सोमवार, 31 अगस्त 2009

चिन्ना की शह, मेहरू की मात

मेहरू और चिन्ना
बंद कमरे में बैठे थे
विभाजन करें या न करें
इस पर चिंतन करते थे

बोले चिन्ना “ ड्रा करते हें
“हाँ” आया तो विभाजन होगा
“ना” होगा तो बिन्दुस्तान
एक अखंडित वतन होगा.

मेहरू राज़ी हो गए
चिन्ना ने दो पर्चियां बनायी
दोनों में “हाँ” लिखकर
मेहरू को पर्चियां थमाई

मेहरू ने पर्ची उठायी
“हाँ ” देखकर आँख भर आई
देश का विभाजन हुआ
चिन्ना ने पर्चियां जेब में पहुंचाई.

चिन्ना को अलविदा कहते
मेहरू गले लगकर रोये
चिन्ना भी आश्चर्यचकित थे
इतना प्यार थे मेहरू छुपाये.

एक साल में चिन्ना को
यमलोक से बुलावा आया
जन्नत भेजें या जहन्नुम में
चित्रगुप्त को समझ न आया

बोले चिन्ना " ड्रा करते हें
“हाँ” होगा तो जन्नत होगी"
और जेब से पर्चियां निकाल
चित्रगुप्त को थमा दीं

चित्रगुप्त ने एक पर्ची खोली
और सदमे में आ गए चिन्ना
इन पर तो था ‘हाँ’ लिखा हुआ
अब क्यों इनपर दीखता है ना ’

गए जहन्नुम, देखा जाकर
खोली उसने दूसरी पर्ची
लिखा ‘ना' था उस पर भी
और लिखावट मेहरू की थी!

गले लगाकर जाते जाते
मेहरू ने ना प्यार जताया
धूर्त चिन्ना को उसी के दांव से
मेहरू ने जहन्नुम पहुंचाया.

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

लीची, आम, और मायाजाल


हाल ही में मैंने लीची व आम जैसे फलों से एक सारगर्भित बात जानी है। इससे मेरा माया-मोह पर से विश्वास एक साल के लिए उठ गया है।


क्या करें, लीची व आम मेरे सर्वाधिक पसंदीदा फल हें, लेकिन आने से पहले जाने की तारीख बता जाते हें। इस बार भी जब लीची बिकनी शुरू हुई तो मैंने पुराने अनुभवों से सबक लेकर झटपट खूब सारी लीचियां रोज खानी शुरू कर दीं। जब तक सीज़न ख़त्म हुआ मेरा मन भी लीची से भर चुका था। और अब मेरी नज़र थी आम पर! आम थोड़ा कम भाव खाते हें और आम जनता के साथ ज्यादा वक्त बिताते हें। तो मैंने पूरे तीन महीने आम का जायका लिया और जब वो पचास रुपये किलो मिलने लगे तो मैंने रास्ता नाप लिया।


लेकिन फ़िर मैं दुखी हो गई क्योंकि अब कोई और फल मुझे पसंद नहीं था। मैं बहुत परेशान सी रहने लगी और कमज़ोर भी हो गई। मैंने इश्वर से पूछा की क्यों वो ऐसे खेल मेरे साथ खेलता है, क्यों नही इन फलों को साल भर उपलब्ध कराता? पर कोई जवाब नहीं मिला।


फ़िर एक दिन मैं दुखी मन से सब्जी खरीद रही थी, की मेरी नज़र फूल गोभी पर पड़ी। मुझे याद आया की अब तो फूल गोभी का सीज़न शुरू होने वाला हैअब मुझे उम्मीद की वो किरण मिल गई जिसे थाम कर मैं यह सीज़न काट सकती।


फ़िर मैंने महसूस किया की यही तो इश्वर की लीला है, यही तो उसका मोह जाल है जो साल भर चलता है। जो जीवन का सही अर्थ जान गया वो इन सब मायाओं से परे होकर जब जो मिलता है उसी में खुश रहता है, बाकी लोग इस मौसम में उस मौसम की यादें लेकर रोते बिलखते हें, और उस मौसम में इस मौसम की!


फ़िर मैंने निर्णय लिया की जिस मौसम में जो मिलेगा उसी में संतुष्ट रहूंगी। लेकिन यह सिर्फ़ एक साल के लिए है, उसके बाद फ़िर लीची, फ़िर आम, और फ़िर वही मायाजाल!

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

भैया आपने राखी के बंधन को निभाया.


हर बार की तरह इस बार भी रक्षाबंधन पर अपने सभी भाइयों से दूर हूँ, बस इस बात का सुकून है की मेरी राखियाँ सभी को वक्त पर मिल गयीं। (पहली बार!)

