शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

'आम' का अचारी फलसफा


इतना आसाँ नहीं होता
आम से ख़ास बनना।
बड़ी कवायद करनी पड़ती है।
पहले आपको घर से
बेघर किया जाता है।
आपके टुकड़े किए जाते हैं।
तपती धूप में आपको
सुखाया जाता है।
तेल से नहलाया जाता है।
उचित लीपापोती के बाद
एक आकर्षक मर्तबान में
बंदी बनाया जाता है।
आपकी आत्मा तो इस सफर में
आपका साथ नही दे पाती,
आपका कचूमर मगर बाकी ज़िन्दगी
'ख़ास' बन जाता है।

कुछ हासिल करने के लिए
इतना तो यार करना पड़ता है।
एक आम को ख़ास होने के लिए
पहले अचार बनना पड़ता है।

बुधवार, 28 जनवरी 2009

हिमेश रेशमिया का लता जी से पंगा

एक बार हिमेश रेशमिया जी कहीं जा रहे थे। रास्ते में लता जी मिली, उन्हें देखकर बोलीं " हरी ओऊम हिमेश जी"। वो बोले" हावी ओऊम हावी ओऊम " । लता जी सकपका गई "कौन हावी किसपर हावी?? " "आप भी मज़ाक करती हैं लता जी!! चलिए अब मिल ही गए हैं तो एक कप काफ़ी हो जाए। "
अब किसी छोटे मोटे ढाबे में तो लता जी को नही ले जाया जा सकता, इसलिए हिमेश जी ले गए एक मशहूर कैफे में।
आर्डर कारने के बाद लता जी को लगा की चुप्पी तोडी जाय, अब ज्यादा कुछ तो जानती नही थी हिमेश के बारे में, बोली" आपका वह गाना मुझे बहुत पसंद है - दिल की सुर्ख दीवारों पे नाम है टेढा टेढा" "लता जी टेढा नही 'तेरा"
"अच्छा ? आप टेढा क्यों बोले थे गाने में?" "जी वो मेरा स्टाइल है मै कुछ शब्दों को ऐसे तोड़ मरोड़ कर रख देता हूँ की लोग मेरे दीवाने हो जाते हैं "
तब तक जगजीत जी भी वहाँ आ गए, अब औपचारिकता तो निभानी थी सो हिमेश जी ने उन्हें भी काफी ऑफर कर दी जो उन्होंने झटपट स्वीकार कर ली।
बैठते ही बोले "रमेश हेशामियाँ जी, ये दौलत भी ले लो, ये शौहरत भी ले लो, बस एक नज़्म सुना दो बढ़िया सी" लता जी हंस पड़ी "आपने तो इनका नाम तेरा कर दिया". "तेरा नही टेढा " हिमेश जी फुसफुसाए।
"तो मैं क्या कह रहा था, हाँ एक बढ़िया सी नज़्म"
"अभी लीजिये" कहकर हिमेश जी ने ग्लास का पूरा पानी गटक कर खाली ग्लास में नाक घुसा दी और हाले दिल चिल्ला दिया
" ओ हुजू ऊ ऊ ऊ ऊ ऊ ऊ र "
बैरा दौड़कर आया "जी सर ?"
हिमेश जी ने सर पकड़ लिया "मेरा मेरा क्या है कुसूर ?"



इतने में अनु मालिक भी आ गए। उन्हें तो पूछने की भी ज़रूरत नही पड़ी।
बैठते ही बोले "दोस्तों, आज मैं आपको एक अपनी बनाई धुन सुनाता हूँ.... मैं शायर बदनाम..मैं चला.."
हिमेश जी बीच में टोक दिए "लेकिन ये तो किसी और की धुन है !!"
जगजीत जी बोले " वही तो वो बोल रहे हैं , वो बदनाम शायर हैं और वो चल भी रहे हैं, मार्केट में "
"हाँ ये बात भी है"



धीरे धीरे पूरा संगीत जगत वहाँ पर इकठ्ठा हो गया। काफ़ी पर काफ़ी आर्डर होती गई और मुशायरा चलता रहा। हिमेश जी के पसीने छूट रहे थे।



