बुधवार, 31 दिसंबर 2008

मामूली नस्ल का कुत्ता

वो एक
मामूली नस्ल का कुत्ता है
न वो "हेलो " करता है
और न ही
अखबार मुंह में लेकर आता है
ज़ंजीर में नही टिकता
सड़कों पर घूमता है
बिल्कुल 'सलीकेदार' नही है
बहुत कोशिश की सुधारने की
कभी हाथ से मारा
कभी डंडे से
पर नालायक सुधरा नहीं
टुकुर टुकुर देखता रहा
मेरे पैर चाटता रहा
(ये सब मैंने उसे नहीं सिखाया!!)
आज भी वो
उतना ही बेवकूफ है

पर जब भी मैं
सड़क पर चलती हूँ तो
मेरे पीछे चल पड़ता है
मेरे रास्ते में
आने वालों पर
पागलों सा भोंकता है
बड़े बड़े कुत्तों से
पंगा लिया है
बहुत चोटें भी खायी हें
पर वो अपनी हरकत बंद नही करता
और मुझे 'सही सलामत'
घर तक छोड़कर ही दम लेता है
(फिर वापस गली में चला जाता है!!)

वो एक मामूली नस्ल का कुत्ता है
पर कुछ बातों में
वो अच्छी नस्ल के इंसानों से बेहतर है॥

(यह कविता मेरे वास्तविक पालतू कुत्ते 'मुल्लू' पर आधारित है व उसका वर्णन भी वास्तविक है)








मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

Good China Bad China!!

सुस्ताई सी
शामें हो या
हो अलसाई सी सुबहों पर
यह लगती है
तो आती है
जान मेरे सूखे अधरों पर
इक्की दुक्की
चीज़ें हैं जो
China ने invent करी थी!!
आभारी हूँ
शेन नुंग की
जिसने दुनिया को यह दी थी
पर उतनी ही
मुझे शिकायत
China की दूसरी प्रसिद्धि से
नहीं तृप्त मैं
हो पाती हूँ
उस छोटे चाइना कप में
और चीन की
चाय चाहिए
मुझे बड़े हिन्दुस्तानी मग में.

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

माँ को चैन कहाँ

नही मालूम, कि कितना
संघर्ष किया होगा।
ख़ुद को भूखा रखकर
मुझे अन्न दिया होगा।
नही मालूम कि  कैसे
दिन देखे होंगे। 
भीगी पलकों में कितने
सपने समेटे होंगे।
दरवाजे तक तो उसने
मुश्किल से रोका था,
मेरे जाते ही शायद
दरिया बहाए होंगे।
पढेगी लिखेगी
सयानी बनेगी
कांपते ह्रदय ने
सपने दिखाए होंगे।

मालूम है, तो बस ये
कि  रोज़ रात को
वो करवटें बदलती है,
कभ कभी बुरा सपना देखकर
घबरा जाती है,
रात के तीन बजे
मुझे फ़ोन लगाती है
और मेरी आवाज़ सुनकर
तसल्ली से सो जाती है। 

मेरा देश महान

नव वर्ष के आगमन पर वर्षा की तरफ़ से सभी ब्लॉगर बंधुओं को शुभकामनाएं इन चंद पंक्तियों के साथ:

इस गुजरे साल से

बहुत कुछ पाया है

छोटे से बजट में

चाँद पर तिरंगा फहराया है

ओल्य्म्पिक में पदक पाया है

और तो और

छठा वेतन आयोग मंज़ूर करवाया है

आर्थिक मंदी के दौर में

नौकरी को बरकरार पाया है

क्यों न फक्र करें

इस देश की जिंदादिली पर

जो समस्याओं का पहाड़ लेकर चलती है

पर थकती नही

विपरीत हवाओं में भी रूकती नही

आओ सिखाएं पड़ोसियों को

की कांटे अगर राह में हो

तो उन्हें निकालकर

फ़ेंक दिया जाता है

पर उनके खौफ से

राह नही बदली जाती

हौसले नही रोंदे जाते

यही है भारत की पहचान

इसीलिए यह देश महान॥

रविवार, 28 दिसंबर 2008

वो गुलिस्तां ही क्या जो
काँटों से बैर रखता हो
वो कमल कैसा जो
कीचड में न खिलता हो
वो दीपक क्या जो
ख़ुद को जलाकर न जले
और वो नौजवां क्या जो
खून पसीने से डरता हो
कलम की असल धार
इम्तिहान में पता चलती है
तारे को भी इज्ज़त
टूटने पर ही मिलती है
कुछ पाने के लिए
कुछ तो करना पड़ता है
अमर होने के लिए यारों
एक बार तो मरना पड़ता है ॥