बचपन में जब भैया लोग पढ़ाई लिखाई में मशगूल थे और उनके पास मुझे राखी के बदले कुछ उपहार देने के पैसे नही होते थे तो मम्मी ही सबके बदले कुछ मुझे दे दिया करती थी। मैं भी खुश हो जाती थी।
लेकिन एक रक्षाबंधन ऐसा भी था जब मेरे सबसे छोटे भाई ने निश्चय किया की अपने पैसों से मुझे कुछ उपहार देंगे। महीना दो महीना पहले से गुल्लक में यहाँ वहाँ से जुगाड़कर पैसे डालते रहे। राखी के दिन गुल्लक तोड़कर पैसे मेरे हाथ में पकड़ा दिए। मैं नही बता सकती कैसा महसूस हुआ था तब।

मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ की मेरे तीन बड़े भाई हें, सभी ने मेरे जीवन में एक अहम् किरदार निभाया है, सबसे बड़े भैया ने मुझे अपने साथ रखकर पढाया और आज जिस मकाम पर हूँ वहाँ पहुंचाया। दूसरे भैया ने मुझे स्वतंत्र रहकर जीना सिखाया, मेरी गलतियाँ पकड़कर उन्हें सुधारना सिखाया, आत्मविश्वास से परिपूर्ण बनाया, व तीसरे भाई जिनका किस्सा मैंने ऊपर बताया, वो तो भाई कम और एक सबसे करीबी दोस्त अधिक रहे। पूरे स्कूल कॉलेज के दौरान मेरी ज़िन्दगी में कोई बात ऐसी नही हुई जो उन्हें न पता रही हो। आज भी मेरा कोई मित्र उनसे अधिक करीबी नही है। इस तरह से मेरा पूरा व्यक्तित्व मेरे भाइयों की बदौलत निखर पाया है।

एक भाई का होना, ज़िन्दगी बदल देता है। उनसे बढ़कर कोई मित्र, कोई पथप्रदर्शक, कोई संबल नही। पास न रहकर भी वो बहन की रक्षा करता है। ऐसे सुंदर रिश्ते से मेरा आँचल भरने के लिए ईश्वर को मेरा कोटि कोटि धन्यवाद।

शनिवार, 18 जुलाई 2009

ऐ मायावती के दूधवाले!

ऐ मायावती के दूधवाले!
सब कुछ कहना सुनना,
बस एक बात हमारी
थोड़ा दिमाग में रखना.
पड़ोस के शर्मा जी तो
कुछ नही कर पायेंगे
तुम घटिया दूध दोगे
तो कोई और लगायेंगे.
इस छत्ते पर लेकिन
बिल्कुल हाथ न डालना
बहनजी के दूध में
पानी साथ न डालना.
उनके सर पर कभी
मक्खी भी गर बैठती है
तो वो दलितों पर
अत्याचार कर बैठती है.
मायावती को 'चंदा' मिले तो
दलित अमीर बनता है
उनकी मूर्तियाँ लगती हैं तो
दलित अमर बनता है.
वो पहले एक 'दलित' हैं,
फ़िर एक 'नारी' हैं
फ़िर जाकर कहीं ख़ुद को
एक 'इंसान' स्वीकारी हैं.
इसलिए ऐ दूधवाले,
तुम सब कुछ करना,
उनके दूध में लेकिन
मिलावट मत करना.
वरना ख़ुद को दलितों पर
अत्याचार करता पाओगे.
ज़मानत भी नही होगी
ऐसे फ़िर जेल जाओगे.

बुधवार, 17 जून 2009

बेफजूली

शायद यही मंज़र हमारे
ख़्वाबों में आता होगा
शायद यही देखकर हम
आज ठिठक कर ठहरे हें.

जंजीरों में गर लिपटते
तो टूटने की आस होती
वो भला क्या करे, जिसपर
आंखों से लगते पहरे हें.

कैसी बातें करते हें
एक चिराग से क्या होगा
लाखों भी फीके पड़ेंगे
ये गर्त खासे गहरे हें

बड़े जतन से बनाती हूँ
उनके लिए ये घरोंदा
पर बिगाड़ जाती है, वो
जिसके बाल सुनहरे हें

पूछे वो, तो खामोश रहना
फ़िर पूछे तो भी चुप रहना
न माने, तो कह देना
हम आजकल ग्रीनलैंड में ठहरे हें।

शनिवार, 6 जून 2009

खंडहरों में कहीं जिंदगी बसती है

कुछ दिनों से हम
थोड़ा परेशान थे.
मंजिलें नाराज़ थीं
रास्ते वीरान थे.
धुंधले आईने में हमने
जिंदगी को निहारना चाहा.
तपती धुप के ओज से
रूप निखारना चाहा.
शाम की उदासियों से भी
काजल उतारना चाहा.
पैबंद लगी रूह से
जिस्म संवारना चाहा.
जी किया की जिंदगी को
हिस्सों में बाँट दें,
गम कहीं छोड़ दें
खुशियाँ सब छांट लें.
कभी तो इन काँटों में
फूलों का निशाँ मिलेगा,
खँडहर के उस पार
एक आशियाँ मिलेगा.
लेकिन जब ये सिलसिला
कहीं थमता न दिखा,
खँडहर के उस पार
कोई आशियाँ न दिखा,
तब कहीं महसूस हुआ
के ये कांटे ही तो
जिंदगी भर साथ दिए,
ये खँडहर ही तो
धूप दिए, हवा दिए
दो पल का आसरा दिए,
कुछ बेहतर पाने का जज्बा दिए.
बीच राह में गर
ठंडी छाँव मिल जाए,
तो क्या हम कभी
अंजाम तक पहुँच पायेंगे?
जो बसंत में ही रह गए
तो बाकी के मौसम
क्या कभी देख पायेंगे?