इतने में लता जी का फ़ोन बज उठा ,दूसरी तरफ़ आशा जी थीं "बहन, मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, मेरा वो सामान लौटा दो"
लता जी हडबडाकर बोलीं "हाँ हाँ तुम्हारा सामान ही लौटाने निकली थी, पर यूँ ही कोई मिल गया सरे राह चलते चलते"
"ठीक है हम इंतज़ार करेंगे तेरा क़यामत तक" कहकर फ़ोन रख दिया।
हिमेश जी ने राहत की साँस ली की अब सभा समाप्त हुई। बैरे को बिल लाने को कहा।
बिल आने पर उदित जी बोले "ओये यार मै तो निकला था गड्डी लेकर पर रस्ते में इक मोड़ आया मैं वहाँ पर्स छोड़ आया"
जगजीत जी बोले"ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो......फिर भी बिल के लिए पैसे कम पड़ेंगे "
कुमार सानु जी बोले "ये जो थोड़े से हैं पैसे, इससे बिल पे करुँ कैसे॥"
अदनान जी टुकुर टुकुर हिमेश की तरफ़ देखने लगे " यार मुझको भी तू लिफ्ट करा दे!"
हिमेश जी ने कार्ड देकर बैरे को रवाना किया।
लता जी ने सांत्वना देते हुए कहा
"बिल तो है बिल, बिल का ऐतबार क्या कीजै,
आ गया जो, अस्सी हजार क्या कीजै"
हिमेश जी भी मुकेश की ये पंक्तियाँ गुनगुनाते हुए निकल पड़े

"साहिब काफ़ी पीने दे ढाबे में बैठकर
या वो जगह बता की जहाँ पर .....लता न हो "

मंगलवार, 27 जनवरी 2009

कहीं लुप्त ना हो मानवता!!

प्रस्तर पूजन बंद करें
करें साधना कर्म की,
आओ मिलकर नींव रखें
अक्षत मानव धर्म की.
ऐसा धर्म, नही हो जिससे
आपस में दीवार खड़ी,
हाँ, जोड़े जो मानवता को
ऐसी ढूँढें एक कड़ी.
क्यों उलझें अब उन बातों में
जो भी ईसा पूर्व घटी थी,
टूटे होंगे मन्दिर मस्जिद
लांघी होंगी सीमायें भी।
किसने तोडे, किसने लांघी
सब तो अपना तर्क रखेंगे
पर जब तक हैं मसले जीवित
निर्दोषों के खून बहेंगे.
आओ इनका विधि विधान से
अब अन्तिम संस्कार करें,
भटकें न प्रेतात्मा बनकर
इनकी बरसी भी कर दें .
वरना इनका अंत न होगा,
मानवता हो अंत भले ही,
ईंटों का पत्थर हल हो तो
टूटेंगे फ़िर घर सबके ही,
आओ कुछ तो कदम उठाएं
अधिक देर होने से पहले,
कहीं लुप्त ना हो मानवता
लुप्तप्राय जीवों से पहले.

सोमवार, 26 जनवरी 2009

आओ मानव धर्म बनाएं, संविधान को ग्रन्थ बनाएं.

बचपन से लेकर अब तक बहुत कुछ देखने को मिला, देश में भी और दुनिया में भी। कभी कश्मीर की समस्या सुलझाने निकले तो ख़ुद में उलझ गए। इतिहास के पन्ने पलटे पर संतोषजनक उत्तर नही मिला। कभी देश की डेमोक्रेसी का उपहास देखने को मिला, जब चुनाव के एन पहले नेताओं को नोट बाँटते देखा, या धर्म जात के नाम पर वोट बाँटते देखा। कुछ समझ नही आता था की ये सब क्या है और जनता क्यों बेवकूफ बन जाती है। कभी लालूजी को जेल जाने से पहले अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाते देखा। सर शर्म से झुक गया। कभी चंद लोगों को मोरल पुलिस का काम करते देखा या क़ानून अपने हाथ में लेते देखा। समझ में आया की किसे दोष दें, ढह चुकी क़ानून व्यवस्था को या उन नेताओं को जिनकी शह में लोग क़ानून जेब में लेकर घुमते हैं।