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

मिटटी

मिटटी का रंग
उसकी सौंधी महक की तरह
भीतर तक उतरता जाता है।
पर्त दर पर्त
ये निखरता जाता है ।

जो पैदा हुआ है
मिटटी में समाया है ।
समस्त सभ्यताओं को
मिटटी ने बसाया है ।

जो इससे नही जुड़ा
वो महज़ एक छलावा है,
आसमां का पंछी है
झूठ है, दिखावा है ।

तुझमे राम का जन्म है,
तुझमे रावण का संहार है,
हे मिटटी, तुझ में ही तो
समस्त जीवन का सार है ।

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

हिन्दुस्तानी मक्खी

एक बार मनमोहन जी ने
ज़रदारी साहब को चाय पे बुलाया
खूब खातिर की गई
दोनों गले वले मिले
पत्रकार भाई भी खुश हुए
फिर एक imported कप में
ज़रदारी साहब को चाय पेश की गई
जयोंही उन्होंने कप हाथ में लिया
देखा, उसमे एक
मक्खी गिरी हुई थी
फौरन उन्होंने
मनमोहन जी को माजरा बताया
थोडी देर गंभीरता से सोचकर
मनमोहन जी बोले
“जनाब, ये मक्खी
हिन्दुस्तान की सरज़मीं की नही”
ज़रदारी साहब हैरान हो गए
“लेकिन ये तो
आपके मुल्क में पायी गई”
“जी, लेकिन हिन्दुस्तान की सरकार का
इस मक्खी से कोई ताल्लुक नही.
आप इसे मुजरिम साबित कीजियेगा
तो हम इस मक्खी पर
हिन्दुस्तान के क़ानून के तहत कार्यवाई करेंगे”
“जी वो कैसे ?”
"इस मक्खी को नज़र बंद कर दिया जायेगा”
ज़रदारी जी घबरा गए
सोचा मनमोहन जी पगला गए हैं
चुपचाप उन्होंने
चाय का कप वापस रख दिया
इस पर मनमोहन जी मुस्कुराए
“ज़रदारी साहब
आप एक अदद हिन्दुस्तानी मक्खी नही निगल पाये
हम तो आपके मुल्क का
बारूद निगलते आए हैं
और आप सब कुछ जानकर भी
सबूत मांगते आए हैं.”

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

स्वप्न

मैं स्वप्न हूँ।
बंद पलकों में
मेरा बसेरा है,
शाम की दहलीज़ पर
मेरा सवेरा है।
मुझमे एक आस है
चाह है प्यास है,
आज का एहसास है
कल का विश्वास है।
बंद पलकों में ही सही
मुझे यकीन है
कि  और बंदिश
नही सहूँगा,
एक दिन हकीकत बनके रहूँगा। 

कुछ तो है..

कुछ तो है
इस रिश्ते में
जिसके आने का
आभास नही होता
जसके ठहरने का
एहसास नही होता
शहद की तरह जो
लहू में घुल जाता है
हर मुश्किल
पतझड़ के पत्तों सी
टूटकर बिखर जाती है
हर उम्मीद सुबह की किरण सी
खिड़की पर आती है
अलसाई आंखों पर
डेरा जमाती है
जाने क्या है
इस रिश्ते में
स्लेट पर चाक से
नाम तो बहुत लिखे होते हैं
एक रह जाता है
जो अधूरे किस्से को
मुकाम पर लाता है
कुछ तो है
इस रिश्ते में...

गोपू का इजहारे इश्क

किशनगढ़ का गोपू
धन्नो से बहुत प्यार करता था
एक बार बोला
"हम तुम्हे चाहते हैं ऐसे
किसान कोई
ट्रेक्टर को चाहता हो जैसे"
धन्नो गुस्सा हो गई
"मुझे ट्रेक्टर से compare किया!!"
गोपू दुखी हो गया
दो दिन बाद फिर बोला
"हम तुम्हे चाहते हैं ऐसे
कोई ग्वाला अपनी
भैंस को चाहता हो जैसे"
धन्नो फिर गुस्सा
"मुझे भैंस से compare किया!!"
अब गोपू की अक्ल
जवाब दे गई
बीरू ने आईडिया दिया
किसी मस्त हीरोईन से compare कर
दूसरे दिन गोपू बोला
"हम तुम्हे चाहते हैं ऐसे
बाघबान में अमिताभ
हेमा मालिनी को चाहता हो जैसे"
धन्नो फिर गुस्सा
"अब क्या हुआ??"
"अपने आप को अमिताभ से compare किया!!"