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

मानव धर्म और इस्लाम

आज ही एक ख़बर आई, पाकिस्तान के तालिबानिकृत क्षेत्र में एक लड़की को इसलिए कोड़े लगाए गए क्योंकि वो किसी व्यक्ति के साथ थी जो उसका शौहर नहीं था।
समझ में नही आ रहा इस पर क्या टिप्पणी दें, धीरे धीरे एक ज़हर इस दुनिया की नस नस में फैलने को आमादा है, ओबामा उसी के इलाज के लिए इतना पैसा पकिस्तान में फूंक रहे हें। किंतु क्या इस लगातार बढ़ रही शक्ति को रोक पाना सम्भव होगा, बिना उन मुस्लिमों के समर्थन व जागरण के जो स्वयं को इससे अलग करके चलते हें व जिन्हें अंग्रेजी में 'moderate muslims' कहा जाता है।

जब तक यह वर्ग इस्लाम का व इसके धर्म ग्रन्थ कुरान की सही शिक्षा को सामने नही लाते तब तक एक पवित्र धर्म ग्रन्थ की आड़ में जाने कितने अमानवीय कृत्य होंगे, जिनकी शुरुआत हो चुकी है।

क्या कहेंगे आप उस 'सज़ा' को जिसमें एक स्त्री पर कोड़े बरसाए जाते हें पर जिस कृत्य के लिए उसीमें भागीदार एक पुरूष को आंच भी नहीं आती। क्यों वह पुरूष बेक़सूर है पर स्त्री गुनाहगार, जबकि साथ तो दोनों चल रहे थे। क्यों इमराना जैसी जाने कितनी मासूम निर्दोष महिलाओं को पहले तो कुकृत्य का शिकार होना पड़ता है फिर उसकी सज़ा का! इससे अधिक अमानवीय क्या हो सकता है।

मैं नही मान सकती की इस्लाम में या फ़िर किसी भी धर्म ग्रन्थ में जिसका पूज्य कोई न कोई इश्वर होता है, वहाँ एक स्त्री को जानवर से बदतर हाल में रखा जाने का हुक्म हो, सारे नियम क़ानून पुरुषों के हक़ में हों, वो जब चाहे शादी करें, जब चाहें तलाक़, यदि ससुर अपनी बहू के साथ कुकृत्य करे तो उसकी सज़ा बहू को मिले!
स्त्री तो जननी है, सृष्टि की नींव है, ममता का स्रोत है, जिस समाज में स्त्री को पशु से या फ़िर किसी घर पर पड़ी वस्तु से बदतर माना जाए, उस समाज का क्या किया जाए? कैसे छोड़ दिया जाए इस विष को फैलने से। कैसे चुप्पी रखी जाए? इस्लाम में उच्च शिक्षित व जागरूक स्र्तियों का अकाल तो नहीं लगता, फ़िर इन सब यातनाओं के ख़िलाफ़ कहीं से आवाज़ क्यों नहीं सुनाई देती?
जब आपके घर में कलह हो तो पड़ोसी से तो उसे सुलझाने की उम्मीद नहीं की जा सकती, हालांकि शोर शराबे से परेशान वो भी होते होंगे। उसी तरह इस्लाम की आड़ में उल जुलूल कायदे क़ानून का निर्वाह करने वाले तालिबानियों का विरोध यदि मुस्लिम सम्प्रदाय ही न करे तो बाकी धर्मों तर्क वे भला क्यों सुनेंगे।।
किसी भी धर्म का कार्य है मानव में जीवन मूल्यों के निर्वाह के प्रति निष्ठां का संचार करना। यदि वे जीवन मूल्य ही अमानवीयता की नींव रखते हों तो उनका निर्वाह करना मानव धर्म नही हो सकता। जो धर्म एक मानव को दूसरे का शत्रु बना दे, जो स्त्री का सम्मान करने के बजाय कदम कदम पर उसका तिरस्कार करे, वह इस्लाम नहीं हो सकता। यकीनन इस्लाम धर्म में या किसी भी अन्य धर्म में जिसके प्रेरणा स्रोत इश्वर हों, इस तरह के अमानवीय कृत्यों की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
अतः आवश्यकता है इस्लाम धर्म के उन अनुयाइयों से जो स्वयं को तालिबान का समर्थक नही कहते, की वे एकजुट होकर व कुरान का भली भाँती अध्ययन कर उसका वास्तविक अर्थ सबके समक्ष रखें व यह साबित करें की उनका धर्म अर्थात इस्लाम एक मानव धर्म है।