मैं अपने भारत पर बहुत गर्व करती हूँ क्योंकि मुझे विश्वास है की इसकी नींव एक बहुत ही सोचे समझे दिग्गजों द्वारा बनाए गए संविधान पर आश्रित है, जिन्होंने बहुत ही काबिलियत से देश के विभिन्न समुदायों को एक सूत्र में पिरोने का सूत्र लिखा। अगर हर हिन्दुस्तानी ईमानदारी से इसका पालन करे तो कोई शक नही की दुनिया के बाकी देश इसकी फोटोकॉपी बनवाने के लिए कतार में लग जायेंगे। सच मानिए, कोई युद्ध होगा, आतंक बचेगा, गरीबी होगी और भ्रष्टाचार। सब कुछ कितना अच्छा होगा। आपको शक है॥लीजिये हम समझाए देते हैं।



ज़रा सोचिये, इस दुनिया में कितने सारे धर्म हैं। लगभग सबकी नींव कोई कोई धार्मिक ग्रन्थ है। जैसे हिन्दुओं के लिए गीता, मुस्लिमों के लिए कुरान, ईसाइयों के लिए बाइबल। यह सभी ग्रन्थ कब लिखे गए, कैसे लिखे गए, हमें नही पता। हम तो तब जन्मे ही नही थे।
अब सोचिये, अगर इसी वक्त कोई प्रलय जाए, सब कुछ तबाह हो जाए, हमारी पूरी सभ्यता नष्ट हो जाए। कुछ सदियों बाद हमारी अगली पीढियां खुदाई करके हमारी सभ्यता के सबूत इकठ्ठा कर रही हों (जैसा हम किया करते हैं) और उनके हाथ कोई धार्मिक ग्रन्थ आए, बल्कि अरिंदम चौधरी के IIPM का brochure जाए, तो वो मासूम तो IIPM को मन्दिर और चौधरी जी को देवता बना बैठेंगे।
दूसरी तरफ़, अगर उनको खुदाई में भारत का संविधान मिल जाए, तो वो उसी को अपना धार्मिक ग्रन्थ मान कर एक नया धर्म बना लेंगे।


उस ग्रन्थ से उनको पता चलेगा की यूँ तो भारत में अनेक धर्म हुआ करते हैं, पर एक भारतीय नागरिक अपने संविधान को अपने धर्म से सर्वोपरि मानता है। उसे अपने त्यौहार मनाने की आज़ादी होती है, पर दूसरे धर्म के त्यौहार का सम्मान करना भी उसका फ़र्ज़ होता है। उससे अपेक्षा की जाती है की वो धर्म जाती के नाम पर देश की शान्ति सौहार्द में विघ्न पैदा करे। उसे अपने को व्यक्त करने की आज़ादी होती है, पर उसका फ़र्ज़ है की वो इस आज़ादी का ग़लत उपयोग करे।
पाठ्य पुस्तकों में पढ़ा था, भारतीय नागरिक को हर वो मौलिक अधिकार प्राप्त हैं जिनके दम पर वह एक सम्मानित जीवन जी सकता है। उसे देश की सरकार नही बताती की उसे क्या करना चाहिए, वो ख़ुद अपनी राह पर चलता है। सरकार उसे नही बताती की उसे कितने बच्चे पैदा करने चाहिए, किस विषय पर पुस्तक नही लिखनी चाहिए या समाचार पर देश के ख़िलाफ़ क्या नही बोलना चाहिए।
पर इन आजादियों के साथ यदि एक नागरिक पर कोई लगाम लगाई जाए तो समझिये क्या तमाशा हो सकता है। मानव स्वभाव इतना भी सीधा नही है की इन आजादियों का उल्टा सीधा इस्तेमाल करे। यह जानकर ही हमारे संविधान ने इन अधिकारों के साथ साथ हमें कुछ जिम्मेदारियों भी दी थी। अगर सब कुछ ठीक रहता तो ये अधिकार जिम्मेदारियों मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण करते जिसमें सबको आगे बढ़ने का अवसर मिलता, जो आगे बढ़ना चाहता उसे कम से कम मूलभूत सुविधाएं मिल जाती। आरक्षण का कोई स्थान रहता। लोग संविधान के आगे अपना धर्म जाती सब भूल जाते सब नागरिकों को बराबर का दर्जा मिलता, फ़िर वो स्त्री हो या पुरूष, हिंदू हो या मुस्लिम।
पर दुर्भाग्य से अब लगता है की अगली सभ्यता से पहले हमारे संविधान को कोई नही पूछेगा (पूजेगा तो दूर की बात!!)