जाने कब..

जाने कब
ये साए हटेंगे
मौत के बादल छटेंगे
दिलों में
रौशनी होगी
मुट्ठी में ज़िन्दगी होगी
बंद बहना
खून होगा
हर तरफ़ सुकून होगा
कभी तो वह
दिन आएगा
अमानुष भी थक जाएगा
बन चुकी हर
बात होगी
ज़िन्दगी से मुलाकात होगी

Papa Dont Preach - II

“पापा..
चिडिया स्कूल क्यों नही जाती?”
“बेटा उसकी अकल
पंखों में होती है
ज्यादा होगी तो वो उड़ नही पाएगी”
“तो फिर कुत्ते क्यों नही जाते?”
“बेटे उनकी अकल पुँछ में होती है
वो हिलाते हैं तो गिर जाती है”
“हाथी?”
“दांत में
वो तो हम बेच देते हैं न”
“भेड़?”
“उन में”
“गधे?”
“सींग में”
“ऊँट?”
“पूँछ में”
कोक्क्रोअच?”
“नाक में”
“पापा आपकी अक्ल कहा है??”
“बेटा शादी से पहले तक
ठिकाने पे थी”

बोरिंग सासू माँ

शीला की सास में
सासू वाले कोई गुण नही थे
न वो बहु को मारती
न ताना देती
शीला बोर हो गई
सोचा इसे कैसे भड़काऊ
एक बार खाने में
नमक ज्यादा डाला
सासू बोली
"बेटा तुझे कैसे पता
मुझे लो B P है?"
अगले दिन
चाय में चीनी नही डाली
सासू बोली
"अच्छा किया, महँगी हो गई है"
शीला दुखी हो गई
लाइफ में कोई spice ही नही !!
अगले दिन
sleeveless, backless
deep neck dress पहन कर
सासू के सामने खड़ी हो गई
सासू माँ ने
उसके गाल पे एक तमाचा जड़ दिया
शीला अपनी खुशी छुपाते हुए
टीवी वाले स्टाइल में पूछी
"आपने मुझपे हाथ उठाया??
आज तक मेरी माँ ने
मुझपे हाथ नही उठाया"
सासू बोली
"हाँ बेटा मैंने भी इससे पहले
किसी के गाल पे मच्छर नही मारा"



शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

महिषासुर का वध

एक बार कलयुग में
महिषासुर का जन्म हुआ
जहाँ जाता, तबाही मचाता
सब लोग परेशान होके
माँ दुर्गा के पास गए
“माता इसका वध करो”
माता बोली, “कलयुग के असुर को
कलयुग की शक्ति ही मार सकती है”
एक लम्बी लिस्ट बनायी गई
बिल गेट्स से लेकर
दलाई लामा तक
पर कोई उसका वध न कर पाया
एक दिन महिषासुर
bike में बैठकर कही जा रहा था
वकील बाबू स्कूटर से आए
और उसकी bike ठोंक दी..
महिषासुर गुस्से से दहाडा
तो वकील बाबु बोले
आपकी कसम, मैंने
जानबूझ कर नही ठोंकी”
महिषासुर भस्म हो गया.
आज भी जब हम
साँस लेते हैं
उनकी साँसों में ख़ुद को पिघलता हुआ पाते हैं
आज भी जब हम
आइना देखते हैं
आंखों में उनको कुछ कहता हुआ पाते हैं
चंद रोज़ में वो इस कदर
रोम रोम में बस गए हैं
की पोप जॉन पाल हमसे किराया मांगने आते हैं..

हवालदार की प्रॉब्लम

छगन हवालदार बहुत परेशान था
“क्या बताएं साहब
इधर LeT बम फोड़ता है
उधर मुजाहिदीन confession करता है..
इधर सोनिया जी कश्मीर में दहार मारती हैं
उधर PM दिल्ली में दुबक के बैठता है.
इधर जनता को सिक्यूरिटी की टेंशन होती है
उधर मंत्री लोग दस commandoes लेके घूमता है.”
“वो तो ठीक है हवालदार जी
पर तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है??”
“अब क्या बताएं साहब
ऊपर वाला साब लोग
दबा के खाता है
तो कुछ नही होता
हम कुछ करते हैं तो
ससुरा तहलका वाला पकड़ लेता है”
अंगडाई थी, परछाई थी।
तन्हाई थी, शहनाई थी।
रुसवाई थी, गहराई थी।
शरमाई थी, घबराई थी।

दस्तक हुई तो लगा
शायद वही है, जो
ख़्वाबों में आई थी।
देखा तो सामने खड़ी
काम वाली बाई थी। 

PAPA DONT PREACH!!