गुरुवार, 26 मार्च 2009

नीयत भली तो सब भला

इस घोर कलयुग में जहाँ चारों तरफ़ चील कोवे बैठे हों आपका खून निचोड़ने के लिए, वहाँ कभी कभी एक छोटा सा नेक नीयति वाला काम भी दिल को छू जाता है. यह बात मैंने हाल ही में महसूस की.
इस बार होली में बड़े भइया के घर (अहमदाबाद में) जाने का प्लान बनाया. स्टेशन पहुंचकर अक्सर हम ऑटो रिक्शा ले लेते हें जो २०-२५ मिनट में घर पहुँचा देता है और मीटर से चलता है. मीटर के हिसाब से किराया ६५-७० के बीच बैठता है पर अक्सर रिक्शा चालक सवारी को बेवकूफ बनाने के चक्कर में बढ़ा चढ़ा कर बोलते हें. उनसे मीटर कार्ड मांगने पर ही असलियत मालूम पड़ती है, पर नया आदमी अक्सर बेवकूफ बन जाता है.
पहली बार मैं भी ९० रुपये देकर आई थी, फिर भइया ने यह बात बतायी तो अगली बार से ध्यान रखती थी.
इस बार स्टेशन से एक ४०-४५ की उम्र के रिक्शा चालाक से पाला पडा. पूरे रास्ते दौडाता रहा और ट्रैफिक पर गुस्सा करता रहा व बीच बीच में मुझे भी एक दो ज्ञान की बातें बताता रहा।

घर पहुंचकर उसने जेब से माचिस निकाली. एक तीली जलाकर मीटर रीडिंग मुझे दिखायी. फ़िर दूसरी तीली जलाकर जेब से कार्ड निकालकर मुझे भाडा दिखाया. ६८ रुपये बनते थे तो थोड़ा मुस्करा कर बोला आपको सत्तर दे दीजिये. मैंने भी खुशी से सत्तर दे दिए. दिल खुश हो गया की फालतू की झिक झिक नही करनी पड़ी जैसे पहले होती थी.
जब इंसान की नीयत भली होती है तो उसके साथ किया काम या गुजारा हुआ वक्त भी अच्छी छाप छोड़ जाता है. भले ही मैंने दो रुपये ज्यादा दिए पर अपनी खुशी से दिए. कोई आदमी सामने से मीठी मीठी बातें करता रहे और मन ही मन आपको बेवकूफ बनाने की तरकीब खोज रहा हो तो पता चलने पर दिल खट्टा हो जाता है।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

आज मैं खुश हूँ इसलिए कोई फलसफा नही!

आज मैं कोई
कविता नही सुनाउंगी ,
न कोई फलसफा लिखकर
आपको पकाऊंगी ।
आज जो मन में भाव हैं
वही बस उतारूंगी।
न तो मुझे
मोक्ष की चाह है
और न फलविहीन कर्म की।
न तो मुझे
ज्ञान की प्यास है
और न जिज्ञासा किसी धर्म की।
सीधा सरल मेरा जीवन है
वही चूल्हा चौका बर्तन है।
सपने मैं भी बुनती हूँ,
चंचल मेरा भी मन है।
आज मैं बहुत खुश हूँ,
कारण फिर कभी बताउंगी।
संसार में रहकर कैसे
सांसारिकता से मुक्ति पाउंगी?

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

भ्रष्टाचारियों से कुछ प्रश्न



जी करता है
जाकर पूछूं,
किसके लिए यह सब करते हो?


मीठे फल तो
सब मिलकर खाते,
पकड़े जाने पर तो तुम ही भुगतते हो।

ख़ुद की परछाई
अंधेरे में साथ नही देती,
दूसरों से फिर क्यों उम्मीद करते हो?

मन के किसी कोने में
उपेक्षित सी पड़ी है,
जिस खुशी के लिए दर दर भटकते हो।

नाम तक न लेंगे
अपनी जुबान से तुम्हारा
जिन सात पुश्तों के लिए मेरी जेब कुतरते हो।

क़ानून से बच गए
पर उससे बचके कहाँ जाओगे
जिसके खौफ से रोज़ आईने बदलते हो।

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

'आम भारतीय' की प्रेम परिभाषा.

सबने पूछा, "प्रेम दिवस पर

'उन्हें' क्या तोहफा ख़ास दोगी?

गुची का परफ्यूम दोगी

या राडो की वाच दोगी?"

हम बस हंसकर निकल लिए

नादानों को क्या समझाएं,

सब कुछ मेरा 'उनका' ही है

खाते फ़िर क्यों अलग बनाएं?

उन्हें याद करने को लेकिन

एक दिवस पर्याप्त न होगा,

प्रेममई मेरी दुनिया में

यह दिन तो हर रोज़ मनेगा।



यह पंक्तियाँ मेरे 'उन' के लिए समर्पित हैं जो मेरे प्रेरणास्रोत बनकर जीवन में आए हैं।

अब हम अपने असली रूप में वापस आते हैं, प्रेम रस में कम, वीर रस में अधिक सहज महसूस करते हैं! तो अब हम एक 'आम भारतीय' की और से वैलेंटाइन डे के मद में झूमते को यह संदेश देना चाहते हैं :



मेरे भारत में न प्रेम को
एक दिवस में आँका जाता।
और न ही हर वैलेंटाइन को
अपना प्रेमी बदला जाता।
सच तो यह है, प्रेम कड़ी है
जिससे जुड़ता सबका नाता।
हर प्राणी से प्रेम हमें है
सबके संग हमारा खाता।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

गुंडागर्दी सही या पब कल्चर?

जीवन की ये कैसी राहें,
इधर कुँआ है उधर है खाई।
रह लेते हें बीच अधर में ,
पूरी दुनिया वहीं समाई!