लेकिन आज २६ जनुअरी के दिन मैंने एक सपना देखा है
मैंने देखा है की अगर भारत की इस बदहाल स्थिति का कोई समाधान है तो वह है हर भारतीय नागरिक द्बारा 'संविधान' को अपना धार्मिक ग्रन्थ मान लेना। इसकी पूजा करना। इसका उल्लंघन करने पर सजा दी जाने का भय होना


ज़रा सोचिये, अगर हम संविधान को अपना धर्म ग्रन्थ मान लें तो? हम सब भारतीय नागरिक एक ही धर्म के अनुयायी हो जायेंगे, मानव धर्म।
आप सोचेंगे..नही!!!!!!!!! एक और धर्म?? पहले क्या कम जटिलता थी जो एक और गया??
जी असल में यह कोई धर्म नही है, ये तो बस सब धर्मों का बाप है!!
जिस तरह से एक लाभ कमाने वाली कंपनी में कई सारे विभाग होते हैं, कोई उत्पादन, कोई सेवा, कोई मार्केटिंग, कोई वित्त। पर लाभ तो तभी होता है जब सब विभाग मिलकर काम करें।
तो हमारा जो मानव धर्म है , वो इस कंपनी का सीईओ है
मानव धर्म के अनुयायी सिर्फ़ भारतवासी बन सकते हैं, बल्कि वो सभी जो स्वयं को मानव मानते हैं और अपने पड़ोसियों को भी मानवता के चश्मे से देखना चाहते हैं।
(लेकिन मैं अपने सपने में पहले भारत को मानव धर्म का अनुयायी बनाना चाहती हूँ ताकि वह विश्व के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करे और दुनिया बाध्य हो जाय इसको सलाम करने के लिए और 'slumdog millionaire ' जैसी फिल्मों से मैला हो चुका भारतवर्ष अपना पुराना गौरव सिर्फ़ हासिल करे बल्कि बनाए रखे) आख़िर संविधान तो हम भारत का ही मानेंगे न॥


अब रहा सवाल इस मानव धर्म के पूज्य इश्वर का, तो एक हिंदू धर्म के जन्म लेने से गीता का अध्ययन करने से मैंने पाया है की हम शक्ति की ऊर्जा की उपासना करते हैं जैसे की सूर्य देवता, जिसका ही एक अवतार गीता में कृष्ण जी को बताया गया है। अब श्री कृष्ण को तो मैंने देखा इस पीढी में किसी ने, पर सूर्य को देवता मानने में हर्ज़ ही क्या है। इस ब्रह्माण्ड में कितने तारे हैं जो सूर्य से अधिक विशाल हैं, उससे अधिक ऊर्जा के स्रोत हैं, पर आख़िर हमें तो सूर्य ही ऊर्जा देता है।
यह तो आमतौर पर सभी विज्ञान की पुस्तकों में होता है की सूर्य सिर्फ़ सीधी तरह से ऊष्मा देता है बल्कि पेड़ पोधों को खाना बनाने में जिससे पूरी फ़ूड चेन शुरू होती है, और अंत में जिस कोयले को जलाकर हम इतनी बिजली पैदा करते हैं उसके बनने में योगदान सूर्य देव का भी तो है।
इस ब्रह्माण्ड में एक ऐसी अलौकिक शक्ति है जो हाड मांस में जीवन डालती है, उसे नियंत्रित करती है, वह शक्ति हमें दिखती है ही हमारे वैज्ञानिकों को सामख में आती है, पर उसके वजूद को कोई नही नकार सकता।
अगर हमें पूजना है तो उस शक्ति को पूजना चाहिए, उसे किसी नाम या रूप रंग में उकेरने की कोशिश नही करनी चाहिए। उसे कपडों में नही लपेटना चाहिए ही उसके अस्तित्व के सबूत किसी ग्रन्थ में ढूँढने चाहिए। यह मान लेना चाहिए की ऊपर वाला हम सबका बाप है और जीते जी तो उसका रहस्य हमें समझ में आने से रहा।
हम कुछ कर सकते हैं तो इतना की कम से कम इतना स्वीकार लें की धरती में उतने भगवान् नही हैं जितने विभिन् धर्म ग्रन्थ मिलकर बताते हैं, यह सब देखकर तो ऊपर वाला उपहास करता होगा। ज़रा सोचिये, हिन्दुओं के भगवान् कृष्ण ने कभी अमेरिका का या फिर ईशु मसीह ने भारत का दौरा क्यों नही किया

