गुरुवार, 26 मार्च 2009

नीयत भली तो सब भला

इस घोर कलयुग में जहाँ चारों तरफ़ चील कोवे बैठे हों आपका खून निचोड़ने के लिए, वहाँ कभी कभी एक छोटा सा नेक नीयति वाला काम भी दिल को छू जाता है. यह बात मैंने हाल ही में महसूस की.
इस बार होली में बड़े भइया के घर (अहमदाबाद में) जाने का प्लान बनाया. स्टेशन पहुंचकर अक्सर हम ऑटो रिक्शा ले लेते हें जो २०-२५ मिनट में घर पहुँचा देता है और मीटर से चलता है. मीटर के हिसाब से किराया ६५-७० के बीच बैठता है पर अक्सर रिक्शा चालक सवारी को बेवकूफ बनाने के चक्कर में बढ़ा चढ़ा कर बोलते हें. उनसे मीटर कार्ड मांगने पर ही असलियत मालूम पड़ती है, पर नया आदमी अक्सर बेवकूफ बन जाता है.
पहली बार मैं भी ९० रुपये देकर आई थी, फिर भइया ने यह बात बतायी तो अगली बार से ध्यान रखती थी.
इस बार स्टेशन से एक ४०-४५ की उम्र के रिक्शा चालाक से पाला पडा. पूरे रास्ते दौडाता रहा और ट्रैफिक पर गुस्सा करता रहा व बीच बीच में मुझे भी एक दो ज्ञान की बातें बताता रहा।

घर पहुंचकर उसने जेब से माचिस निकाली. एक तीली जलाकर मीटर रीडिंग मुझे दिखायी. फ़िर दूसरी तीली जलाकर जेब से कार्ड निकालकर मुझे भाडा दिखाया. ६८ रुपये बनते थे तो थोड़ा मुस्करा कर बोला आपको सत्तर दे दीजिये. मैंने भी खुशी से सत्तर दे दिए. दिल खुश हो गया की फालतू की झिक झिक नही करनी पड़ी जैसे पहले होती थी.
जब इंसान की नीयत भली होती है तो उसके साथ किया काम या गुजारा हुआ वक्त भी अच्छी छाप छोड़ जाता है. भले ही मैंने दो रुपये ज्यादा दिए पर अपनी खुशी से दिए. कोई आदमी सामने से मीठी मीठी बातें करता रहे और मन ही मन आपको बेवकूफ बनाने की तरकीब खोज रहा हो तो पता चलने पर दिल खट्टा हो जाता है।