मंगलोर में गुंडों ने जब
लोकतंत्र पर दाग लगाया,
टीवी अखबारों में सब ने
अधिकारों का गाना गाया।

उतने तक तो ठीक रहा, पर
सोचो आगे क्या आएगा,
विरोध प्रदर्शन के नाम पर
पब में जाना बढ़ जायेगा,
पार्कों में, गलियारों में अब
इश्क लडाना बढ़ जायेगा।

कभी आईये किसी पार्क में
बच्चों बूढों को संग लेकर ,
आँखें ढककर जो न चले तो
रख देंगे हम नाम बदलकर ।

देकर मौलिक अधिकारों को
क्या संविधान ने पिंड छुडाया?
अधिकारों संग जिम्मेदारियों
का भी तो था पाठ पढाया।

फिर क्यों अपनी जिम्मेदारी
याद नही है हमको आती ?
पतन देश का होता है, पर
शर्म नही है हमको आती

हम स्वतंत्र हें, कुछ भी करेंगे,
शराब पियेंगे, ऐश करेंगे।
कच्ची उम्र में सेक्स करेंगे
पुस्तक नही आईपॉड खरीदेंगे ।
भारतीयता ट्रेंड में नही है,
अंग्रेजों की नक़ल करेंगे।

लेकिन मेरा दिल कहता है,
यह सब भी तो ठीक न होगा।
जिसके कंधे देश टिका है,
उसे कौन फ़िर कंधा देगा।

जोर जबरदस्ती अनुचित है,
पर उपाय कोई तो होगा,
ग़लत राह पर हक़ से चलकर
तो कोई उत्थान न होगा।









शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

दरजी का दर्शनशास्त्र


पिछले कुछ दिनों से मैंने अपने दूसरे वाले ब्लॉग पर खूब 'उपदेश ' दिए थे और ख़ुद को ही 'अल्टीमेट फिलोसोफेर' समझ बैठी थी। लेकिन आज का एक वाकया मुझे समझा गया की फिलोसोफर तो गली कूचों में मिल जाते हें, आधी फिलोसोफी तो ज़िन्दगी सिखा जाती है।
हुआ ये की मै अपनी कल की पोस्ट डालने के बाद अपनी सहेली के साथ एक दरजी की दूकान में गई, उसे सूट सिलवाने देना था।
सहेली का मोबाइल बजा तो वो थोडी दूर चली गई बात करने के लिए।
इस बीच उस दरजी ने, जो की हमें पहचानता था पहले भी हम उसके पास जाते रहते थे, मुझसे वार्तालाप शुरू किया। पढ़ाई लिखाई, नौकरी, वगैरह।
फ़िर अपने काम में मग्न होकर बोलने लगा," देखिये न सभी की तो कोई न कोई समस्या होती है जो वो घर छोड़कर बाहर निकलता है। आपको अपने पैरों पर खड़े होना है, हमें रोजी रोटी का जुगाड़ करना है, पर ये जो गुरु घुमते रहते है इधर से उधर जो उपदेश देते रहते हें? ये तो सबकी समस्या दूर करने का वादा करते हें पर इनकी अपनी क्या समस्या है जो इस तरह घुमते रहते हें! घर पर क्यों नही बैठते? हमें कोई समस्या नही होती तो हम तो घर छोड़कर इतनी दूर न आते ."
हमने कहा हाँ भाई गुरु के बारे में क्या बोलें कोई मानता है कोई नही मानता है, क्या कह सकते हें। उन्हें दूसरों की समस्या सुलझानी होती है।
वो बोला नही इतना पढने लिखने के बाद भी कोई इन सब के झांसे में आ जाता है? अगर ये वाकई सबकी समस्या का समाधान कर सकते तो सबसे पहले अपनी समस्या का न करते?
हम बोले भैय्या ये तो गुरु ही जाने उसके दिल में क्या है, क्यों इतना घूमता है, हमें तो इतना पता है कि वो अच्छी शिक्षा देगा तो हम सुनेंगे वरना तो हमें भी फुर्सत नही।
वो इस बात से सहमत नज़र आया और ये किस्सा वही ख़त्म हो गया, फिर हमने भी उसका गाँव वगैरह पूछा। तब तक हमारी सहेली भी लौट चुकी थी।
घर आकर हमने विचार किया की जरूर उसने थोडी देर पहले किसी घुमते घामते गुरु या बाबा को देख लिया होगा जो इतना व्यथित था किसी को सुनाने की लिए।
यूँ तो हम भी किसी गुरु को नहीं मानते, सोचते हें भगवान् से सीधा कनेक्शन हो जाए, पर यह जानते हें कि कुछ गुरु होते है, या होते थे, जो वास्तव में सिर्फ़ दूसरों को सही मार्ग दिखाने, उन्हें मोह माया से परे कि दुनिया दिखाने और इश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाने के लिए निकल पड़ते थे। गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, और भी कई।

आजकल ऐसे गुरुओं के मिलने कि उम्मीद नही जो एक गुरु के मकसद को पूरा करे। आजकल तो गुरु भी प्रोफेशनल हो गए हें। वक्त के साथ चलते हें, पर सच कहें, तो वो श्रद्धा अब नही आ पाती अन्दर से, जो एक सच्चे गुरु को देखकर आनी चाहिए। अब तो लगता है कि इन सब को किनारे करके ख़ुद ही मोक्ष का मार्ग ढूँढा जाए।

दरजी की फिलोसोफी ने कुछ तो सोचने पर मजबूर कर दिया!