अगर इनमें से किसी एक धर्म के भगवान् सत्य हों तो वो अलग बात है, पर सब धर्मों के भगवान् एक साथ सत्य हों, माफ़ कीजिये मेरी समझ से बाहर।
मैं तो यही मानती हूँ की जितने भी ये सब धर्म ग्रन्थ लिखे गए इंसानों द्बारा लिखे गए। अगर इनमें से कोई भी ग्रन्थ भगवान् के द्बारा निर्देशित होता तो वह सारी दुनिया के लिए होता, आख़िर भगवान् क्यों एशिया यूरोप में भेद करने लगे। यह काम तो इंसान ही कर सकता है॥
इसीलिए इनमें से किसी एक धर्म को दिलो जान से मान लेने से अच्छा है की हम थोड़ा थोड़ा अंश हर धर्म से लें और एक नया धर्म बनाएं जिसका मैंने अभी जिक्र किया, मानव धर्म।

आप को कोई सुझाव देता है की भइया अमुक कंपनी के शेयर्स ले लो खूब अच्छा मुनाफा देगी, आप अपना सारा पैसा उसमें लगा लेते हैं कुछ समय बाद सत्यम की तरह किसी कारण से उसके भाव गिर जाते हैं और आपका सारा पैसा डूब जाता है। दूसरी तरफ़, अगर आपने थोड़ा थोड़ा पैसा अन्य कंपनियों में भी लगाया होता तो थोड़ा बहुत तो कहीं से मुनाफा होने के आसार बनते।
यहाँ बात मुनाफा कमाने की नही हो रही, बात हो रही है ग़लत होने की संभावना को कम करने की। थोड़ा थोड़ा हर धर्म को मानेंगे तो किसी किसी रास्ते तो खुदा मिलेगा, और अगर मिला तो मानव धर्म तो है , सब धर्मों का बाप।
विज्ञान की क्षात्रा होने के कारण अब तर्क करने की आदत हो गई है। पर इसमें ग़लत ही क्या है। किसी भी राह पर अंधों की तरह चलना क्योंकि उन लोगों ने बोला जिन्हें हमने देखा भी नही था, क्या वो राह आपको इश्वर तक ले चलेगी? ऐसी ही किसी दूसरी राह पर आपका पड़ोसी भी तो चल रहा है, उसका भी तो यही दावा है!!
मैं अपने पूर्वजों का पूरा आदर करती हूँ, बस यही कहना चाहती हूँ की उनके द्बारा बनाई गई प्रणालियाँ आज के समाज में मानव को मानव का शत्रु बना रही हैं। पहले ऐसा नही होता होगा, अब होता है।
इसलिए आवश्यकता है, एक नए ग्रन्थ की, एक नए ईश्वर की, जिसे हर वह मानव मान सके, जो अमन चैन में विश्वास करता हो। एक ऐसा धर्म, जिसके अन्दर बाकी धर्म वैसे ही समा जाएँ जैसे किसी पेड़ की शाखें। सबका अपना वजूद हो, पर कोई किसी को काटकर खाने की फिराक में हो।
मेरी नज़र में भारत के संविधान से बेहतर आज कोइ तारीख में कोई पुस्तक नही जिसे हम ग्रन्थ मानकर अनुसरण कर सकें।
मेरी राय में सूर्य से बेहतर कोई भौतिक वास्तु नही जिसमें हम इश्वर को देख सकें।
यह मेरी राय है , आपकी क्या राय है? पसंद आया मेरा मानव धर्म? बनना चाहेंगे इसके अनुयायी?