें

बड़े जतन से बनाती हूँ
उनके लिए ये घरोंदा
पर बिगाड़ जाती है, वो
जिसके बाल सुनहरे हें

पूछे वो, तो खामोश रहना
फ़िर पूछे तो भी चुप रहना
न माने, तो कह देना
हम आजकल ग्रीनलैंड में ठहरे हें।

शनिवार, 6 जून 2009

खंडहरों में कहीं जिंदगी बसती है

कुछ दिनों से हम
थोड़ा परेशान थे.
मंजिलें नाराज़ थीं
रास्ते वीरान थे.
धुंधले आईने में हमने
जिंदगी को निहारना चाहा.
तपती धुप के ओज से
रूप निखारना चाहा.
शाम की उदासियों से भी
काजल उतारना चाहा.
पैबंद लगी रूह से
जिस्म संवारना चाहा.
जी किया की जिंदगी को
हिस्सों में बाँट दें,
गम कहीं छोड़ दें
खुशियाँ सब छांट लें.
कभी तो इन काँटों में
फूलों का निशाँ मिलेगा,
खँडहर के उस पार
एक आशियाँ मिलेगा.
लेकिन जब ये सिलसिला
कहीं थमता न दिखा,
खँडहर के उस पार
कोई आशियाँ न दिखा,
तब कहीं महसूस हुआ
के ये कांटे ही तो
जिंदगी भर साथ दिए,
ये खँडहर ही तो
धूप दिए, हवा दिए
दो पल का आसरा दिए,
कुछ बेहतर पाने का जज्बा दिए.
बीच राह में गर
ठंडी छाँव मिल जाए,
तो क्या हम कभी
अंजाम तक पहुँच पायेंगे?
जो बसंत में ही रह गए
तो बाकी के मौसम
क्या कभी देख पायेंगे?