शून्य के फेर से कौन बचा

शून्य की फितरत देखिये
कितना भी गुणा  भाग करें
ये कहाँ बदलता है
अच्छे भले अंकों को
शून्य बनाकर रहता है।
जब से इसकी खोज हुई है
जनता इसपर पिली हुई है
कहीं चंद दौलतमंद
खाते में शून्य की संख्या बढाते रहते हैं।
कहीं करोड़ों भूखे नंगे
सुबह की शुरुआत शून्य से करते हैं
शाम को उसी पर आकर ठहरते हैं।
कहीं चरित्र का पतन हो
कहीं आदर्शों का हनन हो
हम बस शून्य में ताकते हैं।
कभी कभी सोचते हैं
क्या जरूरत थी इसकी खोज करने की
'कुछ नहीं' से तो 'कुछ' ही बेहतर था।
आज हम इस कदर
भावशून्य, चेतनाशून्य
संवेदनाशून्य तो न होते।
पड़ोसी के घर आग लगती
तो हम चैन से तो न सोते।

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

राजनीति से दिल न लगाइए!

एक बार दिल्ली यूनिवर्सिटी में
निर्णय लिया गया
कि  छात्रों को अब
'रियल लाइफ' अनुभव दिया जायेगा
और राजनीति पढाने के लिये
साक्षात राजनेताओं को
आमंत्रित किया जायेगा।
उदघाटन के लिए
अटल जी को बुलाया गया
मंच पर पहुंचकर बोले
"प्यारे छात्रों ....
सब विद्यार्थी साँस रोककर खड़े थे
एक मिनट गुजरा ..
दो मिनट गुजरे..
पाँच मिनट बाद बोले
"और छात्राओं .."
लोग धीरे धीरे खिसक लिए।
अगले दिन कल्याण जी आए
"राजनीति में सफलता के लिए
गणित का पंडित होना आवश्यक है
गठबंधन का दौर है
बहुत गुणा  भाग करना पड़ता है।
हर बार नए 'फोर्मूले' बनाने पड़ते हैं। "
मायावती जी बोली
"राजनीति एक कला है
कोई एजेंडा न होते हुए भी
शीर्ष तक जाने की कला। "
अमर सिंह बोले
"परिवार बढ़ाना पड़ता है।
हर फिल्मी सितारे को
छोटा भाई बनाना पड़ता है"
आडवाणी जी बोले
"याददाश्त को थोड़ा आराम देना होता है
आज जारी किए बयान का 
कल कत्लेआम  करना होता है। "
सोनिया जी ने अनुभव बांटे
"मौत के सौदागरों से दूर भागना होता है
बेटे को कुर्सी दिलानी हो
तो पहले ख़ुद त्यागना होता है। "
राहुल जी भी क्यों पीछे रहते।
"बहुत ईजी है,
महीने दो महीने में
रियल इंडिया देखना होता है।"
अंत में माननीय
मनमोहन जी को बुलाया गया
इतना कहकर चल दिए
"इससे दिल न लगाइए
और गलती से लग गया, तो
खूब बादाम खाइए, खूब बादाम खाइए। "






गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

सिगरेट उनकी जिगरी दोस्त, पर कब तक?


वो कहते हें सिगरेट छोड़ी नही जाती
कैसे चुटकियों में पीछा छुडा दें?
सालों से जिससे दोस्ती निभाई है
पल भर में वो सब नाते भुला दें?

तो जनाब जरा अब हमारी भी सुनिए
मारना न चाहते हो तभी नही मरती है,
दोस्त मानकर जिसे सीने से लगाए हें
सबसे पहला वार तो आपको पे ही न करती है?

धू धू करके जब जलेंगे टुकड़े जिगर के
हमें तो बस थोडी आंच महसूस होगी,
दम लेने को भी जब आपके दम न बचे
हमें वो घुटन क्या ख़ाक महसूस होगी?

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

एक मग पानी में स्नान.

बहुत वर्ष हो गए इस अनुभव को, पर जैसे हर किस्सा गुजरने के बाद भी कुछ कड़ियाँ बिखेर देता है, यह भी स्मृति में ऐसा रच बस गया है की कभी बरबस याद जाता है, फ़िर जीवन रुपी पहेली से जूझने को एक और 'क्लू' मिल जाता है

पहाडों में उन दिनों अधिक अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल नही होते थे, जो इक्के दुक्के होते थे उन्ही से काम चलाना पड़ता था, उसी में हर वर्ग के विद्यार्थी आते थे।

ऐसे ही एक स्कूल में हमने भी पांचवी के बाद दाखिला लिया वहीं से ख़ुद में और थाकथित 'एलीट क्लास' के बच्चों में फर्क जानना शुरू किया

उस वक्त बहुत मासूम थे, पुरानी हिन्दी फिल्मों की तरह हमारे लिए दुनिया में हर चीज़ बस अच्छा या बुरा होता था, 'ग्रे' शेड के बारे में, दुनिया की असमानताओं के बारे में, कहाँ कुछ मालूम होता था