“बेटा होमवर्क किया?”
“हाँ पापा”
“झूठ मत बोलो”
“क्यों पापा?”
“क्यूकि कव्वा काटेगा”
“क्यों पापा,
कव्वा क्यों काटेगा?”
“क्यूकि
उसको गांधीजी ने बोला था”
“लेकिन पापा गांधीजी ने तो
बंदरों को बोला था”
“हाँ तो बेटा ये कव्वा
वही पर बैठा था”
“तो फिर पापा
बन्दर क्यों नही काटते?”
“क्युकी उनको आदमियों की भाषा
समझ में नही आती”
“तो फिर कव्वे को कैसे
समझ में आ गई?”
“बेटा उसने तोते से
ट्रांसलेट करवाया”
“तो फिर पापा
तोता क्यों नही काटता?”
“बेटा वो भी पहले काटता था
फिर उसकी चोंच twist हो गई"
पप्पू पान वाले के पास
हर बात का जवाब होता था
हम कहते
“गर्मी बहुत हो गई है”
वो बोलते
“ग्लोबल वार्मिंग”
“तेल महंगा हो गया है”
“डिमांड सप्लाई प्रॉब्लम”
“ज़मीन के दाम बढ़ गए”
“स्पेकुलेशन है जी”
"अब गिर क्यों गए?"
"bubble burst हो गया"
“अच्छे डॉक्टर नही मिलते”
“ब्रेन ड्रेन हुज़ूर”
“टाटा को क्या हुआ?”
“ हाई debt लो liquidity”
एक बार लखन चाचा ने पूछ ही लिया
“अरे भाई
पान तो मुफ्त में नही बाँटते
इतना ज्ञान काहे मुफ्त में बाँटते हो?”
पप्पू जी पान में चूना लगाकर बोले
“कारपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी”
मैं अमर हूँ।
माना मैं सबकी तरह
खाता हूँ, सोता हूँ,
दर्द होने पर मै
सबकी तरह रोता हूँ,
पर मै अमर हूँ।

कहते हैं, एक दिन
मै भी जल जाऊँगा,
सबकी तरह मै भी
मिटटी में मिल जाऊंगा,
फिर भी मै अमर कहलाऊँगा।
:
:
अरे भाई मेरा नाम अमर सक्सेना है। 

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

ज़िन्दगी

रोज़ एक नया
तमाशा है ज़िन्दगी।
कभी तोला, तो कभी
माशा है ज़िन्दगी।
आज ज़ख्मो पे
नमक छिड़कती है,
तो कल देती
दिलासा है ज़िन्दगी।
कहा किसी की
मुट्ठी में कैद हुई है
पल भर में देती
झांसा है ज़िन्दगी।
फिर भी दोस्तों
जीने को दिल करता है
फिर भी एक नई
आशा है ज़िन्दगी। 

काफिर कौन

जाने क्यों
वो हमें काफिर कहते हैं
दिखते तो हम
उनके जैसे ही हैं
ज़बान भी हमारी मिलती है..
फिर क्यों वो हमसे
नफरत करते हैं
हमें जानते नही
फिर भी हमें
ख़त्म करने की बात करते हैं
कैसे उन्हें समझाएं
की दिन के २४ घंटों में से
१० घंटे तो हम
ऑफिस में होते हैं
आठ घंटे सोते हैं
बाकी के ६ घंटे
खाना खाते हैं, नहाते धोते हैं
टी वी देखते हैं
हमें तो उनको याद करने की
या उनसे बेवजह नफरत करने की
फुर्सत ही नही होती
फिर वो क्यों हमारे बारे में
इतना सोचते हैं
कैसे उन्हें समझाएं
की उनके असल दुश्मन
तो वो ख़ुद हैं
जो नारकीय कर्म करके
जन्नत जाना चाहते हैं.
अगर जन्नत में हमें
उन जैसे लोग मिलें
तो अल्लाह हमपे रहम करना
हमें जन्नत मत भेजना..