एक साल बाद यानी सातवी में हमारे स्कूल में एक ट्रेकिंग कैंप के आयोजक आए व सिर्फ़ लड़कियों के लिए १० दिनों के ट्रेकिंग कैंप की घोषणा की। पूरे कसबे के विद्यालयों से लडकियां उसमें भाग ले सकती थीं।
उस दिन हमारे स्कूल से काफ़ी लड़कियों ने इसमें दिलचस्पी दिखायी। सभी ने मिलकर वहाँ जाने के प्लान बना डाले। नाम लिखवाने की कार्यवाही भी शुरू हो गई।
हमने भी सारी तैयारियां कर लीं व नियत दिन हम बोरिया बिस्तर बांधकर स्कूल पहुँच गए जहाँ से हमें कैंप की ओर रवाना होना था।
स्कूल पहुंचकर हम क्या देखते हें की कोई भी लड़की कैंप जाने के लिए तैयार होकर नही आई थी। हमें लगा की शायद तिथि बदल गई हो और हमें पता न चला हो, पर धीरे धीरे पता चला की सब लड़कियों ने अपने नाम वापस ले लिए थे। अंत में पूरे स्कूल की तरफ़ से सिर्फ़ तीन लडकियां, हमें मिलाकर, कैंप के लिए रवाना हुई।
दिल बहुत खट्टा हो गया था। बाकी की दो लड़कियों में से एक तो मेरी ही कक्षा की थी पर हमारी कोई ख़ास बात नही होती थी, वो बड़े लोगों की चमचागिरी में व्यस्त रहती थी जो मैं नही थी।
दूसरी लड़की मेरी सीनियर थी यानी ८वि में। अंतर्मुखी होने के कारण मैं उससे घुल मिल नही पा रही थी। समझ नही आ रहा था की आगे के १० दिन कैसे बीतेंगे अजनबियों के साथ, वो भी इतने बेकार मूड के साथ!
खैर हम गए और काफ़ी नयी चीज़ें सीखी। पहली बार स्लीपिंग बैग्स में घुसकर सोये। कडाके की ठण्ड में ठिठुरते हुए घर की रजाइयों की बहुत याद आई।
खाने पीने में भी नयापन था। अपने बर्तन ख़ुद धोने होते, वो भी बर्फीले पानी में।
अकेलापन तो रहा, पूरे समय, क्योंकि कसबे के एकमात्र बालिका विद्यालय से ही अधिकतर लडकियां आई थी जो की आपस में खूब मस्ती कर रही थी और हमें तो पूछ भी नही रही थी!
जैसे तैसे हमने कैंप की गतिविधियों में दिल लगाना शुरू किया। नई नई बातें सिखाई जाती थी, नई जगहों पर घुमाने ले जाया जाता था।
चट्टानों पर रस्सी से चढ़ना, उतरना, तरह तरह की गाँठ बांधना, सुबह सुबह ६ बजे व्यायाम करना, बाप रे!!
उन्हीं में एक अध्याय था'एक मग पानी से स्नान'। नाम सुनकर हमें बड़ा अच्छा लगा, उत्सुकता हुई की कैसे यह सम्भव है। बड़े गौर से सुना, पर ऐसी कोई रोचक बात अध्याय ख़त्म होने पर नही मिली। बड़ा सीधा तरीका था एक मग पानी में तौलिया डुबाओ और शरीर पोंछ डालो! या फ़िर ऐसा ही कुछ, अब तो याद भी नही।
पर अंत तक जेहन में ये एक पंक्ति बनी रही, आज भी कानो में उसकी ध्वनि गूंजती है।
आखिरकार दस दिन पूरे हुए और हम जेल से छूटे कैदी की तरह दौड़कर घर पहुंचे। जिन छोटी छोटी बातों को पहले भाव नही देते थे वही आज कितनी अच्छी, कितनी अपनी लग रही थी। 'घर' का असली अर्थ तब समझ में आया था।
खैर वो सब तो पुरानी बात हुई अब तो ऐसा है की जंगल में भी छोड़ दो तो रह लें, पर उस एक पंक्ति से हमेशा का नाता जुड़ गया है...एक मग पानी से स्नान..ऐसा क्यों है, क्या पता।
अब पता चलता है की क्यों उस दिन कैंप में लडकियां नही आई थी। मुफ्त के कैंप में तो वो लोग जाते हें न जिनके घर पर खाने के लाले होते हें, जिन्हें अपने १० दिन का राशन बचता हुआ दीखता है। खाते पीते घर के लोग थोडी न उस तरह के मुफ्त के शिविरों में जाते हें। कहीं हमारी लडकियां छोटे घर की लड़कियों के साथ १० दिन बिताकर उनके जैसी न हो जाएँ, ऐसा ही कुछ सोचा होगा उनके अभिभावकों ने।
मेरे घर पर तो खाने के लाले नही थे, मेरे घरवालों का तो इतना दिमाग नही चल पाया। मै तो सही सलामत बल्कि और बेहतर होकर वापस लौटी।
खैर, इसे भी एक सबक की तरह पोटली में बाँध लिया, दुनिया ऐसी नही जैसी दिखती है। संसार में सिर्फ़ अच्छा या बुरा नही, और भी आयाम हें इसके। बड़े पेंचीदे।
बिल्कुल जलेबी की तरह गोल है दुनिया।




सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

मैं अपने पसंद की चाय बनाउंगी!

क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है की जिस काम में आपको जी जान लगा देते हें, दिल निकाल के रख देते हें, उसका परिणाम दूसरों की अपेक्षा पे खरा नही उतर पाता. दूसरी तरफ़ जो काम आपको

चलते फिरते कर देते हें ज्यादा वक्त देते हें तवज्जो, वही आपके लिए उनकी नज़र मेंमील का पत्थर बन जाता है!
अक्सर ऐसा हुआ है की जब घर में खाना बनाने के लिए कुछ हो बस कुछ मात्रा अमुक कुछ मात्रा तमुक, और हमने उन सब को उनके उपयुक्त हिसाब से पकाकर कुछ नयाव्यंजनबना दिया हो. हमारे मित्रगन ऊँगली चाटकर घर से निकले हें!
और जिस दिन हम खून पसीना एक करके, रेसिपे बुक की एक एक पंक्ति चाटकर, तराजू से तोलकर दुनिया भर के उपकरणों की सहायता से कोई व्यंजन बनाने की कोशिश करते हें, अंत में एक ऐसी चीज खाने को मिलती है जो आपके मित्रों को उबले आलो मटर की सब्जी से अधिक नही लगती (भले ही आपको को ऐसा लगता हो)
ऐसी स्थिति में क्या किया जाय? क्या हार मान ली जाय? क्या ख़ुद को बेहतर बनाने की कवायद बंद की जाय. क्या छोड़ दिया जाय ख़ुद को अपने हाल पर.
इस दुनिया में जितने मनुष्य हें, उतनी ही विचारधाराएँ भी हें. सबका अपना स्वाद है, अपनी पसंद है.
हमें बचपन से ही चाय का शौक था. यूँ तो हम चाहते थे की हमें रोज़ सुबह बेड टी मिल जाया करे पर जब से माँ से दूर हुए तब से इस शाही शौक को दफना दिया. उसके बाद हम किराए के घर में रहे, हॉस्टल में रहे, मित्रों- रिश्तेदारों के घर रहे, पर चाय का सुख भोगने के लिए ख़ुद ही उठकर किचन में जाना पड़ा. इसी बहाने हमारे मित्रगनों को भी चाय मिल जाती थी. धीरे धीरे हमेंमाँका दर्जा दिया गया. हमें खुशी मिलती थी की चलो हमें नही दूसरों को तो वो खुशी मिल जाती पर उस दौर में हमें एक बात देखने को मिली, जिसने हमें जिंदगी के कटु सत्य से वाकिफ कराया.
हम हर किसी को खुश नही कर सकते
सीधी सी बात थी, जितने अधिक लोग होते, उतनी अधिक हमारी चाय में मीन मेख निकलती. किसी को चीनी अधिक लगती, किसी को दूध कम.
शुरुआत तो हमने अपनी पसंद की चाय बनाकर की थी, धीरे धीरे दूसरों की पसंद शामिल करते करते अपनी चाय पता नही कहाँ रह गई.
उसके बाद भी हमने महसूस किया की जितनी हमें तारीफें मिलती थी उनसे कहीं ज्यादा नसीहतें मिलती थी.
फिर एक दिन हमने फ़ैसला लिया की चाय बनेगी तो हमारे पसंद की, दूध ज्यादा शक्कर कम.
उसके बाद से कुछ नही बदला, तारीफें भी उतनी मिली नसीहतें भी उतनी. पर कम से कम अपनी पसंद की चाय पिने को मिल जाती है.
दुनिया में अरबों खरबों लोग हें, क्या कोई ऐसी चीज है जो सबको साथ में पसंद जाए?
कई बार हमें लगता है की हम सही हें पर लोग हमें समझ नही पा रहे हें, शायद रूढिवादी मानसिकता के कारण, शायद अपने पूर्वाग्रहों के कारण. हम सोचते हें की चलो ठीक है दूसरों को दुखी करके हमें कौन सी खुशी मिल जायेगी. हम ख़ुद को बदल लेते हें. पर भीतर कहीं वो तर्क रह जाते हें जो हम साबित नही कर पाये.
जो लोग सबको खुश करके चलते हें, किसी वाद विवाद में नही फंसते, उनकी मय्यत पे खूब भीड़ उमड़ती है. उनकी तारीफों के पुलरिटर्न गिफ्टकी तर्ज पर बांधे जाते हें.
जो लोग भीड़ से हटके चलते हें क्योंकि भीड़ उनको समझ नही पाती, वो अकेले भले ही पड़ जाते हें, पर जब वो ख़ुद को आईने में देखते हें तो उन्हें एक साथी नज़र आता है. एक ऐसा साथी, जो सौ करोड़ दुश्मनों के रहते उन्हें जीने की शक्ति देता है.
मैं भी उसी दिशा में बढ़ना चाहती हूँ. इतना चाहती हूँ की कभी अपनी अंतरात्मा के सम्मुख निरुत्तर रह जाऊं.
मैं वही करूंगी, जो मुझे आतंरिक तर्क वितर्क के पश्चात ठीक लगे. मैं अपने पसंद की चाय बनाउंगी. मैं सबको खुश नही कर सकती, पर मैं स्वयं को उस हद तक नही बदलूंगी जहाँ मैं आईने में ख़ुद को पहचान सकूं.